इतना आसान है क्या

21 08 2009

ख़ुशी ढूँढना इतना आसान है क्या
पता नहीं था
फिर इतनी दूर क्यों है ख़ुशी

मौज और साहिल के बीच का खेल है निराला
कभी चडाव कभी उतराव
क्या स्थिरता यही है

चैन ढूँढना इतना आसान है क्या
पता नहीं था
फिर इतनी दूर क्यों है चैन

सूरज और चाँद  के बीच का खेल है निराला
कभी आप तो कभी आप
क्या वक़्त यही है

दिन चढ़े और रातें उतरी
उम्र की परछाई जिस्म और दिमाग पर छपी
लग गया है एक ताला
चाबी ढूँढना इतना आसान है क्या !

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कौआ छू गया

11 06 2009

यह एक मज़ेदार प्रसंग है | मर्द और औरत दोनों ही इस बात को बड़ी दिलचस्पी से लेते है | मगर बूढ़े

कौआ छू गया

कौआ छू गया

लोग – शरीर से या  दिमागे से बूढ़े लोग – इसकी बात करने को क्रोधी नज़र से देखते है |

ऐसा ही कुछ था मेरे भी परिवार में| छोटा था तो सब कह देते थे कि “यह बडो की बातें है”| मुझे समझ में नहीं आता था कि बडो की बातें तो स्कूल में सिखाई जाती है तो यह कौन सी बात है जो स्कूल में भी नहीं सिखाई जाती ? अपने मम्मी या पापा से इस बारे दुबारा पूंछने की हिम्मत ही नहीं होती थी | अगर दुबारा पूंछ लिया तो मानो क़यामत आ गयी | झडक के सुनने मिलता “एक बार बोलने से समझ में नहीं आता है क्या तुमको ?” और अगर अपने दादी या दादा से पुँछ लिया तो गज़ब हो गया “आजकल के छोरा छोरी ने लाज-सरम कोणी रह्यो – जा आपणी माँ ने पूंछ” |

आखिर क्या था जो पूरे परिवार के लिए एक वर्जित, घिनौना, अमान्य विषय था | उस बात के बारे में जिज्ञासा होना और जिज्ञासा होने पर पूंछने पर इतनी रोक क्यों थी ? जिज्ञासा जागना वर्जित क्यों था ? क्या इतने डरवाने थे वो दिन | क्यों उस बात से बड़े चिड़ते थे – बात करने में हिचकिचाते थे, शर्म महसूस करते थे | आखिर क्या था ?

वो दिन मानो घर की औरतों के लिए श्रापित दिन था | शायद घर के मर्दों के लिए भी | पूरे घर की दिनचर्या ही बदल जाती | ऐसा क्या अजूबा होता था हर महीने ? कभी किसी ने इसके बार में ज़िक्र नहीं किया | कारण ? पता नहीं | बचपन में मुझे सुनाया जाता था एक वाक्य, और धीरे-धीरे मैं यह वाक्य, अपनी कल्पना अनुसार, सिख भी गए | उस वाक्य को सुनकर मुझे आज भी हंसी आती है और मैंने इस वाक्य से जो कल्पना बनाई उसे सोचकर ज्यादा हंसी आती है | बड़ा मासूम वाक्य  है –

कौआ छू गया

महीने में कम से कम एक बार कुआ छू के चला जाता है | कब और कैसे ? पता नहीं | मगर कुआ घर में घुस कर किसी को छू देता है और वह चार से सात दिन के लिए श्रापित हो जाता है | कहीं मुझे आकर न छू दे इसलिए मुझे कौवे से घृणा और डर होना लगा जो आज भी कायम है और शायद ज़िन्दगी भर रहेगा| क्योंकि घर के मर्द काम पर चले जाते थे इसलिए वो कौवे से बच जाते थे | मगर घर की औरतों को कौवे का सामना करना पड़ता था | एक कबड्डी के खेल की  तरह होता था – कौवे को भगाना है और साथ में ध्यान रखना है कि कौवा छू नहीं पाए | अगर कौवे ने छू दिया तो कौवे की जीत हो जायेगी | उस खेल में आज तक ऐसा नहीं हुआ कि कभी कौवे की हार हो | अब क्या ? मैदान में हारे खिलाडी की तरह, अपने आप को आत्मसमर्पण करना पड़ता था |

एक रुढ़िवादी मारवाडी संयुक्त परिवार में, उस खिलाडी को उस हार की सजा मिलता है | यह सजा मुझे आज तक नहीं समझ में आई | किसने बनाई यह सजा | इन सजाओं को क्यों माना जाता है | खिलाडी उस सजा क्यों चुपचाप सह लेता है | समयानुसार देश और राज्य के नियम-कानून बदलते रहते है मगर इस कानून में कोई परिवर्तन क्यों नहीं आया ?

यह सजा जितनी जाली लगती है उतनी ही हास्यमय भी लगती है | और हसी की बात यह है कि लोग ख़ुशी-ख़ुशी इस सजा को सहते भी है और दुसरे पे होते देखते भी है | आखिर एक रुढ़िवादी मारवाडी संयुक्त परिवार में कौवे से हारने की क्या दिलचस्प सजा मिलती है –

तुम्हे छुआ नहीं जायेगा | अगर भूल से कोई तुम्हे छू दे तो उसे सबसे पहले नहाना पड़ेगा | उसके कपडे भी “अशुद्ध” हो जायेंगे इसलिए कपड़ो पर तुंरत पानी डालना होगा | पानी डालने से “अशुद्धता” चली जायेगी |

