कटाक्ष Sarcasm

2 01 2010

आधुनिक युग का भारतीय

एक झुण्ड के आचरण या व्यवहार को  सभ्यता  कहते हैं | सभ्यता के शुरुआत में स्त्री-पुरुष की भूमिका (लिंग भूमिका) को परिभाषित किया गया था और स्त्री-पुरुष के कार्यों को प्रस्तावित कर, एक झुण्ड को समाज की संज्ञा दी गयी थी| जब यह झुण्ड बड़े होते गए तो  उनका खंडन कर छोटे झुण्ड बने जिन्हें परिवार की संज्ञा दी गयी | लिंग भूमिका  वही  रही |  समाज में लिंग भूमिका प्राकृतिक संयोग पर आधारित है | पुरुष में, प्राकृतिक रूप से, शारीरिक बल होता है – शिकार कर के झुण्ड के लिए भोजन लाना जिससे झुण्ड जीवित रह सके | यह पुरुषों की भूमिका बन गयी |  स्त्री में, प्राकृतिक रूप से, बच्चे पैदा करने की क्षमता होती है जिससे झुण्ड अविराम जारी  रहे |  कुछ समय बाद, स्त्री ने पालन-पोषण की भूमिका चुन ली | यह उस समय की बात है जब मानव गुफाओं में रहता था |  स्त्री-पुरुष की भूमिका जो प्रस्तावित की गयी वह नियम या कानून बन गया | गुफावासी स्त्रियों और पुरुषों की भूमिका एक  बुनियादी समझ है जिसके आधार पर आधुनिक लिंग भूमिका विकसित हुआ और जिसके  फलस्वरूप एक विशाल और पेचीदा मानव समाज का निर्माण हुआ है |

समय को विश्व युधों – विष युद्ध 1 (1914-1918) और विश्व युद्ध 2 (1939-1944) – की ओर बढ़ाते हैं  जब ज़्यादातर पुरुष युद्ध में थे और स्त्रियाँ, जिन्हें घर पर छोड़ दिया गया था, उन्हें घर से बहार निकल कर  कारखानों – गोदामों में काम करने जाना पड़ा था |  युद्ध ख़त्म होने के बाद भी स्त्रियों ने कारखानों में काम करना बंद नहीं किया क्योंकि ज़्यादातर पुरुष युद्ध मर चुके थे या घायल होकर घर लौटे थे | फलतः, स्त्रोयों ने पहली बार, बड़ी तादात में, पुरुषों का काम सफलतापूर्वक किया | मानसिक – अवरोध टूट गया कि सिर्फ पुरुष ही कारखानों में या ताकत का काम कर सकते है | चिरकालीन सिधांत और सभ्यता – स्त्रियों को सिर्फ घर पर बच्चों का पोषण और खाना बनाना चाहिए – का खंडन हो गया | इसके साथ ही, पुरुषों के दोगलेपन और कट्टर अहम् का भी नग्न प्रदर्शन भी  हुआ | पुरुषों का काम करना यानी पुरुष के अहम् पर चोंट लगाने जैसा था और भला पुरुष कैसे क्रोध न होता| यह एक सामाजिक आन्दोलन था जिसने यूरोप के समाज कि छवि बदल दी – हमशे के लिए | इस आन्दोलन कि गूँज उत्तर और दक्षिण अम्रीका में भी सुनाई दी | उदहारण के रूप में, 1940  से पहले स्त्रियों को वोट देना मना था, केवल पुरुष हो वोट दे सकते थे | आधुनिक तकनीक ने मशीनों को चलाना बहुत  आसान बना दिया है जिससे कम करने में कम ताकत लगती है, अतः स्त्री और पुरुष दोनों ही कारखानों में काम कर सकते है, कर्मचारी पुरुष होना अवश्यक नहींरहा |

इंडिया का क्या हुआ ? एक मधुर बहाव इंडिया  में भी आया था जब गाँधी ने स्त्रियों को इंडिया की आजादी के लिए  पुरुषों के साथ चलने को कहा | 1990 के दशक में, जब इंडियन मार्केट को दुनिया के समक्ष खोला गया  और बाहार  की वस्तुएं इंडिया में आने लगी, रोज़गार बड़ी,  और इंडिया ने विश्व मंच में अपना महत्वहीन  स्थान पहचाना | कन्ज़ुमेर वस्तु और उपभोक्त  जीवन शैली ने इंडियन को आकर्षित किया |

