कच्चे

5 11 2011

कच्ची धूप का सिरहाना लिए
उस मोड़ की पतली डगर
पिपली पेड़ का कोना लिए
दूर कहीं गोता लगाये

आओं चले हम
कहीं ऐसी नगर को
जहाँ अपनी ही दुनिया हो
अपनों में ही दुनिया हो

मीठी-मीठी सी खुशबू
घुली मिटटी का ओछा लिए
चुटकी भर सीत हवा, गुदगुदाए

वादियों से सिला रुस्तम कोहरा
धीमी-धीमी, धुंधली-धुंधली
ठहरा हुआ, सिमटा-सिमटा ये समा

रुके क्यों, क्यों थमे
थामे हाथों में हाथ, उगे

एक-एक कदम बुने उस कच्ची सड़क पर
सुरली डंडी पर तोड़ते दम
आए, हम आए लिप-लिपि सी बादलों को चीरकर

चांदी के चाँद को पीए
चांदनी के लेप से नहाए
कस-कसकर चूमे नरम रेशमी हवाएं
भर-भरकर सिसकती सिसकियाँ

सुनहरी धूप का कुल्हा किए
ज़िन्दगी जिंदादिली की गुन-गुन
महक कच्चे आम का
किर-किरहाये रूठे भुरे पत्ते

चले हम, फिर से, नज़र में धूल जिगर में गुब्बार लिए





कुछ रिश्ते

2 07 2010

कुछ रिश्ते
न कहे जाये. न बोले जाये,
न सुने जाये, न देखे जाये

बस होते हैं
बेनाम –
गुमनाम या बदनाम

लिख जाते हैं, अमर प्रेम
पा जाते हैं खिताब

खतरनाक होते हैं ऐसे रिश्ते
लांघ जाते हैं दीवारें
टूट जाते है, बिखर जाते हैं
देते देते अंजाम

बस होते हैं
ऐसे कुछ रिश्ते

पाने की ख्वाहिश
उड़ने की चाहत
मिलने की प्यास
रहने की तड़प

गुलज़ार की जुबानी –
ज़िन्दगी तेरे ग़म ने रिश्ते नए सिखलाये





प्रतिबिम्ब

21 05 2010

अकेलेपन के साए सच लगते हैं
इस अंधेर कमरे में कुछ ढूँढता
एक कदम लम्बे रास्ते
चले थे एक, निकले कई

थामे वक़्त का हाथ दूर निकल आये
अरसा लगता है पल-पल
पिछड़े मोड़ पर थमे थे
न मूड़ सके हम, रुके कई

यह कैसी है जंजीरें पैरों में
लिए फिरते है सीने से लगाये
अदा बन गयी है इसकी
उठा लिए हर बार, गिराए कई





Praan प्राण প্রান

19 03 2010

Performed by Matt Harding. Music by Gary Schyman. Sung by Palbasha Siddique.

Penned by Rabindrnath Tagore. Published in his Nobel award winning book of Bengali poetry, Gitanjali, in 1910.

It took 100 years to understand this poetry and make others understand!

SING ALONG – Dedicated to my sister on her birthday and her baby

Praan

Bhulbonaar shohojete
Shei praane mon uthbe mete
Mrittu majhe dhaka ache
je ontohin praan

Bojre tomar baje bashi
She ki shohoj gaan
Shei shurete jagbo ami

Shei jhor jeno shoi anonde
Chittobinar taare
Shotto-shundu dosh digonto
Nachao je jhonkare!

– Rabindranath Tagore
The same stream of life that runs through my veins night and day runs through the world and dances in rhythmic measures. It is the same life that shoots in joy through the dust of the earth in numberless blades of grass and breaks into tumultuous waves of leaves and flowers. It is the same life that is rocked in the ocean-cradle of birth and of death, in ebb and in flow. I feel my limbs are made glorious by the touch of this world of life. And my pride is from the life-throb of ages dancing in my blood this moment.

प्राण

भुल्बोना आर शोहोजेते

शेई प्राण इ मों उठबे मेटे

मृत्तु माझे ढाका आछे

जे ओंतोहीं प्राण

बोजरे तोमार बाजे बाशी

शे की शोहोज गान

शेई शुरते जागबो आमी

शेई झोर जेनो शोई आनोंदे

चित्तोबिनार तारे

शोत्तो-शिन्धु  दश दिगोंतो

नाचाओ जे झोंकारे

– रबिन्द्रनाथ टगोर

वही जीवन की धारा जो मेरे नसों में दिन-रात दौड़ती है, इस पृथ्वी में भी दौड़ती है और ताल-लय पर नाचती है| यह वही जीवन धारा है जो धरती की मिट्टी को चीर कर अनगिनत घास के बाण बन जाती है या पत्तियों और फूलों के लहर बन जाती है | यह वही जीवन धारा है जो महासागर में है – जीवन और मरण का पलना, उतार या चडाव में | मुझे अनुभव होता है की इस जीवन धारा के स्पर्श से मेरे अंग तेजस्वी हो गए है | और मेरा अभिमान इसी जीवन धारा से है जो सदियों से धड़क रहा है और मेरे खून में अभी नाच रहा है |

প্রান

ভুলবনা আর সহজেতে

সেই প্রান এ মন উঠবে মেতে

মৃত্যু মাঝে ঢাকা আছে

যে অন্তহীন প্রান

বজ্রে তোমার বাজে বাসী

সে কি সহজ গান

সেই সুরেতে জাগবো আমি

সেই ঝর যেনো সি আনন্দে

চিত্তবিনার তারে

সত্য-সিন্ধু দশ দিগন্ত

নাচাও যে ঝঙ্কারে

–          রবীন্দ্রনাথ তাগোর





Bombarded with quotations कथनों की तोप

22 01 2010
Why quotations? Quotations are like energy tablets, they are small and compact but very powerful. Quotes provide instant new perspective and carries it in a light-heart way. What makes quotations so appealing is its power to attract attention with the use of small words and short sentences. However, the downside of quotation, what I find is that, it does not stay longer with the reader, unless the quote has really pierced through the heart or the mind. I am gathering some of the finest quotations made by the invaluable experiences of the thinkers and doers. Below are the selected quotes that I shortlisted that would provide a fresh lens to see oneself and others.