तम्हारे खाने के बर्तन अलग होंगे | तुम सबके साथ बैठ कर नहीं खा सकते | तुम्हे अपना बर्तन अलग रखना होगा और उसकी सफाई भी अलग जगह करनी होगी | भूल से अगर कोई तुम्हारे खाने से निवाला ले ले तो वह “अशुद्ध” हो जायेगा | भूल से अगर तुम्हारे बर्तन से अपने बर्तन को छू दे तो उसका बर्तन भी “अशुद्ध” हो जायेगा | उसके बर्तन की सफाई भी तुम्हे करनी होगी | बर्तन में छाई और पानी लगने से बर्तन की “अशुद्धता” चली जायेगी |

तुम्हारा बिस्तर भी अलग होगा | चादर, तकिया और ओड़ना भी अलग होगा | ये सारी चीजे “अशुद्ध” होंगी | किसी भी “शुद्ध” चीज़ के छूने पर “शुद्ध” चीज़ “अशुद्ध” हो जायेगी | यानी अगर तुम्हारे बिस्तर पर कोई “शुद्ध” व्यक्ति सो जाए तो तुम्हारे “अशुद्ध” चादर और तकिये के स्पर्श से वह व्यक्ति “अशुद्ध” हो जायेगा और उसके कपडे भी | पानी डालने से वह व्यक्ति फिर “शुद्ध” हो जायेगा और उसके कपडे भी |

तुम्हारे कपडे भी अलग ढेर में रहेंगे | अपने कपडे की सफाई अलग जगह करनी होगी | क्योंकि उतारे हुए कपडे “अशुद्ध” माने जायेंगे इसलिए उनपर तुंरत पानी डालना होगा – खोई  “शुद्धता” को वापस लाने के लिए |

तुम्हारा रसोई और मंदिर या पूजा-स्थल में जाना वर्जित है | यहाँ तक कि तुम्हारी परछाई भी पड़ना, उन “पवित्र” स्थानों पर महापाप है | अगर तुम रसोई या पूजा-स्थल में गए तो तुम कुल का नाश कर दोगे और सबको तुम्हारा “पाप” भुगतना पड़ेगा |

तुम्हारे शरीर में होते उतार-चडाव के कारण, अगर मानसिकता में बदलाव आये जैसे – ज्यादा खून बहने पर कमजोरी और उदासी महसूस करना, या नहीं बहने पर क्रोधी और उत्तेजित महसूस करना – तुम्हारी एक नहीं सुनी जायेगी | बल्कि तुम्हे और तिरस्कृत रूप से देखा जायेगा |

“शुद्ध” और “अशुद्ध” के खेल को ख़त्म करता है मुन्सिपालिटी का पानी | पाँचवे दिन से तुम्हारी सजा कम कर दी जायेगी | सांतवे दिन को तुम्हे रिहाई मिल जायेगी |

मगर कौवा बड़ा चालक है | वह मौके की तलाश में हमेशा लगा रहता है | यह कबड्डी अभी ख़त्म नहीं हुई | तेरह वर्ष की आयु में लडकियां कौवे से खेल करना शुरू करती देती है और पंचास साल की उम्र के बाद निवृत्ति (retirement) प्राप्त करती है | जब तक खून लाल है, तब तक खेल जारी रहेगा | और सजा भी रहेगी | या सजा रहेगी नहीं ?





माक्यावैली के प्रसिद्ध कथन, ” द प्रिन्स ” से

24 05 2009
 माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532  में प्रकाशित

माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532 में प्रकाशित

निकोलो माक्यावैली द्वारा, इतालवी भाषा में, लिखित ” द प्रिन्स ” की चर्चा जारी रखते है | पिछले पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के, विभिन्न विषयों पर, विचारों का सारांश प्रस्तुत है |

पिछले पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे:       द प्रिन्स (1532 में प्रकाशित)

इस पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के प्रसिद्ध कथनों (famous quotations) की चर्चा होगी| मैंने पांच मनोहर अवतरणों को चुना है और उनकी व्याख्या की है –

1. At this point one may note that men must be either pampered or annihilated. They avenge light  offenses; they cannot avenge severe ones; hence, the harm one does to a man must be such as to obviate any fear of revenge.

अनुवादित –

अब ये ध्यान देने की बात है कि मनुष्य को या तो लाड-प्यार किया जाए या फिर मिटा दिया जाये | मनुष्य छोटी बातों पर बदले की भावना रखता है: मनुष्य में बड़े, गंभीर चोंट का बदला लेने की क्षमता नहीं होती; अतः, ऐसी हानि पहुंचानी चाहिए ताकि उसके बदले का डर नहीं रहे |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय ३ से है | इस अवतरण में माक्यावैली ने तर्क (logic) को नैतिकता (ethics) के ऊपर रखा है| राजा को  समझाना चाहिए कि उसके पास सिर्फ दो विकल्प है – उपकार या विनाश | क्योंकि विनाश से प्रजा क्रोधित हो सकती है, इसलिए विनाश तभी उपयोग करना चाहिए जब विनाश निश्चित रूप से राजा के द्वेषी मंत्री और दुश्मनों का खात्मा कर सके | दया, तरस, रहम, और करुणा निरर्थक है | आत्मकेंद्रतिता और स्वयं-सुरक्षा ही प्रमुख कारक और इन दोनों तत्वों का आचरण निष्ठूरता से करना चाहिए |

2. [P]eople are by nature changeable. It is easy to persuade them about some particular matter, but it is hard to hold them to that persuasion. Hence it is necessary to provide that when they no longer believe, they can be forced to believe.

