Puzzle Unsolved

16 03 2009

After breathing for 22 years 8 months 2 weeks 5 days 9 hours 17 minutes and counting, I realized, after reading some other blogs, that life is too short. Life is too short to fight, to hold grudge, to keep arrogance, self-appraisal and to be lazy. At the same time it seems that life is way to long to hold happiness and enjoy it.

I am saying based on my observation – what I see in my life and what I could peek into other (not that I like – I being dishonest here). Again see the use of the word “I” – everything has to start and end with this capitalized phallic symbolized letter. I must say that I have not gone through much of the difficult times as that of my contemporaries. I will not compare with the last generation because they belong to other times and had different set of resources and limitations. I never believed that I went through too much of troubles to achieve what I goaled for. Yes at times it was like I am walking on the fire lines because I was so obsessive about that specific goal. The harshness and the spirit to achieve it- were simultaneous. The fight was fierce but I was fragile for I was still dependent.

Dependency without self-respect, like bondage, welcomes any piece of gratitude or concern thrown at you. I would have been more than happy to concede the fact that I was supported but the project failed or could not be resumed for it fatal nature. However everything sorted later and the goal was achieved and the project indeed got nailed. What did I learnt out of all these mess – the emotional drama, financial catastrophes, political upheaval, and social turnover. Here I would like to philosophized that-

Only under the extreme conditions the creativity could be born.

Without the sun’s killing heat there is no enjoyment of the air-conditioning.

The flower fragrance wouldn’t smell intoxicating if there were no thorns.

Unless you don’t jump you don’t know what gravity is.

Unless you don’t go up to the top floor you don’t know what its like to be a tall building.

Without grief there is no fun in happiness.

Without obstacles there is no fun in achieving

Without opposition there is no fun in winning

………………………………….BUT I AM LAZY……………………………………….

Do I care what anyone says or writes or have their own experiences?

Well then I would say to these people that you are the luckiest mammal (human lay eggs in other’s basket) on the planet. Why? Because these are the rotten lot of losers. Not because they failed after one or numerous trials rather I hate their comfort of no competition life. Looking at these “luckies” I feel so damn jealous of their comfort life. Either they are filthy rich or they don’t have “zing” to compete just like a leech that feeds on sucking someone’s. Why aren’t they thrown into the fires of REAL life? Why should US be the only one roasting! Life is too long to be happy and too short to hold grudge.





असत्याभास

13 03 2009

असत्याभास

एक जवलामुखी है | फुंटता क्यों नहीं | कब तक यह आग की ठंडक मुझे सुजाती रहेगी | एक बार जल जाओं तो चैन मिले |
आग की ठंडक उसकी तपीश से भी ज्यादा दर्दनाक होती है | सुजा हुआ  ठण्ड  है | फूल गया है अन्दर दब्त्ते दबते | और कब तक दबा कर रखूँ | लाल हो रहा है | आग पिला नहीं आसमानी नीला है | छुहोगे तो जलेगा नहीं .. पत्थर बन जायेगा – उसकी जान ही  मर जायेगी | मैं मौत को लिए घूम रहा हूँ | लोग डरते हैं की कहीं मौत न आ जाये | मैं मौत को सीने के कोने में पाल रहा हूँ | नहीं मरता है और न बढता है | उस कोने में बैठे मुझपर हँसता है | मौत गले लगती नहीं और मेरा गला छोड़ती भी नहीं |

कब तक दबाये हुए रखूँ मैं इस कीड़े को | छाती में छेद हो गया है | गहरी गुफा बन गयी | बहुत अँधेरा है वहां | गहरी इतनी कि अपनी पुकार कि गूंज तक नहीं सुने देती | इसी छाती के विस्मय गुफा में कहीं रेंग रहा है यह कीड़ा | गुफा अथाह है | पता नहीं कहाँ ख़त्म होती होगी यह साली गुफा | सुरंगे बन गए है | यह नसे नहीं दीमख से लदि सुरंगे है | चिपकी दीमख बेरोक इस सुरंगों को चुसे जा रही है | चूस चूस के गला रही है | इन दिमखों से मुझे डर लगता है | इनके बीच ही कहीं चुप्पा है कीड़ा |