कथने क्यों ? कथन उर्जा गोली की तरह होती है, छोटी मगर जबरदस्त | कथने एक नए नज़रिए को तुरंत दर्शाती है और उसे  मोदक रूप में प्रस्तुत करती है | छोटे शब्दों और वाक्यों से ध्यान आकर्षित करने की शक्ति कथनों को आकर्षक बनाता है | लेकिन, कथनों की कमी, जो मुझे लगता है, यह है कि वो पाठक के साथ ज्यादा देर तक नहीं रहती – जब तक कि ऐसी कोई बात दिल या दिमाग को चीरती हुई न निकल जाये |  मैं श्रेष्ठ कथनों को बंटोर रहा हूँ, वे कथन जो विचारकों और कर्ताओं के अमूल्य अनुभवों से बने है | नीचे चुनिन्दा कथन है जिनकी मैंने सूची तैयार की है | यह सूची एक ताज़े शीशे की तरह है जिसमे खुद को और दूसरों को नविन या भिन्न दृष्टिकोण से देख सकते है |

Quotations of Sir Winston Churchill:  सर विंस्टन चर्चिल के कथन:

Churchill was the Prime Minister of Britain during the World War II  from 1940 through 1945 and again from 1951 through 1955. He was noted for his statesmanship and oratory skill though he had speech impediment for which he worked consistently to overcome. He is popularly known as the man with a unique humor during his time. Below are his some of the favored quotations.

चर्चिल विश्व युद्ध २ के समय, १९४० से लेकर १९४५ तक, ब्रितानी प्रधान मंत्री थे और दोबारा १९५१ से १९५५ तक बने | वे राजनीतिज्ञ और वकृत्व कला के लिए जाने जाते थे हलाकि वे हकलाकर बोलते थे जिसको दूर करने के लिए वे निरंतर प्रयास करते थे| वे अपने अनूठ॓ हास्य वाक्यों के लिए प्रसिद्ध थे | नीचे मेरे पसंदीदा कथन है |

Always remember, a cat looks down on man, a dog looks up to man, but a pig will look man right in the eye and see his equal.

हमेशा याद रहे, बिल्ली आदमी को नीचे नज़र से देखती है, कुत्ता आदमी को सम्मानित नज़र से देखता है, मगर सूअर आदमी से नज़र मिला कर देखता है और उसे अपने बराबर समझता है |


I was not the lion, but it fell to me to give the lion’s roar.

मैं शेर नहीं था, मगर मुझे लगा कि शेर की दहाड़ देनी चाहिए |

An appeaser is one who feeds a crocodile, hoping it will eat him last.

एक चापलूस (या दूसरों को संतुष्ट, खुश रखनेवाला) वह व्यक्ति है जो मगरमच्छ को इस आशा में खिलाये कि मगरमच्छ उसे अंतिम में खाए |

You were given a choice between war and dishonor. You chose dishonor and you will have war.

तुम्हे युद्ध या अपमान (बेईज़ती) में से एक को चुनना है | तुमने अपमान को चुना, इसलिए तुम्हे युद्ध  भी मिलेगी |


It takes courage to stand up and speak. It also takes courage to sit down and listen.

जवाबदेही के लिए हिम्मत की ज़रुरत होती है | शांतिपूर्वक सुनने के लिए भी हिम्मत की ज़रुरत होती है |


It takes courage to stand up and walk. It also takes courage to stop and stay.
उठ कर कदम बड़ाने के लिए हिम्मत चाहिए |  रुकने और स्थायी रहने के लिए भी हिम्मत चाहिए|

It is more agreeable to have the power to give than to receive.

देने की शक्ति लेने से ज्यादा उपयोगी  है |


There are people, who the more you do for them, the less they will do for themselves.
– Jane Austen, English novelist

ऐसे लोग है जिनका जितना ज्यादा करो, उतना कम वे खुद के लिए करेंगे |
– जेन ऑस्टेन, अँगरेज़ उपन्यासकार

Two things are infinite: the universe and human stupidity; and I am not sure about the universe.
-Albert Einstein, American scientist

दो चीज़े अनंत है: ब्रह्माण्ड और मानव मूर्खता; और मैं ब्रह्माण्ड के बारे में निश्चित नहीं हूँ |
– अल्बर्ट आइनस्टाइन, अमरीकी वैज्ञानिक

Broadly speaking, the short words are the best, and the old words best of all.
-Winston Churchill, British Prime Minister and statesman

मोटे तौर पर, छोटे शब्द सबसे अच्छे है, और पुराने शब्द सबसे बेहतरीन |
-विंस्टन चर्चिल, ब्रितानी प्रधान मंत्री और राजनितज्ञ






