बस एक पल

22 12 2018

हर पल एक शूल है
याद आती है वे रातें
जब कोयले की लाल से सेकते थे जिस्म
सौंधे-सौंधे से लपटों की तपिश में
जन्मते थे पल

मखमली सी शाम ढलती रात की पनाहों में
दम तोड़ती एक सांस, सूखी हवाओं पर

अब वह एक चाह
खिलती नहीं उन कोयलों की लाल पर
बूझने की कोशिश में
वोडका व्हिस्की की बर्फ पिघलाती है

वह रात अजीब थी
चांदनी की चमक से झिलमिलाती गोरी
एक दरवाज़े ने दस्तक दी, खुली एक दावत
वो अपने रूह को जिस्म से सिमटाते
कदम तेज़ी से बढ़ाये, हलकी मुस्कान दिए
आगे टक टक किये, बढ़ गयी
जा घुल गयी शाम की धुंधली कालिख में

मैं अकेला उसकी दरवाज़े की पहरेदारी में
उसे, समय के साथ फिसलते, देखता रह गया

एक अंधेर कोठरी सी, गर्भ जैसे मुझे डाह के रखे
जनमू मैं कैसे?
जब एक जान अटकी हो, फांसी की सज़ा पे
अटक सी गयी है ज़िन्दगी
ठहरी हुई, कटी हुई
पुकारती है, मगर सुने क्या
चीख है अंदरूनी, तेज़ाब है अंदरूनी
जलन है अंदरूनी, तड़प है अंदरूनी

अब जिस्म जलता है, उन कटीली यादों से
अब होश उड़ते है, उन महक की छिड़क से
अब दिल रूकता है, उन चेहरों की छाप से

काले सायें तैरते है
उन काली नालियों में
जो दिल की गुफाओं से उड़कर
मन के खँडहर तक पहुँचते हैं

यह काले सायें मेरे दोस्त बन गए है
इन्हे छेड़ूँ, तो माज़ी खिलते है
यह माज़ी मेरे सायें है
जीने के सहारे हैं

बार बार इसमें नहाके
इस पल को मदहोश करके
और एक दिन बूज जाए

जाग जाती है वे रातें
जब कोयले की लाल पलों को जन्मती थी
रेशमी जिस्म, उन मखमली मौसम में
ज़िंदा होकर दम तोड़ती थी

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