रक्स

14 05 2009

चलाचल हूँ मैं
एक अंधेर नगरी को
ढुँढता हूँ रौशनी

दम घुटता है
कुछ अच्छा नहीं लगता
पर चलना है , गुजरना

क्या था क्या हो गया
ख़त्म करना है
मझधार में क्यों अटका
न इधर का न उधर का

रुक गयी है हवा
और बस है इंतज़ार
चलाचल हूँ मैं

मिलती हैं कहीं एक किरण
पकड़ने की होड़
ज़रा सी चमक कंटीले कई

तेज़ हो रहा है
तेजी से जा रहा है
धमाक –
एक अघोर सन्नाट्टा, चुप्पी

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