अब 2010 में, मैं मानव इतहास को देखता हूँ और समझता हूँ कि स्त्रियों पर गुफावासी के दिनों से भी  ज्यादा सताया और अत्याचार किया जाता है | आज औरतों को गुणी और साझेदार समझा जाता है जब वे कमाने जाती है | मगर इसके साथ उन्हें अपनी  परिभाषित भूमिका भी निभानी पड़ती है – खाना पकाना, बच्चों का पालन-पोषण, घर को सजाना, खुद को सुन्दर रखना और जब पुरुष कान से घर लौटे तो पुरुषों की सेवा करना | जबकि,  पुरुष पहले से भी ज्यादा आलसी, ज्यादा अभिमानी, और ज्यादा असुरक्षित हो गया है | एक कॉलेज तक पड़ा, मध्यवर्गीय  पुरुष कह सकता है –

“मैं और मेरी पत्नी दोनों ही कमाते है, मैं आजे के समय के साथ चलता हूँ, अपनी पत्नी को घर से बाहार जाने देता  हूँ | मगर पत्नी मुझसे कम कमाए ताकि मेरी अहम् को चोंट न लगे. मेरी पत्नी दोसरे पुरुषों के साथ घुले-मिले नहीं क्योंकि यह मुझे असुरक्षित महसूस होता कि वोह पुरुष मुझसे शायद अच्छा है | और क्योंकि मेरी पत्नी भी कमाती है तो मुझे ज्यादा मेहनत करने की ज़रुरत नहीं और  मुझे पकोड़े और बिरयानी खिलाये | जब मैं काम से घर  लौटूं तो मेरी पत्नी सुन्दर दिखानी चाहिए, एहले से खाना बनाकर रखे और मुझे परोसे, और बिस्तर के लिए भी तैयार रहे चाहे वह भी काम से क्यों न करती हो | मेरी पत्नी पारंपरिक सिधान्तों का भी पालन करे और समय के अनुसार आधुनिक भूमिका में भी निखर कर आये | उसके अभिलाषाएं , घर के     पुरुष द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर ही रहेगे | ”

इसी दोगलेपन के साथ आधुनिक भारतीय पुरुष और स्त्री का 2010 में स्वागत है |

Modern Indian men and Women

Since the inception of civilization, the roles of the two genders had been well-defined and their functioning is prescribed in the group of people called society. When the group becomes larger, the society then split into smaller groups called family. The roles defined were same. These roles were defined or rather prescribed which later became the norm was based on the natural occurrence – physical ability and natural inclination. Men being physically stronger by nature were fit for hunting and bringing food for the survival of the group. Women having the ability to reproduce for the continuation of the group were left behind secured. Over the time women picked the role of the nurturing and fostering the offspring. The setting was when men still lived in caves and which can be estimated to around 40,000 BC. The cave men and women roles have been the fundamental idea behind setting the roles for men and women and hence building the complex societies upon this structure over the centuries.

Fast forwarding to the World War I (1914-1918) and World War II (1939-1944), most men were in the war and the women who were left at home had to walk into the factories, out of their home, leaving behind children, and work with the machines – for the first time ever. After the end of the war, the women continued the factory work as there were not many men left and those left were severely injured. The result was for the first time ever the women in the mass scale took the job of men. The mental block that men are only fit for work was broken. The age old dogma that women should left behind to nurture kids and cook was severely shattered. It also showcased the male hypocrisy and the staunch male egoism was exposed bare naked. This was the revolution in Europe which resonated to the North and South America. Technology made possible to work with less effort, more efficiency and hence gender requirement was blurred.

What about India? A suave wave of gender role change came when Gandhi called for  women to join the freedom movement and men conceded without much hesitation. Fast forwarding to 1990s, the opening of Indian market, employment rise and western goods brought India to world front and India saw its low status at the world stage. The consumer goods and lifestyle attracted Indians. As a result, adopting the current Western daily life slowly grabbed the everyday life of the people, especially middle class.

