करियर

12 03 2009

सफ़र की क्या मंजिल हो

लहरों का क्या साहिल हो

माझी का क्या नाव हो

सपनो की क्या उड़ान हो

देखते थे यह सब ,सपनों में

सोचते थे यह सब, दिनों में

करते थे यह सब, खेलो में

सुनते थे यह सब, झुंडों में

किया क्या या यह क्या किया

सवाल था सीधा सा

किया वही जो सबने किया

क्या चाहा वोह न किया

पर किया वही जो सबने किया

देखो ,सुनो पर बोलो मत

घरों में लॉटरी आया

पैसे की जगह डिग्री लाया

अब आप भी बन सकते है म.बी.ऐ.

दीजे दो जवाब और १ लाख रुपये

किया वही जो सबने किया

वो माझी और लहरें फिर याद आये

कल के झुंड आज भी आये

सपनो की फूटी कटोरी में खून से लतपत अपनी कल्पना लाये


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4 responses

12 03 2009
Satish Chandra satyarthi

“सपनो की फूटी कटोरी में खून से लतपत अपनी कल्पना लाये”

बहुत खूब, नितिन जी
अच्छा लगा

12 03 2009
mequitnever

धन्यवाद सत्यार्थी जी |
मेरा लेख ” मैं आज़ाद हूँ” ( Archive – मार्च २००९) भी ज़रूर पढिये | मुझे आशा है आपको पसंद आएगा और आप टिपण्णी न दिए रह न सकेंगे |

17 03 2009
Sneha

Good One. May be people will now not pursue career that others have succeeded in rather pursue the career they wish for.

9 05 2009
santosh jalan

iI surprised ,these are my son thought . I proud of you .when i read it tears comes out but i want to know that kaun sa sapna tuta .

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