सफ़र की क्या मंजिल हो
लहरों का क्या साहिल हो
माझी का क्या नाव हो
सपनो की क्या उड़ान हो
देखते थे यह सब ,सपनों में
सोचते थे यह सब, दिनों में
करते थे यह सब, खेलो में
सुनते थे यह सब, झुंडों में
किया क्या या यह क्या किया
सवाल था सीधा सा
किया वही जो सबने किया
क्या चाहा वोह न किया
पर किया वही जो सबने किया
देखो ,सुनो पर बोलो मत
घरों में लॉटरी आया
पैसे की जगह डिग्री लाया
अब आप भी बन सकते है म.बी.ऐ.
दीजे दो जवाब और १ लाख रुपये
किया वही जो सबने किया
वो माझी और लहरें फिर याद आये
कल के झुंड आज भी आये
सपनो की फूटी कटोरी में खून से लतपत अपनी कल्पना लाये
“सपनो की फूटी कटोरी में खून से लतपत अपनी कल्पना लाये”
बहुत खूब, नितिन जी
अच्छा लगा
धन्यवाद सत्यार्थी जी |
मेरा लेख ” मैं आज़ाद हूँ” ( Archive – मार्च २००९) भी ज़रूर पढिये | मुझे आशा है आपको पसंद आएगा और आप टिपण्णी न दिए रह न सकेंगे |
Good One. May be people will now not pursue career that others have succeeded in rather pursue the career they wish for.
iI surprised ,these are my son thought . I proud of you .when i read it tears comes out but i want to know that kaun sa sapna tuta .