Now in 2010, I revert back and see that the women had been further brutalized and oppressed than ever before dating back to the cave man age. Today women is appreciated to be a partner in the bread-winning but along with it she has to do the defined roles for her – cooking, caring for kids, decorating home, decorating herself and serving men when they return home after work. Men on the other hand, had been become lazier, more egoist, and more insecure. A modern educated middle class man may say-

” My wife and I both earn so I am with the time, letting my wife go work outside home. She has to earn       less than me to suit my ego. She must not mingle with other men because it would make me insecure that he is better than me (which he is). And since my wife is also working, I do not have to work harder so I came be lazy and she can cook “pakodas”, “biryani” for me. When I come back home from work she should look pretty, make and serve me food, and be ready to serve me in bed even though she worked too. She should fit in both the traditionally defined roles and the modern expectations. Her ambitions must be within the limits set by the men of the house.”

With this hypocrisy of modern Indian men and women, 2010 welcomes you.

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अंतरिम

12 10 2009

क्या है, क्यों है, कैसे है
सोचता था
जब पाया तो बहुत खुश हुआ

उसके बाद क्या ?
पाया, वो मिल गया
अब कहाँ, किधर, किसको

ढूँढना, चाहत, प्यास, होड़, जिद्द
-लक्ष्य के अनेक रूप है

पर मैंने एक नया रूप पाया
-अलक्ष्य से लक्ष्य का लक्ष्य

शून्य !

अंतरिम, मध्यांतर, ढील, पड़ाव
-का एहसास अजीब है |
हलके कंधे होने जैसा –
पहले आराम, फिर आनंद, और फिर शुन्यता |

न चाह, न उत्साह, न क्रोध, न आनंद, न ख़ुशी और न उदासी

बस मस्त हवा में लहराती – डालों की तरह
बस अपने रास्ते  की मगन – नदी के पानी की तरह
बस अपने गीत गाती – सुबह की चिड़ियों की तरह

लक्ष्यहीन नहीं,
अलक्ष्य ज़िन्दगी !





रक्स

14 05 2009

चलाचल हूँ मैं
एक अंधेर नगरी को
ढुँढता हूँ रौशनी

दम घुटता है
कुछ अच्छा नहीं लगता
पर चलना है , गुजरना

क्या था क्या हो गया
ख़त्म करना है
मझधार में क्यों अटका
न इधर का न उधर का

रुक गयी है हवा
और बस है इंतज़ार
चलाचल हूँ मैं

मिलती हैं कहीं एक किरण
पकड़ने की होड़
ज़रा सी चमक कंटीले कई

तेज़ हो रहा है
तेजी से जा रहा है
धमाक –
एक अघोर सन्नाट्टा, चुप्पी





Puzzle Unsolved

16 03 2009

After breathing for 22 years 8 months 2 weeks 5 days 9 hours 17 minutes and counting, I realized, after reading some other blogs, that life is too short. Life is too short to fight, to hold grudge, to keep arrogance, self-appraisal and to be lazy. At the same time it seems that life is way to long to hold happiness and enjoy it.

I am saying based on my observation – what I see in my life and what I could peek into other (not that I like – I being dishonest here). Again see the use of the word “I” – everything has to start and end with this capitalized phallic symbolized letter. I must say that I have not gone through much of the difficult times as that of my contemporaries. I will not compare with the last generation because they belong to other times and had different set of resources and limitations. I never believed that I went through too much of troubles to achieve what I goaled for. Yes at times it was like I am walking on the fire lines because I was so obsessive about that specific goal. The harshness and the spirit to achieve it- were simultaneous. The fight was fierce but I was fragile for I was still dependent.

Dependency without self-respect, like bondage, welcomes any piece of gratitude or concern thrown at you. I would have been more than happy to concede the fact that I was supported but the project failed or could not be resumed for it fatal nature. However everything sorted later and the goal was achieved and the project indeed got nailed. What did I learnt out of all these mess – the emotional drama, financial catastrophes, political upheaval, and social turnover. Here I would like to philosophized that-

Only under the extreme conditions the creativity could be born.

Without the sun’s killing heat there is no enjoyment of the air-conditioning.

The flower fragrance wouldn’t smell intoxicating if there were no thorns.

Unless you don’t jump you don’t know what gravity is.

Unless you don’t go up to the top floor you don’t know what its like to be a tall building.

Without grief there is no fun in happiness.

Without obstacles there is no fun in achieving

Without opposition there is no fun in winning

………………………………….BUT I AM LAZY……………………………………….

Do I care what anyone says or writes or have their own experiences?