कटाक्ष Sarcasm

2 01 2010

आधुनिक युग का भारतीय

एक झुण्ड के आचरण या व्यवहार को  सभ्यता  कहते हैं | सभ्यता के शुरुआत में स्त्री-पुरुष की भूमिका (लिंग भूमिका) को परिभाषित किया गया था और स्त्री-पुरुष के कार्यों को प्रस्तावित कर, एक झुण्ड को समाज की संज्ञा दी गयी थी| जब यह झुण्ड बड़े होते गए तो  उनका खंडन कर छोटे झुण्ड बने जिन्हें परिवार की संज्ञा दी गयी | लिंग भूमिका  वही  रही |  समाज में लिंग भूमिका प्राकृतिक संयोग पर आधारित है | पुरुष में, प्राकृतिक रूप से, शारीरिक बल होता है – शिकार कर के झुण्ड के लिए भोजन लाना जिससे झुण्ड जीवित रह सके | यह पुरुषों की भूमिका बन गयी |  स्त्री में, प्राकृतिक रूप से, बच्चे पैदा करने की क्षमता होती है जिससे झुण्ड अविराम जारी  रहे |  कुछ समय बाद, स्त्री ने पालन-पोषण की भूमिका चुन ली | यह उस समय की बात है जब मानव गुफाओं में रहता था |  स्त्री-पुरुष की भूमिका जो प्रस्तावित की गयी वह नियम या कानून बन गया | गुफावासी स्त्रियों और पुरुषों की भूमिका एक  बुनियादी समझ है जिसके आधार पर आधुनिक लिंग भूमिका विकसित हुआ और जिसके  फलस्वरूप एक विशाल और पेचीदा मानव समाज का निर्माण हुआ है |

समय को विश्व युधों – विष युद्ध 1 (1914-1918) और विश्व युद्ध 2 (1939-1944) – की ओर बढ़ाते हैं  जब ज़्यादातर पुरुष युद्ध में थे और स्त्रियाँ, जिन्हें घर पर छोड़ दिया गया था, उन्हें घर से बहार निकल कर  कारखानों – गोदामों में काम करने जाना पड़ा था |  युद्ध ख़त्म होने के बाद भी स्त्रियों ने कारखानों में काम करना बंद नहीं किया क्योंकि ज़्यादातर पुरुष युद्ध मर चुके थे या घायल होकर घर लौटे थे | फलतः, स्त्रोयों ने पहली बार, बड़ी तादात में, पुरुषों का काम सफलतापूर्वक किया | मानसिक – अवरोध टूट गया कि सिर्फ पुरुष ही कारखानों में या ताकत का काम कर सकते है | चिरकालीन सिधांत और सभ्यता – स्त्रियों को सिर्फ घर पर बच्चों का पोषण और खाना बनाना चाहिए – का खंडन हो गया | इसके साथ ही, पुरुषों के दोगलेपन और कट्टर अहम् का भी नग्न प्रदर्शन भी  हुआ | पुरुषों का काम करना यानी पुरुष के अहम् पर चोंट लगाने जैसा था और भला पुरुष कैसे क्रोध न होता| यह एक सामाजिक आन्दोलन था जिसने यूरोप के समाज कि छवि बदल दी – हमशे के लिए | इस आन्दोलन कि गूँज उत्तर और दक्षिण अम्रीका में भी सुनाई दी | उदहारण के रूप में, 1940  से पहले स्त्रियों को वोट देना मना था, केवल पुरुष हो वोट दे सकते थे | आधुनिक तकनीक ने मशीनों को चलाना बहुत  आसान बना दिया है जिससे कम करने में कम ताकत लगती है, अतः स्त्री और पुरुष दोनों ही कारखानों में काम कर सकते है, कर्मचारी पुरुष होना अवश्यक नहींरहा |

इंडिया का क्या हुआ ? एक मधुर बहाव इंडिया  में भी आया था जब गाँधी ने स्त्रियों को इंडिया की आजादी के लिए  पुरुषों के साथ चलने को कहा | 1990 के दशक में, जब इंडियन मार्केट को दुनिया के समक्ष खोला गया  और बाहार  की वस्तुएं इंडिया में आने लगी, रोज़गार बड़ी,  और इंडिया ने विश्व मंच में अपना महत्वहीन  स्थान पहचाना | कन्ज़ुमेर वस्तु और उपभोक्त  जीवन शैली ने इंडियन को आकर्षित किया |

अब 2010 में, मैं मानव इतहास को देखता हूँ और समझता हूँ कि स्त्रियों पर गुफावासी के दिनों से भी  ज्यादा सताया और अत्याचार किया जाता है | आज औरतों को गुणी और साझेदार समझा जाता है जब वे कमाने जाती है | मगर इसके साथ उन्हें अपनी  परिभाषित भूमिका भी निभानी पड़ती है – खाना पकाना, बच्चों का पालन-पोषण, घर को सजाना, खुद को सुन्दर रखना और जब पुरुष कान से घर लौटे तो पुरुषों की सेवा करना | जबकि,  पुरुष पहले से भी ज्यादा आलसी, ज्यादा अभिमानी, और ज्यादा असुरक्षित हो गया है | एक कॉलेज तक पड़ा, मध्यवर्गीय  पुरुष कह सकता है –