अनुवादित –

मनुष्य स्वाभाविक रूप से परिवर्तनशील होता है | मनुष्य को किसी ख़ास बात में फुसलाना आसान है, मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखना कठिन है | अतः, यदि मनुष्य विश्वास खो दे तो ज़बरदस्ती करके विश्वास लादा जा सकता है |

व्याख्या –

यह प्रसंग अध्याय ६ से लिया गया है | माक्यावैली ने मनुष्य की प्रकृति पर अपनी धारणा बतलाई है | हलाकि इन धारणाओं को प्रमाणित करने के लिए माक्यावैली ने कोई उदाहरण या तर्क नहीं दिए | माक्यावैली का मानना था कि मनुष्य आम तौर पर समय या परिस्थिति अनुसार बदलते रहते हैं | मनुष्य को किसी बात पर उकसाना या फुसलाना (convince, persuade) सरल है | मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखने के लिए योजना या दुसरे प्रबंध रखने पड़ सकते है क्योंकि मनुष्य चालाक होता है इसलिए देर तक फुसलाये रखना कठिन हो सकता है | माक्यावैली कहते है यदि मनुष्य बातों की जादूगरी से  विश्वास नहीं करे तो अंत में बल को उपयोग करना चाहिए | बल के दबाव में मनुष्य किसी भी बात को मान लेता है |

3. A prince must have no other objective, no other thought, nor take up any profession but that of war, its methods and its discipline, for that is the only art expected of a ruler. And it is of such great value that it not only keeps hereditary princes in power, but often raises men of lowly condition to that rank.

अनुवादित –

राजा का दूसरा उद्देश्य नहीं होना चाहिए, दुसरे विचार नहीं आने चाहिए, और न ही दूसरा पेशा बल्कि केवल युद्घ, युद्घ के तरीके और युद्घ के अनुशासन, क्योंकि एक शासित राजा से युद्घ की ही उम्मीद रखी जाती है | युद्घ बहुत मूल्यवान है क्योंकि एक ही वंश के राजा, पीड़ी दर पीड़ी, राजगद्दी में शासित हो सकते है और युद्घ से नीच कुल के पुरुष को राजा बनने का अवसर मिल सकता है |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय १४ से उद्धृत है | माक्यावैली युद्घ-कला को शास्त्रीय ज्ञान और वास्तविक अनुभव मानते है | शास्त्रीय ज्ञान क्योंकि युद्घ को, पौराणिक कहानियों और मंत्रों की तरह, इतिहास में हुए युद्धों को उदाहरण के रूप में पढ़ा जा सकता है | वास्तविक अनुभाव क्योंकि बिना अनुभव किये युद्घ के अनुशासन को पढ़ना निरर्थक है | माक्यावैली ने सरकारी कार्य को सामरिक (military) नज़रों से देखा है| क्योंकि हर सरकार का एक ही लक्ष्य होता है – स्वयं-सुरक्षा (self-preservation) और सैनिक प्रतिरक्षा (military defense) | इसके लिए सरकार को कुटिल नीति (diplomacy), कुशल रणनीति (tactical strategy), भौगोलिक कौशल (geographic mastery), और एतिहासिक विश्लेषण (historical analysis) का सहारा लेना चाहिए | माक्यावैली मानते है कि राजा सर्व विद्वान नहीं हो सकता, परन्तु राजा का अंतिम उत्तरदायित्व अपने राज्य की स्थिरता और एकता बनाए रखना है, राज्य की खुशहाली ज़रूरी नहीं |

4. Only the expenditure of one’s own resources is harmful; and, indeed, nothing feeds upon itself as liberality does. The more it is indulged, the fewer are the means to indulge it further. As a consequence, a prince becomes poor and contemptible or, to escape poverty, becomes rapacious and hateful. Of all the things he must guard against, hatred and contempt come first, and liberality leads to both. Therefore it is better to have a name for miserliness, which breeds disgrace without hatred, than, in pursuing a name for liberality, to resort to rapacity, which breeds both disgrace and hatred.

अनुवादित –

अपने पूंजी-साधन का खपत सबसे खतरनाक होता है | उदारता स्वयं को खा जाती है | जितना खपत होगा, पूंजी-साधन उतना कम होगा | फलतः, राजा गरीब और अपमानजनक बन जाता है या गरीबी से बचने के लिए अति लोभी और कुत्सित बन जाता है | राजा को जितनी भी चीज़ों से बचना चाहिए, उनमे सबसे पहले है – प्रजा की नफरत और तिरस्कार | उदारता नफरत और तिरस्कार दोनों को जनमती है | बेहतर होगा अगर राजा कंजूसी के लिए प्रसिद्ध हो | क्योंकि कंजूसी से सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) होता है प्रजा को राजा से नफरत नहीं होती | पहले उदार होना, फिर गरीबी में चले जाना, तिरस्कार और नफरत दोनों को पैदा करती है |

व्याख्या –

यह अवतरण सोलहवी अध्याय से उद्धृत है | इन पंक्तियों में राजनीतिज्ञ और धर्माचरण के प्रति माक्यावैली के भाव प्रदर्शित होते है | माक्यावैली राजा को सलाह देते है कि जब राज्य के लिए काम करो तो मूल्यों और सिद्धांतों का तिरस्कार कर दो | सिर्फ धर्म के नाम पर या धर्म के लिए धर्म का पालन करना राज्य के लिए हानिकारक है | राज्य चलाने की कला और राजा के निजी मूल्यों और सिद्धांतों के बीच कभी टकराव नहीं होना चाहिए | राजा को अपने निजी मूल्यों और सिद्धांतों से ऊपर उठकर सोचना चाहिए | उदारता प्रशंसनीय है – प्रजा उदारता को सरहाती है, मगर अंतिम में यही उदारता राज्य को खा जाती है | इसलिए उदारता से दूर रहना चाहिए | सिद्धान्तहीन होने पर राजा से प्रजा नफरत नहीं करती | प्रजा राजा से नफरत तब करती है जब राजा अपने कर्त्तव्य को नहीं निभाता है या राज्य की सुरक्षा नहीं कर पाता | धर्माचरण में स्वयं-त्यागी बनना पड़ता है जो राज्य के स्वयं-सुरक्षा के उद्देश्य के प्रतिकूल है |

माक्यावैली कहते है कि उदार राजा कहलाने से बेहतर कंजूस राजा होना है | क्योंकि जब पूंजी-साधन ख़त्म हो जायेगा तब उदारता की आदती प्रजा अपने राजा से नफरत और तिरस्कार (मज़ाक) करने लगेगी | मगर कंजूस राजा होने पर प्रजा सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) करेगी, नफरत नहीं |

5. Here a question arises: whether it is better to be loved than feared, or the reverse. The answer is, of course, that it would be best to be both loved and feared. But since the two rarely come together, anyone compelled to choose will find greater security in being feared than in being loved. . . . Love endures by a bond which men, being scoundrels, may break whenever it serves their advantage to do so; but fear is supported by the dread of pain, which is ever present.