Well then I would say to these people that you are the luckiest mammal (human lay eggs in other’s basket) on the planet. Why? Because these are the rotten lot of losers. Not because they failed after one or numerous trials rather I hate their comfort of no competition life. Looking at these “luckies” I feel so damn jealous of their comfort life. Either they are filthy rich or they don’t have “zing” to compete just like a leech that feeds on sucking someone’s. Why aren’t they thrown into the fires of REAL life? Why should US be the only one roasting! Life is too long to be happy and too short to hold grudge.





असत्याभास

13 03 2009

असत्याभास

एक जवलामुखी है | फुंटता क्यों नहीं | कब तक यह आग की ठंडक मुझे सुजाती रहेगी | एक बार जल जाओं तो चैन मिले |
आग की ठंडक उसकी तपीश से भी ज्यादा दर्दनाक होती है | सुजा हुआ  ठण्ड  है | फूल गया है अन्दर दब्त्ते दबते | और कब तक दबा कर रखूँ | लाल हो रहा है | आग पिला नहीं आसमानी नीला है | छुहोगे तो जलेगा नहीं .. पत्थर बन जायेगा – उसकी जान ही  मर जायेगी | मैं मौत को लिए घूम रहा हूँ | लोग डरते हैं की कहीं मौत न आ जाये | मैं मौत को सीने के कोने में पाल रहा हूँ | नहीं मरता है और न बढता है | उस कोने में बैठे मुझपर हँसता है | मौत गले लगती नहीं और मेरा गला छोड़ती भी नहीं |

कब तक दबाये हुए रखूँ मैं इस कीड़े को | छाती में छेद हो गया है | गहरी गुफा बन गयी | बहुत अँधेरा है वहां | गहरी इतनी कि अपनी पुकार कि गूंज तक नहीं सुने देती | इसी छाती के विस्मय गुफा में कहीं रेंग रहा है यह कीड़ा | गुफा अथाह है | पता नहीं कहाँ ख़त्म होती होगी यह साली गुफा | सुरंगे बन गए है | यह नसे नहीं दीमख से लदि सुरंगे है | चिपकी दीमख बेरोक इस सुरंगों को चुसे जा रही है | चूस चूस के गला रही है | इन दिमखों से मुझे डर लगता है | इनके बीच ही कहीं चुप्पा है कीड़ा |

कीड़ा मुझे चिडाता है –

तुम में कुछ नहीं है | खाली हवा से भरी सुरंग हो | लाल  खून नहीं दीमख सड़ती है तुम्हरे शरीर में | बोली नहीं आह निकलती हैं इन दिमखों की | और इन दीमख से नीली आग निकलती है – तुम जिसे भी पाना चाहोगे उसकी जान तक छीन लोगे | मौत किसे आती है – मौत तो तुम खुद हो | खा जाते हो खुदको और आस पासवाले को | मैं तुम्हारी फिदरत हूँ, तुम्हारी जात वालों की विशेषता हूँ | मैं कीड़ा नहीं – स्वयं हूँ | देखो लो अपनी असली घिनौनी सूरत | कड़वाहट, जलन और असीमित चाह |

सारा बदन गिलगिला हो रहा है | मानो हड्डी नहीं रही | अन्दर से कोई खीँच रहा है | मांस के एक-एक रेशे तेजी से टन के टूट रहे है | छाती धधक रही है | सांस तेज़ हो रही है | खांसी आती है और गले में जलन होती है | गले से जलन हाथों को उँगलियों तक करंट की तरह देहका देती है | दीमख चबाये जा रही है और आग दर्दनाक ठंडक दे रही है | उँगलियों के छोरो में फफोले उठ गए है | उनसे पानी निकल रहा है | जगह जगह फफोले उठ गए है | दीमख पेड़ की टहनियों की तरह अन्दर खोखले किये जा रहे है | फिर उनमे आग आती है | आग सूखापन लाती है और सूखे मर्म पर पर लाल जलन | सब सुजा जा रहा है | ज़रा सा  पानी जलन को और उत्तेजित कर देता है | ये दीमख मेरे आँखों के और जीभ के पेशियों ताने जा रही है |
तेजी से उन्हें खाए जा रहा है | जल रहा हूँ | गलता नहीं और भस्म भी नहीं होता | इन दोनों छोर्रो के बीच मौत का भद्दा तांडव हो रहा है | न मौत न जीवन और अथाह तड़पन बेचैनी और प्यास.|





