कौआ छू गया

11 06 2009

यह एक मज़ेदार प्रसंग है | मर्द और औरत दोनों ही इस बात को बड़ी दिलचस्पी से लेते है | मगर बूढ़े

कौआ छू गया

कौआ छू गया

लोग – शरीर से या  दिमागे से बूढ़े लोग – इसकी बात करने को क्रोधी नज़र से देखते है |

ऐसा ही कुछ था मेरे भी परिवार में| छोटा था तो सब कह देते थे कि “यह बडो की बातें है”| मुझे समझ में नहीं आता था कि बडो की बातें तो स्कूल में सिखाई जाती है तो यह कौन सी बात है जो स्कूल में भी नहीं सिखाई जाती ? अपने मम्मी या पापा से इस बारे दुबारा पूंछने की हिम्मत ही नहीं होती थी | अगर दुबारा पूंछ लिया तो मानो क़यामत आ गयी | झडक के सुनने मिलता “एक बार बोलने से समझ में नहीं आता है क्या तुमको ?” और अगर अपने दादी या दादा से पुँछ लिया तो गज़ब हो गया “आजकल के छोरा छोरी ने लाज-सरम कोणी रह्यो – जा आपणी माँ ने पूंछ” |

आखिर क्या था जो पूरे परिवार के लिए एक वर्जित, घिनौना, अमान्य विषय था | उस बात के बारे में जिज्ञासा होना और जिज्ञासा होने पर पूंछने पर इतनी रोक क्यों थी ? जिज्ञासा जागना वर्जित क्यों था ? क्या इतने डरवाने थे वो दिन | क्यों उस बात से बड़े चिड़ते थे – बात करने में हिचकिचाते थे, शर्म महसूस करते थे | आखिर क्या था ?

वो दिन मानो घर की औरतों के लिए श्रापित दिन था | शायद घर के मर्दों के लिए भी | पूरे घर की दिनचर्या ही बदल जाती | ऐसा क्या अजूबा होता था हर महीने ? कभी किसी ने इसके बार में ज़िक्र नहीं किया | कारण ? पता नहीं | बचपन में मुझे सुनाया जाता था एक वाक्य, और धीरे-धीरे मैं यह वाक्य, अपनी कल्पना अनुसार, सिख भी गए | उस वाक्य को सुनकर मुझे आज भी हंसी आती है और मैंने इस वाक्य से जो कल्पना बनाई उसे सोचकर ज्यादा हंसी आती है | बड़ा मासूम वाक्य  है –

कौआ छू गया

महीने में कम से कम एक बार कुआ छू के चला जाता है | कब और कैसे ? पता नहीं | मगर कुआ घर में घुस कर किसी को छू देता है और वह चार से सात दिन के लिए श्रापित हो जाता है | कहीं मुझे आकर न छू दे इसलिए मुझे कौवे से घृणा और डर होना लगा जो आज भी कायम है और शायद ज़िन्दगी भर रहेगा| क्योंकि घर के मर्द काम पर चले जाते थे इसलिए वो कौवे से बच जाते थे | मगर घर की औरतों को कौवे का सामना करना पड़ता था | एक कबड्डी के खेल की  तरह होता था – कौवे को भगाना है और साथ में ध्यान रखना है कि कौवा छू नहीं पाए | अगर कौवे ने छू दिया तो कौवे की जीत हो जायेगी | उस खेल में आज तक ऐसा नहीं हुआ कि कभी कौवे की हार हो | अब क्या ? मैदान में हारे खिलाडी की तरह, अपने आप को आत्मसमर्पण करना पड़ता था |

एक रुढ़िवादी मारवाडी संयुक्त परिवार में, उस खिलाडी को उस हार की सजा मिलता है | यह सजा मुझे आज तक नहीं समझ में आई | किसने बनाई यह सजा | इन सजाओं को क्यों माना जाता है | खिलाडी उस सजा क्यों चुपचाप सह लेता है | समयानुसार देश और राज्य के नियम-कानून बदलते रहते है मगर इस कानून में कोई परिवर्तन क्यों नहीं आया ?