अनुवादित –

यहाँ एक सवाल उठता है – क्या प्यार किये जाना, डर होने से बेहतर है या इसका उल्टा | उत्तर है, सबसे श्रेष्ठ होगा यदि आपको लोग प्यार भी करें और आपसे डरे भी | हलाकि यह दोनों का एक साथ होना दुर्लभ है, अगर किसी को दोनों में से एक चुनना हो तो लोगों के मन में उसका डर होना उसे ज़्यादा सुरक्षित, महफूज़ रखेगा | प्यार एक जोड़ की तरह रहता है जिसे मनुष्य अपना काम सिद्ध होने पर तोड़ सकता है| मगर डर का संयोग भीषण दर्द से होता है, दर्द का एहसास हमेशा कायम रहता है |

व्याख्या –

ये पंक्तियाँ अध्याय १७ से ली गयी है | शायद सुनने में लगता है कि माक्यावैली ने “द प्रिन्स” अत्याचारियों के लिए लिखा है | मगर गौर से पढ़ा जाये तो माक्यावैली ने मनुष्य की प्रवृत्ति (human nature) का आश्चर्यजनक विश्लेषण (analysis) दिया है | माक्यावैली कहते है कि यह मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि परिस्थिति अनुसार अपना स्वर बदले | परिस्थिति अनुसार मनुष्य नमक हराम बन सकता है | मगर राज्य को सफलतापूर्वक चलाने के लिए जनता और मंत्रियों की वफादारी की ज़रुरत होती है | इन दोनों बातों से यह बात निकलती है कि राजा को अगर उपकार और कठोरता में से एक चुनना हो तो कठोरता ज्यादा भरोसेमंद है, ज़्यादा फलदायक है | माक्यावैली शौक के लिए क्रूरता या कठोरता की वकालत नहीं करते | क्रूरता और कठोरता केवल राज्य के हित के लिए होना चाहिए | क्रूरता और कठोरता राज्य को चलाने की कला के प्रमुख भाग है |

यदि चुनना हो कि लोग आपसे प्यार करे या आपसे डरे तो सबसे अच्छा होगा कि लोग आपसे डरे भी और प्यार भी करे| मगर दोनों का साथ होना मुश्किल है| इसीलिए विकल्प दिए जाने पर डर को चुनना चाहिए | क्योंकि प्यार कभी भी द्वेष बन सकता है या प्यार के बंधन को मतलब पूरा होने पर तोडा भी जा सकता है | मगर डर लोगों के मन में बना रहता है| डर का सम्बन्ध पीडा से होता है| पीडा शारीरिक हो या मानसिक, डर के साथ बंधा होता है| जब डर लगता है तो पीडा दिमाग में ताज़ा हो जाती है | पीडा से बचने या भागने की मनुष्य की प्रवृत्ति होती है| पीडा से बचने के लिए मनुष्य अपने राजा की आज्ञा मान लेता है| इसलिए प्रजा और मंत्रियों को डराए रखने में ही राजा की राजगद्दी की सलामती है अर्थात् राजा स्वयं-सुरक्षित है |





द प्रिन्स (1532 में प्रकाशित)

23 05 2009
31 वर्षीय निकोलो माक्यावैली सन् 1500 में

31 वर्षीय निकोलो माक्यावैली सन् 1500 में

” द प्रिन्स ” इतालवी भाषा में लिखित एक राजनीतिक निबंध है | इसे निकोलो माक्यावैली ने सन् 1513 में लिखा था | इसका प्रकाशन माक्यावैली के मरने के पांच सालो बाद सन् 1532 में इटली के फ्लोरेंस राज्य में हुआ था |

“द प्रिन्स” की चर्चा करने से पहले निकोलो माक्यावैली की जीवनी पर प्रकाश डालना चाहूँगा |

माक्यावैली (May 3, 1469 – June 21, 1527) इतालवी (Italian) दार्शनिक, लेखक, और नेता थे| उन्हें आधुनिक राजनीति-विज्ञान (modern political science) का गुरु माना जाता है| पूर्वी देशो में उन्हें “पाश्चात्य चाणक्य” के नाम से जाना जाता है| वे फ्लोरेंतिन गणराज्य के राजदूत के सचीव थे| उन्होंने दर्शन-शास्त्र (philosophy), राजनीति, सेना (military) और राष्ट्रीय सुरक्षा (national defense) के ऊपर, अपने अनुभव के अनुसार, लेख लिखे है- “The Art of War” and “Discourses on Livy”.