मैं आज़ाद हूँ

11 03 2009

आज अचानक  आभास हो आया है कि  सब निरर्थक है | मैं कहाँ हूँ  – किधर को  जा रहा हूँ – पता नहीं | लगता है कि जहां से भी शुरू करूं सब वहीं आकर ख़त्म हो जाता है | सब शून्य में मिल जाता है | अँधेरे में सर दीवार से लग गया हो | अन्धेरें में सालों सड़ रहे हो | हाथों की ऊंगलियों से दीवार को महसूस कर रहा हूँ | दम घुट सा रहा है इस अँधेरे में | चीख रहा हूँ पर आवाज़ नहीं निकल रही | बहुत कोशिश कर रहा हूँ मगर सिर्फ हवा निकल रही है | एक पत्ते की तरह  टूट कर गिरने के लिए तिलमिला रहा हूँ | इस घुटन ने मेरा गला पकड़ रखा है | पाव में जैसे ज़ंजीर है | दीवार चढ़ कर पार कर नहीं सकता | अँधेरे मैं कुछ दिखाइए नहीं देता | दीवार पर चडू भी  तो कैसे – न कोई रस्सी है और न कोई साधन | अपनी झुंझलाहट नाखूनो  को दीवार से रगड़ कर निकाल रहा हूँ | पत्थर है सब, टूटे-फूटे, कंटीले | दीवार की छाती पर मुक्के मार रहा हूँ | यह दीवार सरकती क्यों नहीं | मैं यहाँ क्यों फंसा हूँ | कोई मेरी आवाज़ सुनता क्यों नहीं | सब कहाँ मर गए है ? पूरा बदन जल रहा है | मानो इस पत्थर की दीवार से आग निकल रही है | जैसे चीताह अपने  मुंह में हिरनी के बच्चे की गर्दन को दबोच लेता है उसी तरह यह आग और अँधेरा मेरी हर सांस को दबोचे जा रही है |

मैं क्यों जी रहा हूँ | क्या मूल्य है मेरा आबादी से भरे इस दुनिया में | कीडे की तरह कई जनमते है और कीडे की तरह मर जाते है | जीना क्या है – एक उम्र की अड़ियल उबासी या एक गुबारे के फूलने और फोटने की बीच की मौज |

इस छोटे से अंधेर कमरे में, छह ओरो से घीरे , ये पत्थर की दीवारें मुझपर हंसती है | इनकी हंसी मेरी हर कोशिश पर जोर हो जाती है | मैं इनको नोंचता हूँ, चीरता हूँ , धकेलता हूँ | हर कोशिश की उलाहना करती है हर एक ईंट | मुझे कोसते  है –

तुम भी यहीं साडोगे | इन्ही आग की तपीश में गल जाओगे | नोचो हमे जितना नोचोगे   हमे उतना मज़ा आएगा | तुम्हे यहीं सड़ना  है | यहीं साडोगे – मिट्टी में कईयों की तरह मिल जाओगे | कौन जी सका है यहाँ ? किसे मिलती है मुक्ति ? रेंग रेंग कर मरोगे | तुम आदमजात हो ही इसी लायक ! तुम में और जानवर में कोई फर्क नहीं है | पैदा कर दिए जाते हो – पल भी जाते हो – फिर कैद हो जाते हो !

मैं दोनों हाथो से अपने कानो को बंद कर रखा हूँ | पर इनकी हंसी पहुँच हो जाती | मेरी आखें बड़ी-बड़ी हो गए है | इन दीवारों पर चीख -चीख कर गालियाँ दे रहा हूँ – चुप हो जाओ , सालो | हंसी गूंज रही है – चारों और से | में कानो को जोर से बंद किये हूँ | कानो को दबाते हुए सर हिला रहा हूँ और दम भर के चीख रहा हूँ – नहीं , नहीं | उकड़ू होकर बैठ गया हूँ | सर को अन्दर किये हुए हूँ | नहीं नहीं करते मेरी छाती झटकी | गला सुख रहा है | उबाकी आई और सांस अन्दर अटक गयी  |  घबराहट से फिर छाती झटकी और सुबकना फूंट के निकला | जैसे कमज़ोर बांद की बूडी ईंट नदी के  पानी को डट कर रोकने की कोशिश करती है पर पानी का तेज़ उस बूडी ईंट को एक फूँक में गिरा देती है और एक-एक करके पूरा बांद दह जाता है |