“मैं और मेरी पत्नी दोनों ही कमाते है, मैं आजे के समय के साथ चलता हूँ, अपनी पत्नी को घर से बाहार जाने देता  हूँ | मगर पत्नी मुझसे कम कमाए ताकि मेरी अहम् को चोंट न लगे. मेरी पत्नी दोसरे पुरुषों के साथ घुले-मिले नहीं क्योंकि यह मुझे असुरक्षित महसूस होता कि वोह पुरुष मुझसे शायद अच्छा है | और क्योंकि मेरी पत्नी भी कमाती है तो मुझे ज्यादा मेहनत करने की ज़रुरत नहीं और  मुझे पकोड़े और बिरयानी खिलाये | जब मैं काम से घर  लौटूं तो मेरी पत्नी सुन्दर दिखानी चाहिए, एहले से खाना बनाकर रखे और मुझे परोसे, और बिस्तर के लिए भी तैयार रहे चाहे वह भी काम से क्यों न करती हो | मेरी पत्नी पारंपरिक सिधान्तों का भी पालन करे और समय के अनुसार आधुनिक भूमिका में भी निखर कर आये | उसके अभिलाषाएं , घर के     पुरुष द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर ही रहेगे | ”

इसी दोगलेपन के साथ आधुनिक भारतीय पुरुष और स्त्री का 2010 में स्वागत है |

Modern Indian men and Women

Since the inception of civilization, the roles of the two genders had been well-defined and their functioning is prescribed in the group of people called society. When the group becomes larger, the society then split into smaller groups called family. The roles defined were same. These roles were defined or rather prescribed which later became the norm was based on the natural occurrence – physical ability and natural inclination. Men being physically stronger by nature were fit for hunting and bringing food for the survival of the group. Women having the ability to reproduce for the continuation of the group were left behind secured. Over the time women picked the role of the nurturing and fostering the offspring. The setting was when men still lived in caves and which can be estimated to around 40,000 BC. The cave men and women roles have been the fundamental idea behind setting the roles for men and women and hence building the complex societies upon this structure over the centuries.

Fast forwarding to the World War I (1914-1918) and World War II (1939-1944), most men were in the war and the women who were left at home had to walk into the factories, out of their home, leaving behind children, and work with the machines – for the first time ever. After the end of the war, the women continued the factory work as there were not many men left and those left were severely injured. The result was for the first time ever the women in the mass scale took the job of men. The mental block that men are only fit for work was broken. The age old dogma that women should left behind to nurture kids and cook was severely shattered. It also showcased the male hypocrisy and the staunch male egoism was exposed bare naked. This was the revolution in Europe which resonated to the North and South America. Technology made possible to work with less effort, more efficiency and hence gender requirement was blurred.

What about India? A suave wave of gender role change came when Gandhi called for  women to join the freedom movement and men conceded without much hesitation. Fast forwarding to 1990s, the opening of Indian market, employment rise and western goods brought India to world front and India saw its low status at the world stage. The consumer goods and lifestyle attracted Indians. As a result, adopting the current Western daily life slowly grabbed the everyday life of the people, especially middle class.

Now in 2010, I revert back and see that the women had been further brutalized and oppressed than ever before dating back to the cave man age. Today women is appreciated to be a partner in the bread-winning but along with it she has to do the defined roles for her – cooking, caring for kids, decorating home, decorating herself and serving men when they return home after work. Men on the other hand, had been become lazier, more egoist, and more insecure. A modern educated middle class man may say-

” My wife and I both earn so I am with the time, letting my wife go work outside home. She has to earn       less than me to suit my ego. She must not mingle with other men because it would make me insecure that he is better than me (which he is). And since my wife is also working, I do not have to work harder so I came be lazy and she can cook “pakodas”, “biryani” for me. When I come back home from work she should look pretty, make and serve me food, and be ready to serve me in bed even though she worked too. She should fit in both the traditionally defined roles and the modern expectations. Her ambitions must be within the limits set by the men of the house.”

With this hypocrisy of modern Indian men and women, 2010 welcomes you.





अंतरिम

12 10 2009

क्या है, क्यों है, कैसे है
सोचता था
जब पाया तो बहुत खुश हुआ

उसके बाद क्या ?
पाया, वो मिल गया
अब कहाँ, किधर, किसको

ढूँढना, चाहत, प्यास, होड़, जिद्द
-लक्ष्य के अनेक रूप है

पर मैंने एक नया रूप पाया
-अलक्ष्य से लक्ष्य का लक्ष्य

शून्य !

अंतरिम, मध्यांतर, ढील, पड़ाव
-का एहसास अजीब है |
हलके कंधे होने जैसा –
पहले आराम, फिर आनंद, और फिर शुन्यता |

न चाह, न उत्साह, न क्रोध, न आनंद, न ख़ुशी और न उदासी

बस मस्त हवा में लहराती – डालों की तरह
बस अपने रास्ते  की मगन – नदी के पानी की तरह
बस अपने गीत गाती – सुबह की चिड़ियों की तरह

लक्ष्यहीन नहीं,
अलक्ष्य ज़िन्दगी !





माक्यावैली के प्रसिद्ध कथन, ” द प्रिन्स ” से

24 05 2009
 माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532  में प्रकाशित

माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532 में प्रकाशित

निकोलो माक्यावैली द्वारा, इतालवी भाषा में, लिखित ” द प्रिन्स ” की चर्चा जारी रखते है | पिछले पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के, विभिन्न विषयों पर, विचारों का सारांश प्रस्तुत है |

पिछले पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे:       द प्रिन्स (1532 में प्रकाशित)

इस पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के प्रसिद्ध कथनों (famous quotations) की चर्चा होगी| मैंने पांच मनोहर अवतरणों को चुना है और उनकी व्याख्या की है –

1. At this point one may note that men must be either pampered or annihilated. They avenge light  offenses; they cannot avenge severe ones; hence, the harm one does to a man must be such as to obviate any fear of revenge.