माक्यावैली ने “द प्रिन्स” को शासन करने की वास्तविक मार्गदर्शिका के रूप में लिखा है | “द प्रिन्स”
फ्लोरेंस के राजा लोरेंजो दे मेदिची को समर्पित है और माक्यावैली ने अपनी लेख भेंट के रूप में प्रस्तुत की थी | “द प्रिन्स” काल्पनिक या दुर्बोध नहीं है बल्कि यह सरल और खरा निबंध है | माक्यावैली ने वास्तविक और सहज सलाह को प्रस्तुत किया है | उन्होंने अनेक विषयों पर चर्चा की है | उनमे से प्रमुख विषयों का सारांश प्रस्तुत है –

राजनीतिज्ञ और युद्घ-कला (Statesmanship and Warcraft) :

माक्यावैली का मानना था कि एक तंदरुस्त खड़ी सेना ही अच्छे कानून को जन्म दे सकती है | उनका
बहुचर्चित कथन था, “The presence of sound military forces indicate sound laws”. युद्घ के
प्रति माक्यावैली के विचार अलग थे | उनका मानना था कि राज्य के विकास के लिए युद्घ आवश्यक है
लेकिन निर्णायक नहीं | यानी केवल युद्घ विकास नहीं ला सकता | युद्घ में विजयी होना स्वस्थ राज्य
की नीव है | “द प्रिन्स” में विस्तार से लिखा है किस तरह राज्य को हड़पना चाहिए,  हड़प राज्यों की
जनता और मंत्रियों के साथ किस तरह पेश आना चाहिए ताकि वे आज्ञाकारी रहे और किस तरह अपने
राज्य के आतंरिक विद्रोह को रोकना चाहिए ताकि बाहरी युद्घ में अर्चाने न आये | माक्यावैली ने युद्घ में
जीतने के लिए केवल अस्त्र-शस्त्र और   प्रबल सेना की प्रशंसा नहीं की | जीतने की लिए – कुटिल निति
(diplomacy), घरेलु राजनीति (domestic politics), कुशल रणनीति (tactical strategy),
भौगोलिक कौशल (geographic mastery), और एतिहासिक विश्लेषण (historical analysis) – का
प्रयोग अत्यंत आवश्यक माना है |

मित्रभाव और नफरत (Goodwill and Hatred) :

राजा को गद्दी पर सालों जमे रहने के लिए अपनी प्रजा की नफरत से बचना चाहिए | यह ज़रूरी नहीं
कि राजा को अपनी प्रजा से प्यार मिले | वास्तव में सबसे अच्छा होगा यदि प्रजा अपने राजा से डरे |
नफरत राजा के दुश्मनों को सहायता दे सकती है जिससे राजा अपनी गद्दी खो सकता है | माक्यावैली
ने क्रूरता को इस्तेमाल करने की सलाह दी है यदि क्रूरता से राजा के मित्रभाव सलामत रहे | राजा का
मित्रभाव, यानि प्रजा का राजा के साथ होना, घरेलु विद्रोह और बाहरी आक्रमण के समय एकता
बरकरार रखता है | प्रजा का मित्रभाव मिलने से राज्य में खुशहाली फैले ऐसा ज़रूरी नहीं है | राजा का
मित्रभाव केवल एक राजनैतिक औजार है जिससे राजा, अपने राज्य में स्थिरता लाकर, अपना
शासनकाल बढाता है |

स्वतंत्र इच्छा (Free Will) :

माक्यावैली ने “शूरता” और “सौभाग्य” का उपयोग कई बार किया है | “शूरता” का तात्पर्य व्यक्तिगत
गुण और “सौभाग्य” का तात्पर्य मौका या संजोग | माक्यावैली विश्लेषित करते है कि राजा की सफलता
या विफलता उसके मन की इच्छा और उसके आस-पास की परिस्थिति परपर निर्भर करती है | माक्यावैली इच्छा और नियतिवाद (determinism) को तोलकर कहते है कि मनुष्य
का कर्म को नियंत्रित करता है – 50% सौभाग्य (यानी मौका या संजोग) और 50% इच्छा |
हलाकि दूरदर्शिता से मनुष्य संजोग के हेर-फेर से बचाव कर सकता है |  अतः माक्यावैली कहते है
कि मनुष्य अपना भाग्य प्रबल इच्छा से बनाता है मगर कुछ हद तक ही क्योंकि हालातों और
परिस्थितियों पर मनुष्य का जोर नहीं है |

धर्माचरण (Virtue) :

माक्यावैली धर्माचरण की परिभाषा देते है – धर्माचरण वो गुण है जिसकी लोग प्रशंसा करे, जैसे
दानशीलता, दुसरे का  दया-माया करना, इश्वर-भक्ति, सहानुभूति और करूणा | माक्यावैली कहते है कि
राजा को धर्मचारित दिखलाई पड़ने की  कोशिश करनी चाहिए मगर धर्म के लिए धर्म का पालन करना
राजा के लिए हानिकारक हो सकता है | धर्मचारित दिखलाई पड़ना चाहिए मगर धर्मचरित होना ज़रूरी
नहीं | प्रजा धर्माचरण को सरहाती है इसलिए उनके मित्रभाव को जीतने के लिए धर्मचारित दीखलाई
पड़ना राजा के लिए बेहतर होगा | यदि राजा पूरी निष्ठा से धर्म का पालन करे तो उसके लिए
हानिकारक है | राजा को पापाचरण का त्याग अवश्य नहीं करना चाहिए | पापाचरण जैसे क्रूरता और
बेईमानी के प्रयोग से  राज्य का भला हो सकता है | राजा को नहीं भूलना चाहिए कि प्रारंभिक क्रूरता
से राज्य को दीर्घ स्थिरता मिल सकती है | राज्य की भलाई और खुशहाली से भी अधिक महत्वपूर्ण है
राज्य की स्थिरता और एकता जो आंतरिक विद्रोह और बाह्य-आक्रमण से राज्य को बचा सकती है |