उकड़ू बैठे, सर को घुटनों और छाती के बीच लगाए, मेरा सुबकना तेज़ हो रहा था | मैं अपने आप को और समेटे जा रहा था जैसे ठण्ड में कुत्ता  गरमाहट पैदा करने के लिए खुद को समेट लेता है |

…. और आज़ादी मुझमे ही सिमटने लगी |





ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद

28 02 2009

नमस्कार

यह मेरा पेहला  पोस्ट है । आशा है कि आपको पसन्द आयेगा ।

ज़िन्दगी का सफर फिलहाल बहुत अच्छा रहा है | मुझे हमेशा लगता रहा है कि मेरी सफलता सिर्फ़ मेरी नहीं है बल्कि कई लोगों का सहयोग रहा है | आज मैं पहली दहलीज़ को पार कर, एक ओद्धे तक पहुँच चुका हूँ |
पीछे मुड़के देखता हूँ तो लगता है कि एक सदी बीत गई है| हालाँकि सिर्फ़ चार साल ही हुए है |
कल रात सपने में मैंने देखा कि मैं अपनी प्राथमिक स्कूल में हूँ और मेरे दोस्त और शिक्षक हैं | अपनी कक्षा में अच्छे बच्चे की तरह मैं बैठा पढाई कर रहा था | ब्रेक का वक्त हुआ और बेल बज गई | हम सब दोस्त इक्कठा होकर टिफिन  करते थे | मुझे याद है कि हमने एक फैसला किया था कि हमेशा साथ खायेंगे और अगर कुछ खरीदना हो तो साथ खरीदेंगे | मैंने अपने दोस्तों को दगा दिया था| मैंने अकेले जाकर पसंदीदा कचोडी चना (दही और इमली के साथ) खाया था – चुपके से | वो कचोडी आज भी मेरे मुह में पानी लाती है और उस जैसी कचोडी शायद कलकत्ता मैं कहीं नहीं मिलेगी, ऐसी मेरी भावना है | तो किसी एक दोस्त ने मुझे देख लिया और बाकि को कह दिया कि नितिन ने अकेले ही कचोडी खा ली बिना किसी को बताये | फिर एक ने आके मेरा गला पकड़कर कहा, “चल अब चौबीस रुपये निकाल |” मैं आश्चर्य से बोला “क्यों ” तो उसने कहा ” तीन रुपये का एक और हम आठ” | मैंने झडक कर
कहा कि मैं जब चाहूं तब खा सकता हूँ, किसी की मंजूरी की ज़रूरत नहीं, तुम्हे खाना हो तुम खाओ, दूसरे को क्यों रोकते हो | ऐसी कोई बात बड़ी नहीं थी कि कोई मुझसे बात नहीं करें | और मैंने एक नया चलन शुरू किया | अगले दिन दूसरे लड़के ने ख़ुद खाया | सभी को लगा कि पुराने नियम मैं बदलाव कि ज़रूरत है और हमने फ़ैसला किया कि जो चाहे तब खा सकता है और इस नए “अमेंडमेंट” को उत्सव के रूप में हम सब ने दही इमली वाली कचोडी खाकर मनाई |

मेरा कदम ज़रूर विद्रोही हो सकता था पर मुझे ख़ुद पर विश्वास था कि मैं जो करने वाला हूँ वो भले सही हो या ग़लत , मगर जो चलन है वो ठीक नहीं है | एक बंधन था जिसे तोड़ने की किसीने हिम्मत नहीं की | मैं नहीं कहता कि उनमे हिम्मत नहीं थी या मुझमे हिम्मत थी | मगर कायर नहीं था | शायद कई ने छिपके खाया हो जैसे मैंने ही खाया था | मगर पकड़े जाने पर मैंने अपनी बात कही, कुछ गिल-गिला नहीं कहा और स्पष्ट कहा |

पता नहीं क्यों यह घटना मेरे दिमाग से जाता नहीं हैं | शायद मुझे तब समझ लेना चाहिए था कि मेरी ज़िन्दगी में कई लडाइयां लिखी है जिन्हें ज्यादातर मैं ही शुरू करता हूँ | लडाइयां अपने पेट के लिए नहीं मगर सच्चाई के लिए |
सच, उचित, निष्कपट और स्वच्छता – स्वयं से और समाज से – ज़रूरी है |