यह सजा जितनी जाली लगती है उतनी ही हास्यमय भी लगती है | और हसी की बात यह है कि लोग ख़ुशी-ख़ुशी इस सजा को सहते भी है और दुसरे पे होते देखते भी है | आखिर एक रुढ़िवादी मारवाडी संयुक्त परिवार में कौवे से हारने की क्या दिलचस्प सजा मिलती है –

तुम्हे छुआ नहीं जायेगा | अगर भूल से कोई तुम्हे छू दे तो उसे सबसे पहले नहाना पड़ेगा | उसके कपडे भी “अशुद्ध” हो जायेंगे इसलिए कपड़ो पर तुंरत पानी डालना होगा | पानी डालने से “अशुद्धता” चली जायेगी |

तम्हारे खाने के बर्तन अलग होंगे | तुम सबके साथ बैठ कर नहीं खा सकते | तुम्हे अपना बर्तन अलग रखना होगा और उसकी सफाई भी अलग जगह करनी होगी | भूल से अगर कोई तुम्हारे खाने से निवाला ले ले तो वह “अशुद्ध” हो जायेगा | भूल से अगर तुम्हारे बर्तन से अपने बर्तन को छू दे तो उसका बर्तन भी “अशुद्ध” हो जायेगा | उसके बर्तन की सफाई भी तुम्हे करनी होगी | बर्तन में छाई और पानी लगने से बर्तन की “अशुद्धता” चली जायेगी |

तुम्हारा बिस्तर भी अलग होगा | चादर, तकिया और ओड़ना भी अलग होगा | ये सारी चीजे “अशुद्ध” होंगी | किसी भी “शुद्ध” चीज़ के छूने पर “शुद्ध” चीज़ “अशुद्ध” हो जायेगी | यानी अगर तुम्हारे बिस्तर पर कोई “शुद्ध” व्यक्ति सो जाए तो तुम्हारे “अशुद्ध” चादर और तकिये के स्पर्श से वह व्यक्ति “अशुद्ध” हो जायेगा और उसके कपडे भी | पानी डालने से वह व्यक्ति फिर “शुद्ध” हो जायेगा और उसके कपडे भी |

तुम्हारे कपडे भी अलग ढेर में रहेंगे | अपने कपडे की सफाई अलग जगह करनी होगी | क्योंकि उतारे हुए कपडे “अशुद्ध” माने जायेंगे इसलिए उनपर तुंरत पानी डालना होगा – खोई  “शुद्धता” को वापस लाने के लिए |

तुम्हारा रसोई और मंदिर या पूजा-स्थल में जाना वर्जित है | यहाँ तक कि तुम्हारी परछाई भी पड़ना, उन “पवित्र” स्थानों पर महापाप है | अगर तुम रसोई या पूजा-स्थल में गए तो तुम कुल का नाश कर दोगे और सबको तुम्हारा “पाप” भुगतना पड़ेगा |

तुम्हारे शरीर में होते उतार-चडाव के कारण, अगर मानसिकता में बदलाव आये जैसे – ज्यादा खून बहने पर कमजोरी और उदासी महसूस करना, या नहीं बहने पर क्रोधी और उत्तेजित महसूस करना – तुम्हारी एक नहीं सुनी जायेगी | बल्कि तुम्हे और तिरस्कृत रूप से देखा जायेगा |

“शुद्ध” और “अशुद्ध” के खेल को ख़त्म करता है मुन्सिपालिटी का पानी | पाँचवे दिन से तुम्हारी सजा कम कर दी जायेगी | सांतवे दिन को तुम्हे रिहाई मिल जायेगी |

मगर कौवा बड़ा चालक है | वह मौके की तलाश में हमेशा लगा रहता है | यह कबड्डी अभी ख़त्म नहीं हुई | तेरह वर्ष की आयु में लडकियां कौवे से खेल करना शुरू करती देती है और पंचास साल की उम्र के बाद निवृत्ति (retirement) प्राप्त करती है | जब तक खून लाल है, तब तक खेल जारी रहेगा | और सजा भी रहेगी | या सजा रहेगी नहीं ?

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5 responses

12 06 2009
anil pusadkar

शहर मे तो नही गांव यानी ननिहाल जाने पर कौए के छुने का पता चलता था।

12 06 2009
santosh jalan

I surprised read it ,childhood emotion showing in this article. Realy conservative
thought are curse for humen being.But i am also follow this rule now. If i want to come out from that i cant because the culture is deep since childhood.

22 05 2010
diksha

i dont like this at all

22 05 2010
diksha

i like this note as it is ………..

29 08 2012
अनाम

मारवाडीछोरीसेकसी

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