पापाचरण का अनुसरण केवल पापाचरण के वास्ते नहीं करना चाहिए | ठीक उसी प्रकार धर्माचरण का
पालन केवल धर्म के लिए नहीं करना चाहिए | राजा का हर कदम अपने राज्य की भलाई नहीं बल्कि
राज्य पर उस कदम का क्या असर पड़ेगा यह सोच कर उठाना चाहिए | राजा को नहीं भूलना चाहिए
कि प्रारंभिक क्रूरता से राज्य को दीर्घ स्थिरता मिल सकती है |  राजा को अपने निजी आचरण और
नीति से ऊपर उठकर, धर्माचरण और पापाचरण का पालन अपने राज्य के हेतु करना चाहिए |

मनुष्य की प्रकृति (Human Nature) :

माक्यावैली दृढ़ता से कहते है कि मनुष्य में ऐसे कई लक्षण है जो पैदायशी है | आम तौर पर हर
मनुष्य मतलबी होता है मगर  प्रेम या मोह जीता भी जा सकता है और जीतने के बाद हारा जा
सकता है  और हारने के बाद जीता भी जा सकता है | आम तौर पर लोग खुश और संतुष्ट रहते है
जब तक उनकी परिस्थिति में बदलाव नहीं आता | मनुष्य अपने समृधि के समय में  विश्वासी हो
सकता है और नहीं भी | मगर विपत्ति में फंसा मनुष्य तुंरत स्वार्थी, कपटी और फायदा उठाना वाला
बन जाता है | मनुष्य दुसरे मनुष्य की उदारता, हिम्मत और इश्वर-भक्ति की प्रशंसा करता है परन्तु
स्वयं नहीं पालान करता | आकांक्षा उन्ही मनुष्यों में पाया जाता है जिन्हें थोडी-बहुत सत्ता मिली हो |
आम जनता अपने स्टेटस में खुश रहती है और ऊँचे स्टेटस में जाने की अभिलाषा नहीं रखती |
मनुष्य किसी भी मदद का स्वाभाविक रूप से आभारी रहता है और इस बंधन को आसानी से नहीं
तोडा जाता | हलाकि वफादारी जीती और हारी जा सकती है और मित्रभाव (goodwill) भी |

माक्यावैली के ये थे कुछ प्रमुख विषयों के प्रसंग | “द प्रिन्स” में माक्यावैली ने प्रत्येक अध्याय
(chapter) में विस्तार से विषयों पर, ऐतिहासिक घटनाओ का उदहारण देकर, अपने तर्क को शसक्त किया है |

अगले पोस्ट में माक्यावैली के बहुचर्चित कथन (famous quotations) पर चर्चा होंगी | तब तक के लिए नमस्कार |





रक्स

14 05 2009

चलाचल हूँ मैं
एक अंधेर नगरी को
ढुँढता हूँ रौशनी

दम घुटता है
कुछ अच्छा नहीं लगता
पर चलना है , गुजरना

क्या था क्या हो गया
ख़त्म करना है
मझधार में क्यों अटका
न इधर का न उधर का

रुक गयी है हवा
और बस है इंतज़ार
चलाचल हूँ मैं

मिलती हैं कहीं एक किरण
पकड़ने की होड़
ज़रा सी चमक कंटीले कई

तेज़ हो रहा है
तेजी से जा रहा है
धमाक –
एक अघोर सन्नाट्टा, चुप्पी





श्रद्धांजलि

4 04 2009

श्रद्धांजलि

आज बहुत दिन बाद कुछ वक्त मिला है तो लिखने की ज़रुरत महसूस हो गयी | शायद खालीपन मुझे पसंद नहीं या कुछ करते रहने की अदा बन गयी है | मैं सपनो अहम् मानता हूँ | हमारी चाहत, डर, पूरानी यादें, सपनो में उभर कर आते हैं – ऐसा मेरा मनना है | यूँही कल सपने में मैंने अपने आँखों के सामने खोये हुऐ लोगों को देखा | वो लोग जो परिवार के सदस्य थे और उनसे मैं बहुत या थोड़ा बहुत घुला-मिला था | उनकी याद अचानक मेरे सपने आई और आज पूरे दिन मेरे साथ रही | इसीलिए मन कर रहा कि इन्हें लिख कर अमर कर दूँ |

इनमे से सबसे पहले हैं मेरी परदादी (great grandmother from father side) – श्रीमती कमला देवी जालान | हम बच्चे उन्हें दादीमा कह कर बुलाते थे | शायद उनकी उम्र नब्बे या ज्यादा थी | उनकी एक साफ़ तस्वीर मेरे दिमाग में छपी हुई है | कंप्यूटर में भी एक फोटो है|

मैं शायद बारह या तेरह वर्ष का था जब उनका देहांत हुआ | मैं उन्हें बहुत अच्चे से नहीं जानता था  | वो हमारे  साथ ही रहती थी | मगर अपने अलग कमरे में | उन्हें चीजों को बंटोरने का बहुत शौक था | अपनी बहु यानि मेरी दादी की बुराई सुनने का या उनकी बुराई करने का भी बहुत शौक था | उनके  ऊपर के जबड़ों की दो दान्तें बहार निकली हुई थी | अपने मोटे से चश्मे को लगाये, ज़मीन पर बिछाई धुल से भरी गद्दे पर एक सामान की तरह सांस लेती थी | उनकी सबसे अनोखी चीज़ थी उनकी लाठी | अपने लाठी के सहारे वो पुरे अपार्टमेन्ट में चलती-फिरती थी | मैं छोटा था | लाठी को लेकर उन्हें तंग करने में मज़ा आता था | शायद मैं उन्हें इंसान की तरह नहीं बल्कि एक बड़े से खिल्लोने की तरह समझता था क्योंकि घर पर उनके आलावा कोई लाठी नहीं रखता था और न ही कोई मोटा चश्मा पहनता था |  याद नहीं है कि मैंने उन्हें कभी बिन चश्मे के दिखा हो | नाक में नथुनी, कान में बड़े छेद, गले में पतली-सी मनका और जगह-जगह  बड़े-मोटे-छोटे-लटकते भूरे तिल | होंठ कटे हुए , शायद उनकी बहार निकलती दो पिली दान्तें ने उनके होंठ पर बहुत अत्याचार किया होगा | गाल लटके हुए , साफ़ ठुदी, और आखों के नीचे जीवन के संघर्ष के गीत को गाती नरम लहरें दार छोटी-छोटी झुरियां |गले की झुरियां पूरी  तरह लटकी हुई जैसे विद्युत् के खंभे के बीच लटकती तारें |