अनुवादित –

अब ये ध्यान देने की बात है कि मनुष्य को या तो लाड-प्यार किया जाए या फिर मिटा दिया जाये | मनुष्य छोटी बातों पर बदले की भावना रखता है: मनुष्य में बड़े, गंभीर चोंट का बदला लेने की क्षमता नहीं होती; अतः, ऐसी हानि पहुंचानी चाहिए ताकि उसके बदले का डर नहीं रहे |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय ३ से है | इस अवतरण में माक्यावैली ने तर्क (logic) को नैतिकता (ethics) के ऊपर रखा है| राजा को  समझाना चाहिए कि उसके पास सिर्फ दो विकल्प है – उपकार या विनाश | क्योंकि विनाश से प्रजा क्रोधित हो सकती है, इसलिए विनाश तभी उपयोग करना चाहिए जब विनाश निश्चित रूप से राजा के द्वेषी मंत्री और दुश्मनों का खात्मा कर सके | दया, तरस, रहम, और करुणा निरर्थक है | आत्मकेंद्रतिता और स्वयं-सुरक्षा ही प्रमुख कारक और इन दोनों तत्वों का आचरण निष्ठूरता से करना चाहिए |

2. [P]eople are by nature changeable. It is easy to persuade them about some particular matter, but it is hard to hold them to that persuasion. Hence it is necessary to provide that when they no longer believe, they can be forced to believe.

अनुवादित –

मनुष्य स्वाभाविक रूप से परिवर्तनशील होता है | मनुष्य को किसी ख़ास बात में फुसलाना आसान है, मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखना कठिन है | अतः, यदि मनुष्य विश्वास खो दे तो ज़बरदस्ती करके विश्वास लादा जा सकता है |

व्याख्या –

यह प्रसंग अध्याय ६ से लिया गया है | माक्यावैली ने मनुष्य की प्रकृति पर अपनी धारणा बतलाई है | हलाकि इन धारणाओं को प्रमाणित करने के लिए माक्यावैली ने कोई उदाहरण या तर्क नहीं दिए | माक्यावैली का मानना था कि मनुष्य आम तौर पर समय या परिस्थिति अनुसार बदलते रहते हैं | मनुष्य को किसी बात पर उकसाना या फुसलाना (convince, persuade) सरल है | मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखने के लिए योजना या दुसरे प्रबंध रखने पड़ सकते है क्योंकि मनुष्य चालाक होता है इसलिए देर तक फुसलाये रखना कठिन हो सकता है | माक्यावैली कहते है यदि मनुष्य बातों की जादूगरी से  विश्वास नहीं करे तो अंत में बल को उपयोग करना चाहिए | बल के दबाव में मनुष्य किसी भी बात को मान लेता है |

3. A prince must have no other objective, no other thought, nor take up any profession but that of war, its methods and its discipline, for that is the only art expected of a ruler. And it is of such great value that it not only keeps hereditary princes in power, but often raises men of lowly condition to that rank.

अनुवादित –

राजा का दूसरा उद्देश्य नहीं होना चाहिए, दुसरे विचार नहीं आने चाहिए, और न ही दूसरा पेशा बल्कि केवल युद्घ, युद्घ के तरीके और युद्घ के अनुशासन, क्योंकि एक शासित राजा से युद्घ की ही उम्मीद रखी जाती है | युद्घ बहुत मूल्यवान है क्योंकि एक ही वंश के राजा, पीड़ी दर पीड़ी, राजगद्दी में शासित हो सकते है और युद्घ से नीच कुल के पुरुष को राजा बनने का अवसर मिल सकता है |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय १४ से उद्धृत है | माक्यावैली युद्घ-कला को शास्त्रीय ज्ञान और वास्तविक अनुभव मानते है | शास्त्रीय ज्ञान क्योंकि युद्घ को, पौराणिक कहानियों और मंत्रों की तरह, इतिहास में हुए युद्धों को उदाहरण के रूप में पढ़ा जा सकता है | वास्तविक अनुभाव क्योंकि बिना अनुभव किये युद्घ के अनुशासन को पढ़ना निरर्थक है | माक्यावैली ने सरकारी कार्य को सामरिक (military) नज़रों से देखा है| क्योंकि हर सरकार का एक ही लक्ष्य होता है – स्वयं-सुरक्षा (self-preservation) और सैनिक प्रतिरक्षा (military defense) | इसके लिए सरकार को कुटिल नीति (diplomacy), कुशल रणनीति (tactical strategy), भौगोलिक कौशल (geographic mastery), और एतिहासिक विश्लेषण (historical analysis) का सहारा लेना चाहिए | माक्यावैली मानते है कि राजा सर्व विद्वान नहीं हो सकता, परन्तु राजा का अंतिम उत्तरदायित्व अपने राज्य की स्थिरता और एकता बनाए रखना है, राज्य की खुशहाली ज़रूरी नहीं |

4. Only the expenditure of one’s own resources is harmful; and, indeed, nothing feeds upon itself as liberality does. The more it is indulged, the fewer are the means to indulge it further. As a consequence, a prince becomes poor and contemptible or, to escape poverty, becomes rapacious and hateful. Of all the things he must guard against, hatred and contempt come first, and liberality leads to both. Therefore it is better to have a name for miserliness, which breeds disgrace without hatred, than, in pursuing a name for liberality, to resort to rapacity, which breeds both disgrace and hatred.

