अंतरिम

12 10 2009

क्या है, क्यों है, कैसे है
सोचता था
जब पाया तो बहुत खुश हुआ

उसके बाद क्या ?
पाया, वो मिल गया
अब कहाँ, किधर, किसको

ढूँढना, चाहत, प्यास, होड़, जिद्द
-लक्ष्य के अनेक रूप है

पर मैंने एक नया रूप पाया
-अलक्ष्य से लक्ष्य का लक्ष्य

शून्य !

अंतरिम, मध्यांतर, ढील, पड़ाव
-का एहसास अजीब है |
हलके कंधे होने जैसा –
पहले आराम, फिर आनंद, और फिर शुन्यता |

न चाह, न उत्साह, न क्रोध, न आनंद, न ख़ुशी और न उदासी

बस मस्त हवा में लहराती – डालों की तरह
बस अपने रास्ते  की मगन – नदी के पानी की तरह
बस अपने गीत गाती – सुबह की चिड़ियों की तरह

लक्ष्यहीन नहीं,
अलक्ष्य ज़िन्दगी !