उनकी आखें, जहाँ तक मुझे याद है, पिली और सफ़ेद थी |  मुख की विशेषता उनका ललाट था – विशाल और सम गोलाई आकार | भौहें और सर के बाल के बीच मानो एक लम्बा सफ़र हो| ललाट पर झुरियां थी | अपनी पतली-सुखी और भूरी-चांदी सी रेशों जैसी बालों पर कभी कभी नारियल तेल लगवा कर लाल फीते की चुटिया भी बनवाती थी |

उनके हाथ मानो पानी से भरी थैली हो जिसे हड्डी से चिपका दिया हो – नरम और दब-दबा सा | एकदम ढीली चमड़ी – इतनी ढीली की झुरियों ने उसे समेट रखा था | मुझे उन झुरियों पर हाथ फेरने पर अच्छा लगता था | इतना नरम और नाजुक और कितना अजीबो-गरीब | हाथों की उंगलियाँ छोटी-छोटी सी और पतली-पतली सी – सीख के काटों जैसी – जिसपर चमड़ी की ढीली मरहम-पट्टी कर दी हो | कांटो जैसे नाखून – पीले – सफ़ेद – उनपर लम्बी काली धारियाँ और बिलकुल कड़क | हथेली मानो स्पोंज के बिस्तर की तरह दब-दबा सा | इतने रेखाएं – कुछ गहरी – कुछ पतली |

और सबसे ख़ास बात थी उनकी नाभि | अक्सर नाभि एक गड्ढे की तरह होता है – मगर मेरी परदादी की नाभि उलटी थी – मानो नाभि पर एक नहुत छोटी सी चमड़ी की छत्री रख दी हो और गड्ढे की जगह चमड़ी की ढाल बन गयी | उनकी आवाज़ में तेजी थी |

इतनी उम्र के बावजूद उनका चिल्लाना भयंकर था | उनके फेफड़े में दम और आवाज़ में जोर था | थोड़ी फटी हुई और थोड़ी पतली आवाज़ थी | हर बोली के साथ उनका पेट और उनकी छाती झटकती थी – मानो हर बोली गले से नहीं  बल्कि शरीर के किसी अजूबी कोने से दम भर के, एक-एक करके निकाल रही हो –

“ऐ बिन्नी .. देख तेरो छोरो के कर रो ऐ”

“आ .. अठिने आ ..तने चीजे दूँ “

” बेटा मेरी लाठी ला दे … अरे करम फूटे दे दे”

करम फुटा उनका पसंदीदा शब्द था – हा हा |

उनके पाव के तरफ कभी नज़र ही नहीं गयी  | उनका कपड़े पहनने का अपना अंदाज़ था | उनका blouse पेट तक झूलता रहता था – नीचे के कुछ बटन टूटे हुए या खुले हुए – कंधे के हड्डी में अटकी, कोहनी तक झूलती रहती थी | blouse  की पीठ ढकी हुई और गला गोलाई आकार में कटा हुआ | सादे peticoat के ऊपर पतली सूती की साड़ी | साड़ी से, सीने की बजाये, पीठ को ढकती थी और फिर सर को | नाभि के नीचे साड़ी की अजीब गुथी थी जो मुझे हमेशा रहस्यमय लगती थी जैसे उसमे उन्होंने कुछ छुपा कर रखा हो | उस गुत्थी और blouse  के बीच कड़ाई जैसा गोल आकार का फुला हुआ पेट और उसपर छत्री वाली नाभि – मुझे छोटी उम्र में वो एक अलग प्राणी लगती थी | घर पर कई बार , अपनी आलस्य से या मज्बोरी से. सिर्फ blouse  और peticoat में रहती थी|

हर शाम को अपने कमरे से निकल कर लाठी पकड़कर बहार livingroom (hall) में प्लास्टिक कीगुलाबी कुर्सी में शान से जम जाती थी |  अपने उम्र और घर के सबसे बड़े होने का फ़ायदा उठाती थी –

“अरे झाडू ठीक से निकाल”

“अरे छोरा खेल बंद कर”

“आने दे तेरे बापू ने आने दे”

कान्कुरगाछी में आने के बाद मैं उन्हें जानने लगा और अन्य सदस्यों का उनके प्रति व्यवहार भी समझने लगा | इससे पहले गणेशगढ़ में  मैं उनसे डरता था क्योंकि वो एक दूर अंधेर कमरे में अकेली रहती थी | कोई उजाला भी नहीं था | अजीब बात है मैं अपनी दादीमा को ही नहीं जानता था जबकि वो हमारे साथ रहती थी | कांकुर गाछी आने के बाद मुझे लगता है उन्हें भी सदस्य होने का गर्व मिला होगा और अपनी अहमियत लगी होगी |

उन्हें खाना देना या खाना खिलाना एक बड़ा ड्रामा होता था | मेरी माँ (दादी) का उनपर चिल्लाना , मम्मी और चाचियों का नज़रंदाज़ करना | मुझे उस समय पता नहीं था कि यह सही है या गलत | छोटी उम्र मैं हम मान लेते हैं कि जो बड़े करते हैं वही सही है और हमे भी वही करना चाहिए | अभी सोचता हूँ तो यह बात भी मानना पड़ेगा कि मेरी दादीमा भी तंग करने में कुछ कम नहीं थी | उन्हें खिलाना, नहलाना, पेशाब ले जाना, गंदे कपड़े की धुलाई और न जाने क्या क्या जो मेरी माँ (दादी) ने बिना किसी को बताये किया होगा |