अनुवादित –

अपने पूंजी-साधन का खपत सबसे खतरनाक होता है | उदारता स्वयं को खा जाती है | जितना खपत होगा, पूंजी-साधन उतना कम होगा | फलतः, राजा गरीब और अपमानजनक बन जाता है या गरीबी से बचने के लिए अति लोभी और कुत्सित बन जाता है | राजा को जितनी भी चीज़ों से बचना चाहिए, उनमे सबसे पहले है – प्रजा की नफरत और तिरस्कार | उदारता नफरत और तिरस्कार दोनों को जनमती है | बेहतर होगा अगर राजा कंजूसी के लिए प्रसिद्ध हो | क्योंकि कंजूसी से सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) होता है प्रजा को राजा से नफरत नहीं होती | पहले उदार होना, फिर गरीबी में चले जाना, तिरस्कार और नफरत दोनों को पैदा करती है |

व्याख्या –

यह अवतरण सोलहवी अध्याय से उद्धृत है | इन पंक्तियों में राजनीतिज्ञ और धर्माचरण के प्रति माक्यावैली के भाव प्रदर्शित होते है | माक्यावैली राजा को सलाह देते है कि जब राज्य के लिए काम करो तो मूल्यों और सिद्धांतों का तिरस्कार कर दो | सिर्फ धर्म के नाम पर या धर्म के लिए धर्म का पालन करना राज्य के लिए हानिकारक है | राज्य चलाने की कला और राजा के निजी मूल्यों और सिद्धांतों के बीच कभी टकराव नहीं होना चाहिए | राजा को अपने निजी मूल्यों और सिद्धांतों से ऊपर उठकर सोचना चाहिए | उदारता प्रशंसनीय है – प्रजा उदारता को सरहाती है, मगर अंतिम में यही उदारता राज्य को खा जाती है | इसलिए उदारता से दूर रहना चाहिए | सिद्धान्तहीन होने पर राजा से प्रजा नफरत नहीं करती | प्रजा राजा से नफरत तब करती है जब राजा अपने कर्त्तव्य को नहीं निभाता है या राज्य की सुरक्षा नहीं कर पाता | धर्माचरण में स्वयं-त्यागी बनना पड़ता है जो राज्य के स्वयं-सुरक्षा के उद्देश्य के प्रतिकूल है |

माक्यावैली कहते है कि उदार राजा कहलाने से बेहतर कंजूस राजा होना है | क्योंकि जब पूंजी-साधन ख़त्म हो जायेगा तब उदारता की आदती प्रजा अपने राजा से नफरत और तिरस्कार (मज़ाक) करने लगेगी | मगर कंजूस राजा होने पर प्रजा सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) करेगी, नफरत नहीं |

5. Here a question arises: whether it is better to be loved than feared, or the reverse. The answer is, of course, that it would be best to be both loved and feared. But since the two rarely come together, anyone compelled to choose will find greater security in being feared than in being loved. . . . Love endures by a bond which men, being scoundrels, may break whenever it serves their advantage to do so; but fear is supported by the dread of pain, which is ever present.

अनुवादित –

यहाँ एक सवाल उठता है – क्या प्यार किये जाना, डर होने से बेहतर है या इसका उल्टा | उत्तर है, सबसे श्रेष्ठ होगा यदि आपको लोग प्यार भी करें और आपसे डरे भी | हलाकि यह दोनों का एक साथ होना दुर्लभ है, अगर किसी को दोनों में से एक चुनना हो तो लोगों के मन में उसका डर होना उसे ज़्यादा सुरक्षित, महफूज़ रखेगा | प्यार एक जोड़ की तरह रहता है जिसे मनुष्य अपना काम सिद्ध होने पर तोड़ सकता है| मगर डर का संयोग भीषण दर्द से होता है, दर्द का एहसास हमेशा कायम रहता है |

व्याख्या –

ये पंक्तियाँ अध्याय १७ से ली गयी है | शायद सुनने में लगता है कि माक्यावैली ने “द प्रिन्स” अत्याचारियों के लिए लिखा है | मगर गौर से पढ़ा जाये तो माक्यावैली ने मनुष्य की प्रवृत्ति (human nature) का आश्चर्यजनक विश्लेषण (analysis) दिया है | माक्यावैली कहते है कि यह मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि परिस्थिति अनुसार अपना स्वर बदले | परिस्थिति अनुसार मनुष्य नमक हराम बन सकता है | मगर राज्य को सफलतापूर्वक चलाने के लिए जनता और मंत्रियों की वफादारी की ज़रुरत होती है | इन दोनों बातों से यह बात निकलती है कि राजा को अगर उपकार और कठोरता में से एक चुनना हो तो कठोरता ज्यादा भरोसेमंद है, ज़्यादा फलदायक है | माक्यावैली शौक के लिए क्रूरता या कठोरता की वकालत नहीं करते | क्रूरता और कठोरता केवल राज्य के हित के लिए होना चाहिए | क्रूरता और कठोरता राज्य को चलाने की कला के प्रमुख भाग है |