कीड़ा मुझे चिडाता है –

तुम में कुछ नहीं है | खाली हवा से भरी सुरंग हो | लाल  खून नहीं दीमख सड़ती है तुम्हरे शरीर में | बोली नहीं आह निकलती हैं इन दिमखों की | और इन दीमख से नीली आग निकलती है – तुम जिसे भी पाना चाहोगे उसकी जान तक छीन लोगे | मौत किसे आती है – मौत तो तुम खुद हो | खा जाते हो खुदको और आस पासवाले को | मैं तुम्हारी फिदरत हूँ, तुम्हारी जात वालों की विशेषता हूँ | मैं कीड़ा नहीं – स्वयं हूँ | देखो लो अपनी असली घिनौनी सूरत | कड़वाहट, जलन और असीमित चाह |

सारा बदन गिलगिला हो रहा है | मानो हड्डी नहीं रही | अन्दर से कोई खीँच रहा है | मांस के एक-एक रेशे तेजी से टन के टूट रहे है | छाती धधक रही है | सांस तेज़ हो रही है | खांसी आती है और गले में जलन होती है | गले से जलन हाथों को उँगलियों तक करंट की तरह देहका देती है | दीमख चबाये जा रही है और आग दर्दनाक ठंडक दे रही है | उँगलियों के छोरो में फफोले उठ गए है | उनसे पानी निकल रहा है | जगह जगह फफोले उठ गए है | दीमख पेड़ की टहनियों की तरह अन्दर खोखले किये जा रहे है | फिर उनमे आग आती है | आग सूखापन लाती है और सूखे मर्म पर पर लाल जलन | सब सुजा जा रहा है | ज़रा सा  पानी जलन को और उत्तेजित कर देता है | ये दीमख मेरे आँखों के और जीभ के पेशियों ताने जा रही है |
तेजी से उन्हें खाए जा रहा है | जल रहा हूँ | गलता नहीं और भस्म भी नहीं होता | इन दोनों छोर्रो के बीच मौत का भद्दा तांडव हो रहा है | न मौत न जीवन और अथाह तड़पन बेचैनी और प्यास.|





करियर

12 03 2009

सफ़र की क्या मंजिल हो

लहरों का क्या साहिल हो

माझी का क्या नाव हो

सपनो की क्या उड़ान हो

देखते थे यह सब ,सपनों में

सोचते थे यह सब, दिनों में

करते थे यह सब, खेलो में

सुनते थे यह सब, झुंडों में

किया क्या या यह क्या किया

सवाल था सीधा सा

किया वही जो सबने किया

क्या चाहा वोह न किया

पर किया वही जो सबने किया

देखो ,सुनो पर बोलो मत

घरों में लॉटरी आया

पैसे की जगह डिग्री लाया

अब आप भी बन सकते है म.बी.ऐ.

दीजे दो जवाब और १ लाख रुपये

किया वही जो सबने किया

वो माझी और लहरें फिर याद आये

कल के झुंड आज भी आये

सपनो की फूटी कटोरी में खून से लतपत अपनी कल्पना लाये





मैं आज़ाद हूँ

11 03 2009

आज अचानक  आभास हो आया है कि  सब निरर्थक है | मैं कहाँ हूँ  – किधर को  जा रहा हूँ – पता नहीं | लगता है कि जहां से भी शुरू करूं सब वहीं आकर ख़त्म हो जाता है | सब शून्य में मिल जाता है | अँधेरे में सर दीवार से लग गया हो | अन्धेरें में सालों सड़ रहे हो | हाथों की ऊंगलियों से दीवार को महसूस कर रहा हूँ | दम घुट सा रहा है इस अँधेरे में | चीख रहा हूँ पर आवाज़ नहीं निकल रही | बहुत कोशिश कर रहा हूँ मगर सिर्फ हवा निकल रही है | एक पत्ते की तरह  टूट कर गिरने के लिए तिलमिला रहा हूँ | इस घुटन ने मेरा गला पकड़ रखा है | पाव में जैसे ज़ंजीर है | दीवार चढ़ कर पार कर नहीं सकता | अँधेरे मैं कुछ दिखाइए नहीं देता | दीवार पर चडू भी  तो कैसे – न कोई रस्सी है और न कोई साधन | अपनी झुंझलाहट नाखूनो  को दीवार से रगड़ कर निकाल रहा हूँ | पत्थर है सब, टूटे-फूटे, कंटीले | दीवार की छाती पर मुक्के मार रहा हूँ | यह दीवार सरकती क्यों नहीं | मैं यहाँ क्यों फंसा हूँ | कोई मेरी आवाज़ सुनता क्यों नहीं | सब कहाँ मर गए है ? पूरा बदन जल रहा है | मानो इस पत्थर की दीवार से आग निकल रही है | जैसे चीताह अपने  मुंह में हिरनी के बच्चे की गर्दन को दबोच लेता है उसी तरह यह आग और अँधेरा मेरी हर सांस को दबोचे जा रही है |

मैं क्यों जी रहा हूँ | क्या मूल्य है मेरा आबादी से भरे इस दुनिया में | कीडे की तरह कई जनमते है और कीडे की तरह मर जाते है | जीना क्या है – एक उम्र की अड़ियल उबासी या एक गुबारे के फूलने और फोटने की बीच की मौज |

इस छोटे से अंधेर कमरे में, छह ओरो से घीरे , ये पत्थर की दीवारें मुझपर हंसती है | इनकी हंसी मेरी हर कोशिश पर जोर हो जाती है | मैं इनको नोंचता हूँ, चीरता हूँ , धकेलता हूँ | हर कोशिश की उलाहना करती है हर एक ईंट | मुझे कोसते  है –

तुम भी यहीं साडोगे | इन्ही आग की तपीश में गल जाओगे | नोचो हमे जितना नोचोगे   हमे उतना मज़ा आएगा | तुम्हे यहीं सड़ना  है | यहीं साडोगे – मिट्टी में कईयों की तरह मिल जाओगे | कौन जी सका है यहाँ ? किसे मिलती है मुक्ति ? रेंग रेंग कर मरोगे | तुम आदमजात हो ही इसी लायक ! तुम में और जानवर में कोई फर्क नहीं है | पैदा कर दिए जाते हो – पल भी जाते हो – फिर कैद हो जाते हो !

मैं दोनों हाथो से अपने कानो को बंद कर रखा हूँ | पर इनकी हंसी पहुँच हो जाती | मेरी आखें बड़ी-बड़ी हो गए है | इन दीवारों पर चीख -चीख कर गालियाँ दे रहा हूँ – चुप हो जाओ , सालो | हंसी गूंज रही है – चारों और से | में कानो को जोर से बंद किये हूँ | कानो को दबाते हुए सर हिला रहा हूँ और दम भर के चीख रहा हूँ – नहीं , नहीं | उकड़ू होकर बैठ गया हूँ | सर को अन्दर किये हुए हूँ | नहीं नहीं करते मेरी छाती झटकी | गला सुख रहा है | उबाकी आई और सांस अन्दर अटक गयी  |  घबराहट से फिर छाती झटकी और सुबकना फूंट के निकला | जैसे कमज़ोर बांद की बूडी ईंट नदी के  पानी को डट कर रोकने की कोशिश करती है पर पानी का तेज़ उस बूडी ईंट को एक फूँक में गिरा देती है और एक-एक करके पूरा बांद दह जाता है |

उकड़ू बैठे, सर को घुटनों और छाती के बीच लगाए, मेरा सुबकना तेज़ हो रहा था | मैं अपने आप को और समेटे जा रहा था जैसे ठण्ड में कुत्ता  गरमाहट पैदा करने के लिए खुद को समेट लेता है |

…. और आज़ादी मुझमे ही सिमटने लगी |





झींगा खेला

3 03 2009

बांगला चलचित्र (फिल्म) “खेला” २००८ में निकली एक बंगाली फिल्म है जिसे रितुपर्णो घोष ने निर्देशित किया है | मैंने यह फिल्म youtube पर देर रात को देखी थी | कुछ बंगाली फिल्म निर्देशक मेरे प्रिय है – सत्यजित राय , अपर्णा सेन, रितुपर्णो घोष, बप्पदित्य बंदोपाध्याय, मृणाल सेन | इनके चलचित्र अंतरराष्ट्रीय स्तर के होते हैं | ये , इंडिया की पृष्ठ भूमि पर आधरित, लोगों की भावना, सोच, रिवाज, चाहत, अहम् और स्थिति को अपने फिल्मो में दर्शाते है | ज़ाहिर है इनकी फिल्मों में मानवीयकरण ही होता है | एक इंसान या परिवार, या प्रान्त को लेकर उनपर अपनी कटाक्ष टिपण्णी देते हैं | सत्यजित अपने प्रमुख पात्र का मनोविज्ञान को प्रस्तुत करते थे या स्थिति की दशा, चाहे सुदशा हो या दुर्दशा, को दर्शाते थे | ये सभी नोर्देशक neo-realist या poetic-realist है | अर्थात सच को कठोरता से नहीं दिखलाते | मगर मिठास्ता भी नहीं डालते | देखने पर चलचित्र – बनावटी ही लगता है पर सचाई की अनुभूति होती है | पात्र सुख-दुःख दोनों से गुज़रते है| यूँ लगता है की हम दूर बैठे देख रहे है | इनकी कहानी में वार्ता और फिल्म स्थापन मज़बूत होता है जिससे दर्शक उसी माहौल और भाव में लीन हो जाता है |

खेला में ये सभी तत्व प्रस्तुत है | फिल्म की कहानी में नहीं बोलूँगा बल्कि फिल्म निर्देशन बारे में कहूँगा | फिल्म का स्थापन पश्चिम बंगाल के दुआर – दार्जिलिंग, कुर्सेओंग – में है जहां फिल्म निर्देशक राजा (प्रोसेंजित चटैर्जी) अपनी पहली फिल्म की शूटिंग करते हैं | दुआर के हरे -हरे जंगलों में शूटिंग होती है | पथरीला रास्ते, बारिश और लोगों का स्वेटर पहनना होना – यह सब दर्शक को दुआर तक पहुंचा देते हैं | चलचित्रकी (cinematography) सामान्य है | फिल्म कलकत्ता (भूतकाल) और दुआर (वर्तमान) के बीच डोलती है | हर फिल्म की तरह इस फिल्म में भी रबिन्द्रसंगीत का एक गाना है जो मनीषा कोइराला गाती है | हर फिल्म की तरह, रितुपर्णो एक वस्तु को चुनते हैं, जो पूरी फिल्म तक रहता है और फिल्म का प्रतीक बन जाता है | इस फिल्म में एक काच के शीशी में बंद कीडा (caterpillar) है जिसे बंगाली में “झींगा” भी कहते है | झींगे का तितली में परिवर्तित होना मगर शीशी में ही बंद रहना – उड़ान को कोशिश करते रहना – इस फिल्म का प्रतीक है जो अंत में नज़र आता है |

अभिनय :

मुझे प्रोसेंजित का अभिनय मनीषा से बेहतर लगा | प्रोस्नेजित की कलात्मकता उसकी उम्र की तरह बढती जा रही है | राजा के पात्र को उसके मेक-उप और हेयर-स्टाइल से सहा

झींगा खेला

झींगा खेला

यता मिली | कुछ एक जगह मनीषा का अभिनय बनावटी लग रहा था | रायमा सेन ने अच्चा भीने किया | एक सीन में उनका रोना बनावटी लग रहा था | प्रोसेंजित ने एक ठूठ, निराश और आततायी की भूमिका को अपने आखों और चुप्पी से प्रर्दशित किया | कहीं भी अतिशय नहीं किया | किरदार को सहज रूप से निभाया | बाल-पात्र – अभिरूप ने अपने किरदार को सरलता और कुशलता से निभाया |

कहानी :

कहानी  बहुत ही सरल है | मगर इसके निर्देशन ने नहानी को मजबूती दी | भूत और वर्त्तमान के बीच कहानी का डुलना – कहानी में कसाव लाता है जिससे कहानी को मजबूती मिलती है | प्रतीक का इस्तमाल करने से कहानी को साकार रूप मिलता है | इसकी कहानी में शूटिंग को दिख्लारकर इसे रोमांचक बनाया है | साथ में राजा और अभिरूप के बीच हुए समझौते की अनिश्चितता भी जिज्ञासा और रोमांच जगाती है |

यह फिल्म में दुपहर के वक्त अकेले या अपने साझेदार के साथ देखने की अनुशंसा करूँगा |

कुल मैं ४/५ दूंगा | साथ ही इसे देखने का आग्रह भी करूँगा |

धन्यवाद