उनके देहांत के समय की कुछ यादें ताजा करना चाहूँगा | नवरात्री का समय था – महीना या तारीख याद नहीं | घर पर पूजा रखी थी | एक मोटे से पंडितजी  आते थे जो बहुत पुराने जान-पहचान के थे – लाल टिका लगाये, रुद्राक्ष पहने , मोटे, काले बाल और चोटी | सप्तमी को भोर चार बजे, ब्रह्म मुहरत में उनका देहांत हुआ | मुझे उस समय यह सप्तमी, देहांत, ब्रह्म मुहरत क्या होता है पता नहीं था | मगर यह वाक्य , जो बडो के मुह से मैंने कई बार सुना था – मेरे दिमाग में बैठ गयी |  देहांत की रात, डॉक्टर र.डी. अगरवाल समेत घर के सभी लोग उस कमरे में बैठे थे | शायद पहली बार (और आखरी बार) उस कमरे में इतनी भीड़ इकठा हुई होगी | परमेश्वरी भुआजी भी थी शायद |

सबसे पहले शानू चाची को पता चला क्यूंकि वो दादीमा के कमरे की बाथरूम का इस्तमाल करती थी | शायद सुबह के छह बजे होंगे या उसके आस-पास | पता नहीं शानू चाची को कैसे लगा होगा – एक मृत शरीर को देख कर | फिर क्या –  हिन्दू धर्म का बड़ा विस्तृत उत्सव |

मैंने अपनी ज़िन्दगी में पहली मौत देखी थी | पता नहीं था कि ये सब क्या हो रहा था | इतनी सजावट, फूल,-फल, पापा लोगों का धोती पहनना | दादीमा के शरीर को नहलाना, फिर कपड़े पहनाना, माला पहनाना.. यह सब इतनी जल्दी हो रहा था मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था | मैं, घर के पुरुषों के साथ , टेंपो में बैठ कर घाट पर चला गया मगर उनकी चिता नहीं देखी |

अब बाईस साल की  उम्र में दस साल पुरानी बात को याद करने की कोशिश कर रहा हूँ –

क्या उनके जाने का दुःख था मूझे ?

क्या मुझे लगा कि मैंने  किसी को खो दिया है ?

क्या किसी  को उनकी कमी या मूझे उनकी कमी महसूस हुई ?

इन सब सवालों का जवाब पता नहीं है | तो शायद इन सवालों का जवाब नहीं होगा | उनके जीवन के बारे में तो ज्यादा नहीं जानता मगर इतना ज़रूर कहूँगा कि उनमे स्वाभिमान था | अपने बेटे से बहुत प्यार था – इतना प्यार शायद उसके लिए वो अपने स्वाभिमान को भी न्योछावर कर दे | हकीकत से वाकिफ थी – इतने साल अकेले गुजारना हिम्मतवालों का ही काम होता है |

घर के बड़े कहते हैं कि उनमे दिव्य शक्ति थी – हनुमानजी की | वो मेहंदीपुर जाकर एक महीने तक पाठ-पूजा करती थी | घर के बडो का मानना है इससे उन्हें सिद्धि मिली | पता नहीं उनमे सिद्धि थी या नहीं मगर मैने उन्हें कभी मौत का इंतज़ार करते नहीं देखा | ऐसे नहीं था की वो जीना नहीं चाहती थी या जीने से उब गयी हो |

वो एक बहादुर औरत थी और ऐसे ही मैं आपको याद रखना चाहता हूँ – दादीमा |

आपको हार्दिक श्रद्धांजलि  |

दादीमा, 1998 में

कमला देवी जालान (दादीमा), 1998 में





Puzzle Unsolved

16 03 2009

After breathing for 22 years 8 months 2 weeks 5 days 9 hours 17 minutes and counting, I realized, after reading some other blogs, that life is too short. Life is too short to fight, to hold grudge, to keep arrogance, self-appraisal and to be lazy. At the same time it seems that life is way to long to hold happiness and enjoy it.

I am saying based on my observation – what I see in my life and what I could peek into other (not that I like – I being dishonest here). Again see the use of the word “I” – everything has to start and end with this capitalized phallic symbolized letter. I must say that I have not gone through much of the difficult times as that of my contemporaries. I will not compare with the last generation because they belong to other times and had different set of resources and limitations. I never believed that I went through too much of troubles to achieve what I goaled for. Yes at times it was like I am walking on the fire lines because I was so obsessive about that specific goal. The harshness and the spirit to achieve it- were simultaneous. The fight was fierce but I was fragile for I was still dependent.

Dependency without self-respect, like bondage, welcomes any piece of gratitude or concern thrown at you. I would have been more than happy to concede the fact that I was supported but the project failed or could not be resumed for it fatal nature. However everything sorted later and the goal was achieved and the project indeed got nailed. What did I learnt out of all these mess – the emotional drama, financial catastrophes, political upheaval, and social turnover. Here I would like to philosophized that-

Only under the extreme conditions the creativity could be born.

Without the sun’s killing heat there is no enjoyment of the air-conditioning.

The flower fragrance wouldn’t smell intoxicating if there were no thorns.

Unless you don’t jump you don’t know what gravity is.

Unless you don’t go up to the top floor you don’t know what its like to be a tall building.

Without grief there is no fun in happiness.

Without obstacles there is no fun in achieving

Without opposition there is no fun in winning

………………………………….BUT I AM LAZY……………………………………….

Do I care what anyone says or writes or have their own experiences?

Well then I would say to these people that you are the luckiest mammal (human lay eggs in other’s basket) on the planet. Why? Because these are the rotten lot of losers. