श्रद्धांजलि

4 04 2009

श्रद्धांजलि

आज बहुत दिन बाद कुछ वक्त मिला है तो लिखने की ज़रुरत महसूस हो गयी | शायद खालीपन मुझे पसंद नहीं या कुछ करते रहने की अदा बन गयी है | मैं सपनो अहम् मानता हूँ | हमारी चाहत, डर, पूरानी यादें, सपनो में उभर कर आते हैं – ऐसा मेरा मनना है | यूँही कल सपने में मैंने अपने आँखों के सामने खोये हुऐ लोगों को देखा | वो लोग जो परिवार के सदस्य थे और उनसे मैं बहुत या थोड़ा बहुत घुला-मिला था | उनकी याद अचानक मेरे सपने आई और आज पूरे दिन मेरे साथ रही | इसीलिए मन कर रहा कि इन्हें लिख कर अमर कर दूँ |

इनमे से सबसे पहले हैं मेरी परदादी (great grandmother from father side) – श्रीमती कमला देवी जालान | हम बच्चे उन्हें दादीमा कह कर बुलाते थे | शायद उनकी उम्र नब्बे या ज्यादा थी | उनकी एक साफ़ तस्वीर मेरे दिमाग में छपी हुई है | कंप्यूटर में भी एक फोटो है|

मैं शायद बारह या तेरह वर्ष का था जब उनका देहांत हुआ | मैं उन्हें बहुत अच्चे से नहीं जानता था  | वो हमारे  साथ ही रहती थी | मगर अपने अलग कमरे में | उन्हें चीजों को बंटोरने का बहुत शौक था | अपनी बहु यानि मेरी दादी की बुराई सुनने का या उनकी बुराई करने का भी बहुत शौक था | उनके  ऊपर के जबड़ों की दो दान्तें बहार निकली हुई थी | अपने मोटे से चश्मे को लगाये, ज़मीन पर बिछाई धुल से भरी गद्दे पर एक सामान की तरह सांस लेती थी | उनकी सबसे अनोखी चीज़ थी उनकी लाठी | अपने लाठी के सहारे वो पुरे अपार्टमेन्ट में चलती-फिरती थी | मैं छोटा था | लाठी को लेकर उन्हें तंग करने में मज़ा आता था | शायद मैं उन्हें इंसान की तरह नहीं बल्कि एक बड़े से खिल्लोने की तरह समझता था क्योंकि घर पर उनके आलावा कोई लाठी नहीं रखता था और न ही कोई मोटा चश्मा पहनता था |  याद नहीं है कि मैंने उन्हें कभी बिन चश्मे के दिखा हो | नाक में नथुनी, कान में बड़े छेद, गले में पतली-सी मनका और जगह-जगह  बड़े-मोटे-छोटे-लटकते भूरे तिल | होंठ कटे हुए , शायद उनकी बहार निकलती दो पिली दान्तें ने उनके होंठ पर बहुत अत्याचार किया होगा | गाल लटके हुए , साफ़ ठुदी, और आखों के नीचे जीवन के संघर्ष के गीत को गाती नरम लहरें दार छोटी-छोटी झुरियां |गले की झुरियां पूरी  तरह लटकी हुई जैसे विद्युत् के खंभे के बीच लटकती तारें |

उनकी आखें, जहाँ तक मुझे याद है, पिली और सफ़ेद थी |  मुख की विशेषता उनका ललाट था – विशाल और सम गोलाई आकार | भौहें और सर के बाल के बीच मानो एक लम्बा सफ़र हो| ललाट पर झुरियां थी | अपनी पतली-सुखी और भूरी-चांदी सी रेशों जैसी बालों पर कभी कभी नारियल तेल लगवा कर लाल फीते की चुटिया भी बनवाती थी |

उनके हाथ मानो पानी से भरी थैली हो जिसे हड्डी से चिपका दिया हो – नरम और दब-दबा सा | एकदम ढीली चमड़ी – इतनी ढीली की झुरियों ने उसे समेट रखा था | मुझे उन झुरियों पर हाथ फेरने पर अच्छा लगता था | इतना नरम और नाजुक और कितना अजीबो-गरीब | हाथों की उंगलियाँ छोटी-छोटी सी और पतली-पतली सी – सीख के काटों जैसी – जिसपर चमड़ी की ढीली मरहम-पट्टी कर दी हो | कांटो जैसे नाखून – पीले – सफ़ेद – उनपर लम्बी काली धारियाँ और बिलकुल कड़क | हथेली मानो स्पोंज के बिस्तर की तरह दब-दबा सा | इतने रेखाएं – कुछ गहरी – कुछ पतली |

और सबसे ख़ास बात थी उनकी नाभि | अक्सर नाभि एक गड्ढे की तरह होता है – मगर मेरी परदादी की नाभि उलटी थी – मानो नाभि पर एक नहुत छोटी सी चमड़ी की छत्री रख दी हो और गड्ढे की जगह चमड़ी की ढाल बन गयी | उनकी आवाज़ में तेजी थी |

इतनी उम्र के बावजूद उनका चिल्लाना भयंकर था | उनके फेफड़े में दम और आवाज़ में जोर था | थोड़ी फटी हुई और थोड़ी पतली आवाज़ थी | हर बोली के साथ उनका पेट और उनकी छाती झटकती थी – मानो हर बोली गले से नहीं  बल्कि शरीर के किसी अजूबी कोने से दम भर के, एक-एक करके निकाल रही हो –

“ऐ बिन्नी .. देख तेरो छोरो के कर रो ऐ”

“आ .. अठिने आ ..तने चीजे दूँ “

” बेटा मेरी लाठी ला दे … अरे करम फूटे दे दे”

करम फुटा उनका पसंदीदा शब्द था – हा हा |

उनके पाव के तरफ कभी नज़र ही नहीं गयी  | उनका कपड़े पहनने का अपना अंदाज़ था | उनका blouse पेट तक झूलता रहता था – नीचे के कुछ बटन टूटे हुए या खुले हुए – कंधे के हड्डी में अटकी, कोहनी तक झूलती रहती थी | blouse  की पीठ ढकी हुई और गला गोलाई आकार में कटा हुआ | सादे peticoat के ऊपर पतली सूती की साड़ी | साड़ी से, सीने की बजाये, पीठ को ढकती थी और फिर सर को | नाभि के नीचे साड़ी की अजीब गुथी थी जो मुझे हमेशा रहस्यमय लगती थी जैसे उसमे उन्होंने कुछ छुपा कर रखा हो | उस गुत्थी और blouse  के बीच कड़ाई जैसा गोल आकार का फुला हुआ पेट और उसपर छत्री वाली नाभि – मुझे छोटी उम्र में वो एक अलग प्राणी लगती थी | घर पर कई बार , अपनी आलस्य से या मज्बोरी से. सिर्फ blouse  और peticoat में रहती थी|

हर शाम को अपने कमरे से निकल कर लाठी पकड़कर बहार livingroom (hall) में प्लास्टिक कीगुलाबी कुर्सी में शान से जम जाती थी |  अपने उम्र और घर के सबसे बड़े होने का फ़ायदा उठाती थी –

“अरे झाडू ठीक से निकाल”

“अरे छोरा खेल बंद कर”

“आने दे तेरे बापू ने आने दे”

कान्कुरगाछी में आने के बाद मैं उन्हें जानने लगा और अन्य सदस्यों का उनके प्रति व्यवहार भी समझने लगा | इससे पहले गणेशगढ़ में  मैं उनसे डरता था क्योंकि वो एक दूर अंधेर कमरे में अकेली रहती थी | कोई उजाला भी नहीं था | अजीब बात है मैं अपनी दादीमा को ही नहीं जानता था जबकि वो हमारे साथ रहती थी | कांकुर गाछी आने के बाद मुझे लगता है उन्हें भी सदस्य होने का गर्व मिला होगा और अपनी अहमियत लगी होगी |

उन्हें खाना देना या खाना खिलाना एक बड़ा ड्रामा होता था | मेरी माँ (दादी) का उनपर चिल्लाना , मम्मी और चाचियों का नज़रंदाज़ करना | मुझे उस समय पता नहीं था कि यह सही है या गलत | छोटी उम्र मैं हम मान लेते हैं कि जो बड़े करते हैं वही सही है और हमे भी वही करना चाहिए | अभी सोचता हूँ तो यह बात भी मानना पड़ेगा कि मेरी दादीमा भी तंग करने में कुछ कम नहीं थी | उन्हें खिलाना, नहलाना, पेशाब ले जाना, गंदे कपड़े की धुलाई और न जाने क्या क्या जो मेरी माँ (दादी) ने बिना किसी को बताये किया होगा |

उनके देहांत के समय की कुछ यादें ताजा करना चाहूँगा | नवरात्री का समय था – महीना या तारीख याद नहीं | घर पर पूजा रखी थी | एक मोटे से पंडितजी  आते थे जो बहुत पुराने जान-पहचान के थे – लाल टिका लगाये, रुद्राक्ष पहने , मोटे, काले बाल और चोटी | सप्तमी को भोर चार बजे, ब्रह्म मुहरत में उनका देहांत हुआ | मुझे उस समय यह सप्तमी, देहांत, ब्रह्म मुहरत क्या होता है पता नहीं था | मगर यह वाक्य , जो बडो के मुह से मैंने कई बार सुना था – मेरे दिमाग में बैठ गयी |  देहांत की रात, डॉक्टर र.डी. अगरवाल समेत घर के सभी लोग उस कमरे में बैठे थे | शायद पहली बार (और आखरी बार) उस कमरे में इतनी भीड़ इकठा हुई होगी | परमेश्वरी भुआजी भी थी शायद |

सबसे पहले शानू चाची को पता चला क्यूंकि वो दादीमा के कमरे की बाथरूम का इस्तमाल करती थी | शायद सुबह के छह बजे होंगे या उसके आस-पास | पता नहीं शानू चाची को कैसे लगा होगा – एक मृत शरीर को देख कर | फिर क्या –  हिन्दू धर्म का बड़ा विस्तृत उत्सव |

मैंने अपनी ज़िन्दगी में पहली मौत देखी थी | पता नहीं था कि ये सब क्या हो रहा था | इतनी सजावट, फूल,-फल, पापा लोगों का धोती पहनना | दादीमा के शरीर को नहलाना, फिर कपड़े पहनाना, माला पहनाना.. यह सब इतनी जल्दी हो रहा था मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था | मैं, घर के पुरुषों के साथ , टेंपो में बैठ कर घाट पर चला गया मगर उनकी चिता नहीं देखी |

अब बाईस साल की  उम्र में दस साल पुरानी बात को याद करने की कोशिश कर रहा हूँ –

क्या उनके जाने का दुःख था मूझे ?

क्या मुझे लगा कि मैंने  किसी को खो दिया है ?

क्या किसी  को उनकी कमी या मूझे उनकी कमी महसूस हुई ?

इन सब सवालों का जवाब पता नहीं है | तो शायद इन सवालों का जवाब नहीं होगा | उनके जीवन के बारे में तो ज्यादा नहीं जानता मगर इतना ज़रूर कहूँगा कि उनमे स्वाभिमान था | अपने बेटे से बहुत प्यार था – इतना प्यार शायद उसके लिए वो अपने स्वाभिमान को भी न्योछावर कर दे | हकीकत से वाकिफ थी – इतने साल अकेले गुजारना हिम्मतवालों का ही काम होता है |

घर के बड़े कहते हैं कि उनमे दिव्य शक्ति थी – हनुमानजी की | वो मेहंदीपुर जाकर एक महीने तक पाठ-पूजा करती थी | घर के बडो का मानना है इससे उन्हें सिद्धि मिली | पता नहीं उनमे सिद्धि थी या नहीं मगर मैने उन्हें कभी मौत का इंतज़ार करते नहीं देखा | ऐसे नहीं था की वो जीना नहीं चाहती थी या जीने से उब गयी हो |

वो एक बहादुर औरत थी और ऐसे ही मैं आपको याद रखना चाहता हूँ – दादीमा |

आपको हार्दिक श्रद्धांजलि  |

दादीमा, 1998 में

कमला देवी जालान (दादीमा), 1998 में

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