कुछ खोई हुई

7 06 2009

आज मैं अपने डेस्क को ठीक कर रहा था और कहीं कोने से मेरे हाथ एक फोल्डर लगा | उस फोल्डर में रंगीन कगाज़ में लिखी मेरी पांच कवितायेँ मिली – चार हिंदी और एक अंग्रेजी | अंग्रेजी कविता “Only I could ever” पिछले पोस्ट में प्रस्तुत है | ये कवितायें मैंने बहुत पहले लिखी थी | इनमे से एक हिंदी कविता अधूरी रह गयी थी इसलिए उसमे कोई तारीख नहीं हैं | आज कविताओं को अपने ब्लॉग में पोस्ट करके इन कागजों से मुक्ति पाना चाहता हूँ |

मगर में इन मुरझाई कागजों पर धुंधली-सी लिखी शब्दों के बिखरे टुकडो को कूडेदान में फेकुंगा नहीं | इन्हें मैं यादों के बक्से में दफ़न कर अपने कमरे के किसी अंधेर कोने में छिपा कर भूल जाऊँगा |

शायद कुछ साल बाद ये सोये हुए साये फिर जग जाये और अपने सीने में सिमटायी बिसराई पलों में जान फूंक कर उन्हें जिंदा कर दे और मुझे टाइम-मशीन पर बैठा कर माज़ी (past) का सफ़र करवा लाये|

पहली कविते जो आज भी अधूरी है -

कुछ ऐसी डगर में राही
चल ढूंढे उस नगर को
हरा ही हरा हो
नीले आसमा के तले
एक सूरजमुखी खिला हो
महकती खुशबू से भरा समा हो
और उसकी याद भी न हो

आ चले हम उस नगर को
लेके अपने दीवानेपन को
आ पहुंचे हम मंजिल पा गए

न था कोई फूल न हो कोई सूरज
काले साये से मंडराते zombie
कांटो

दूसरी कविता -

व्यक्तिगत है इसलिए पोस्ट नहीं हुआ
तीसरी कविता -

लोग कहा करते है कि किसी का साथ होना
ज़िन्दगी का लम्बा सफ़र आसान लगता है |
क्या यह सच है ?
क्या किसी को अपने ज़िन्दगी का वक़्त देना मुझे आराम देगा ?
या ज़िन्दगी से मुह मोड़ने का एक जरिया है, बहाना है |

चौथी (आखरी) कविता -

हम जो कह न सके
वो जो सुन न पाए

कुछ ऐसी बात जो दिल में रह गयी
कही गयी पर कही न गयी
सुनी पर सुनी न गयी
कुछ ऐसी बात

लिखने की तारीख – ३० जून २००७
समय – १:११ सुबह

इन कविताओं को यहाँ पोस्ट करके, ज़िम्मेदारी से मुक्ति मिलने के बाद जो आराम मिलता है, वैसा महसूस कर रहा हूँ |
अच्छा लगा बीते पल को याद कर, खुद पर थोड़ा हंस कर, और ज़िन्दगी को सलामी देकर |





असत्याभास

13 03 2009

असत्याभास

एक जवलामुखी है | फुंटता क्यों नहीं | कब तक यह आग की ठंडक मुझे सुजाती रहेगी | एक बार जल जाओं तो चैन मिले |
आग की ठंडक उसकी तपीश से भी ज्यादा दर्दनाक होती है | सुजा हुआ  ठण्ड  है | फूल गया है अन्दर दब्त्ते दबते | और कब तक दबा कर रखूँ | लाल हो रहा है | आग पिला नहीं आसमानी नीला है | छुहोगे तो जलेगा नहीं .. पत्थर बन जायेगा – उसकी जान ही  मर जायेगी | मैं मौत को लिए घूम रहा हूँ | लोग डरते हैं की कहीं मौत न आ जाये | मैं मौत को सीने के कोने में पाल रहा हूँ | नहीं मरता है और न बढता है | उस कोने में बैठे मुझपर हँसता है | मौत गले लगती नहीं और मेरा गला छोड़ती भी नहीं |

कब तक दबाये हुए रखूँ मैं इस कीड़े को | छाती में छेद हो गया है | गहरी गुफा बन गयी | बहुत अँधेरा है वहां | गहरी इतनी कि अपनी पुकार कि गूंज तक नहीं सुने देती | इसी छाती के विस्मय गुफा में कहीं रेंग रहा है यह कीड़ा | गुफा अथाह है | पता नहीं कहाँ ख़त्म होती होगी यह साली गुफा | सुरंगे बन गए है | यह नसे नहीं दीमख से लदि सुरंगे है | चिपकी दीमख बेरोक इस सुरंगों को चुसे जा रही है | चूस चूस के गला रही है | इन दिमखों से मुझे डर लगता है | इनके बीच ही कहीं चुप्पा है कीड़ा |

कीड़ा मुझे चिडाता है -

तुम में कुछ नहीं है | खाली हवा से भरी सुरंग हो | लाल  खून नहीं दीमख सड़ती है तुम्हरे शरीर में | बोली नहीं आह निकलती हैं इन दिमखों की | और इन दीमख से नीली आग निकलती है – तुम जिसे भी पाना चाहोगे उसकी जान तक छीन लोगे | मौत किसे आती है – मौत तो तुम खुद हो | खा जाते हो खुदको और आस पासवाले को | मैं तुम्हारी फिदरत हूँ, तुम्हारी जात वालों की विशेषता हूँ | मैं कीड़ा नहीं – स्वयं हूँ | देखो लो अपनी असली घिनौनी सूरत | कड़वाहट, जलन और असीमित चाह |

सारा बदन गिलगिला हो रहा है | मानो हड्डी नहीं रही | अन्दर से कोई खीँच रहा है | मांस के एक-एक रेशे तेजी से टन के टूट रहे है | छाती धधक रही है | सांस तेज़ हो रही है | खांसी आती है और गले में जलन होती है | गले से जलन हाथों को उँगलियों तक करंट की तरह देहका देती है | दीमख चबाये जा रही है और आग दर्दनाक ठंडक दे रही है | उँगलियों के छोरो में फफोले उठ गए है | उनसे पानी निकल रहा है | जगह जगह फफोले उठ गए है | दीमख पेड़ की टहनियों की तरह अन्दर खोखले किये जा रहे है | फिर उनमे आग आती है | आग सूखापन लाती है और सूखे मर्म पर पर लाल जलन | सब सुजा जा रहा है | ज़रा सा  पानी जलन को और उत्तेजित कर देता है | ये दीमख मेरे आँखों के और जीभ के पेशियों ताने जा रही है |
तेजी से उन्हें खाए जा रहा है | जल रहा हूँ | गलता नहीं और भस्म भी नहीं होता | इन दोनों छोर्रो के बीच मौत का भद्दा तांडव हो रहा है | न मौत न जीवन और अथाह तड़पन बेचैनी और प्यास.|