यदि चुनना हो कि लोग आपसे प्यार करे या आपसे डरे तो सबसे अच्छा होगा कि लोग आपसे डरे भी और प्यार भी करे| मगर दोनों का साथ होना मुश्किल है| इसीलिए विकल्प दिए जाने पर डर को चुनना चाहिए | क्योंकि प्यार कभी भी द्वेष बन सकता है या प्यार के बंधन को मतलब पूरा होने पर तोडा भी जा सकता है | मगर डर लोगों के मन में बना रहता है| डर का सम्बन्ध पीडा से होता है| पीडा शारीरिक हो या मानसिक, डर के साथ बंधा होता है| जब डर लगता है तो पीडा दिमाग में ताज़ा हो जाती है | पीडा से बचने या भागने की मनुष्य की प्रवृत्ति होती है| पीडा से बचने के लिए मनुष्य अपने राजा की आज्ञा मान लेता है| इसलिए प्रजा और मंत्रियों को डराए रखने में ही राजा की राजगद्दी की सलामती है अर्थात् राजा स्वयं-सुरक्षित है |





द प्रिन्स (1532 में प्रकाशित)

23 05 2009
31 वर्षीय निकोलो माक्यावैली सन् 1500 में

31 वर्षीय निकोलो माक्यावैली सन् 1500 में

” द प्रिन्स ” इतालवी भाषा में लिखित एक राजनीतिक निबंध है | इसे निकोलो माक्यावैली ने सन् 1513 में लिखा था | इसका प्रकाशन माक्यावैली के मरने के पांच सालो बाद सन् 1532 में इटली के फ्लोरेंस राज्य में हुआ था |

“द प्रिन्स” की चर्चा करने से पहले निकोलो माक्यावैली की जीवनी पर प्रकाश डालना चाहूँगा |

माक्यावैली (May 3, 1469 – June 21, 1527) इतालवी (Italian) दार्शनिक, लेखक, और नेता थे| उन्हें आधुनिक राजनीति-विज्ञान (modern political science) का गुरु माना जाता है| पूर्वी देशो में उन्हें “पाश्चात्य चाणक्य” के नाम से जाना जाता है| वे फ्लोरेंतिन गणराज्य के राजदूत के सचीव थे| उन्होंने दर्शन-शास्त्र (philosophy), राजनीति, सेना (military) और राष्ट्रीय सुरक्षा (national defense) के ऊपर, अपने अनुभव के अनुसार, लेख लिखे है- “The Art of War” and “Discourses on Livy”.

माक्यावैली ने “द प्रिन्स” को शासन करने की वास्तविक मार्गदर्शिका के रूप में लिखा है | “द प्रिन्स”
फ्लोरेंस के राजा लोरेंजो दे मेदिची को समर्पित है और माक्यावैली ने अपनी लेख भेंट के रूप में प्रस्तुत की थी | “द प्रिन्स” काल्पनिक या दुर्बोध नहीं है बल्कि यह सरल और खरा निबंध है | माक्यावैली ने वास्तविक और सहज सलाह को प्रस्तुत किया है | उन्होंने अनेक विषयों पर चर्चा की है | उनमे से प्रमुख विषयों का सारांश प्रस्तुत है –

राजनीतिज्ञ और युद्घ-कला (Statesmanship and Warcraft) :

माक्यावैली का मानना था कि एक तंदरुस्त खड़ी सेना ही अच्छे कानून को जन्म दे सकती है | उनका
बहुचर्चित कथन था, “The presence of sound military forces indicate sound laws”. युद्घ के
प्रति माक्यावैली के विचार अलग थे | उनका मानना था कि राज्य के विकास के लिए युद्घ आवश्यक है
लेकिन निर्णायक नहीं | यानी केवल युद्घ विकास नहीं ला सकता | युद्घ में विजयी होना स्वस्थ राज्य
की नीव है | “द प्रिन्स” में विस्तार से लिखा है किस तरह राज्य को हड़पना चाहिए,  हड़प राज्यों की
जनता और मंत्रियों के साथ किस तरह पेश आना चाहिए ताकि वे आज्ञाकारी रहे और किस तरह अपने
राज्य के आतंरिक विद्रोह को रोकना चाहिए ताकि बाहरी युद्घ में अर्चाने न आये | माक्यावैली ने युद्घ में
जीतने के लिए केवल अस्त्र-शस्त्र और   प्रबल सेना की प्रशंसा नहीं की | जीतने की लिए – कुटिल निति
(diplomacy), घरेलु राजनीति (domestic politics), कुशल रणनीति (tactical strategy),
भौगोलिक कौशल (geographic mastery), और एतिहासिक विश्लेषण (historical analysis) – का
प्रयोग अत्यंत आवश्यक माना है |

मित्रभाव और नफरत (Goodwill and Hatred) :

राजा को गद्दी पर सालों जमे रहने के लिए अपनी प्रजा की नफरत से बचना चाहिए | यह ज़रूरी नहीं
कि राजा को अपनी प्रजा से प्यार मिले | वास्तव में सबसे अच्छा होगा यदि प्रजा अपने राजा से डरे |
नफरत राजा के दुश्मनों को सहायता दे सकती है जिससे राजा अपनी गद्दी खो सकता है | माक्यावैली
ने क्रूरता को इस्तेमाल करने की सलाह दी है यदि क्रूरता से राजा के मित्रभाव सलामत रहे | राजा का
मित्रभाव, यानि प्रजा का राजा के साथ होना, घरेलु विद्रोह और बाहरी आक्रमण के समय एकता
बरकरार रखता है | प्रजा का मित्रभाव मिलने से राज्य में खुशहाली फैले ऐसा ज़रूरी नहीं है | राजा का
मित्रभाव केवल एक राजनैतिक औजार है जिससे राजा, अपने राज्य में स्थिरता लाकर, अपना
शासनकाल बढाता है |

स्वतंत्र इच्छा (Free Will) :

माक्यावैली ने “शूरता” और “सौभाग्य” का उपयोग कई बार किया है | “शूरता” का तात्पर्य व्यक्तिगत
गुण और “सौभाग्य” का तात्पर्य मौका या संजोग | माक्यावैली विश्लेषित करते है कि राजा की सफलता
या विफलता उसके मन की इच्छा और उसके आस-पास की परिस्थिति परपर निर्भर करती है | माक्यावैली इच्छा और नियतिवाद (determinism) को तोलकर कहते है कि मनुष्य
का कर्म को नियंत्रित करता है – 50% सौभाग्य (यानी मौका या संजोग) और 50% इच्छा |
हलाकि दूरदर्शिता से मनुष्य संजोग के हेर-फेर से बचाव कर सकता है |  अतः माक्यावैली कहते है
कि मनुष्य अपना भाग्य प्रबल इच्छा से बनाता है मगर कुछ हद तक ही क्योंकि हालातों और
परिस्थितियों पर मनुष्य का जोर नहीं है |

धर्माचरण (Virtue) :

माक्यावैली धर्माचरण की परिभाषा देते है – धर्माचरण वो गुण है जिसकी लोग प्रशंसा करे, जैसे
दानशीलता, दुसरे का  दया-माया करना, इश्वर-भक्ति, सहानुभूति और करूणा | माक्यावैली कहते है कि
राजा को धर्मचारित दिखलाई पड़ने की  कोशिश करनी चाहिए मगर धर्म के लिए धर्म का पालन करना
राजा के लिए हानिकारक हो सकता है | धर्मचारित दिखलाई पड़ना चाहिए मगर धर्मचरित होना ज़रूरी
नहीं | प्रजा धर्माचरण को सरहाती है इसलिए उनके मित्रभाव को जीतने के लिए धर्मचारित दीखलाई
पड़ना राजा के लिए बेहतर होगा | यदि राजा पूरी निष्ठा से धर्म का पालन करे तो उसके लिए
हानिकारक है | राजा को पापाचरण का त्याग अवश्य नहीं करना चाहिए | पापाचरण जैसे क्रूरता और
बेईमानी के प्रयोग से  राज्य का भला हो सकता है | राजा को नहीं भूलना चाहिए कि प्रारंभिक क्रूरता
से राज्य को दीर्घ स्थिरता मिल सकती है | राज्य की भलाई और खुशहाली से भी अधिक महत्वपूर्ण है
राज्य की स्थिरता और एकता जो आंतरिक विद्रोह और बाह्य-आक्रमण से राज्य को बचा सकती है |

पापाचरण का अनुसरण केवल पापाचरण के वास्ते नहीं करना चाहिए | ठीक उसी प्रकार धर्माचरण का
पालन केवल धर्म के लिए नहीं करना चाहिए | राजा का हर कदम अपने राज्य की भलाई नहीं बल्कि
राज्य पर उस कदम का क्या असर पड़ेगा यह सोच कर उठाना चाहिए | राजा को नहीं भूलना चाहिए
कि प्रारंभिक क्रूरता से राज्य को दीर्घ स्थिरता मिल सकती है |  राजा को अपने निजी आचरण और
नीति से ऊपर उठकर, धर्माचरण और पापाचरण का पालन अपने राज्य के हेतु करना चाहिए |

मनुष्य की प्रकृति (Human Nature) :

माक्यावैली दृढ़ता से कहते है कि मनुष्य में ऐसे कई लक्षण है जो पैदायशी है | आम तौर पर हर
मनुष्य मतलबी होता है मगर  प्रेम या मोह जीता भी जा सकता है और जीतने के बाद हारा जा
सकता है  और हारने के बाद जीता भी जा सकता है | आम तौर पर लोग खुश और संतुष्ट रहते है
जब तक उनकी परिस्थिति में बदलाव नहीं आता | मनुष्य अपने समृधि के समय में  विश्वासी हो
सकता है और नहीं भी | मगर विपत्ति में फंसा मनुष्य तुंरत स्वार्थी, कपटी और फायदा उठाना वाला
बन जाता है | मनुष्य दुसरे मनुष्य की उदारता, हिम्मत और इश्वर-भक्ति की प्रशंसा करता है परन्तु
स्वयं नहीं पालान करता | आकांक्षा उन्ही मनुष्यों में पाया जाता है जिन्हें थोडी-बहुत सत्ता मिली हो |
आम जनता अपने स्टेटस में खुश रहती है और ऊँचे स्टेटस में जाने की अभिलाषा नहीं रखती |
मनुष्य किसी भी मदद का स्वाभाविक रूप से आभारी रहता है और इस बंधन को आसानी से नहीं
तोडा जाता | हलाकि वफादारी जीती और हारी जा सकती है और मित्रभाव (goodwill) भी |

माक्यावैली के ये थे कुछ प्रमुख विषयों के प्रसंग | “द प्रिन्स” में माक्यावैली ने प्रत्येक अध्याय
(chapter) में विस्तार से विषयों पर, ऐतिहासिक घटनाओ का उदहारण देकर, अपने तर्क को शसक्त किया है |

अगले पोस्ट में माक्यावैली के बहुचर्चित कथन (famous quotations) पर चर्चा होंगी | तब तक के लिए नमस्कार |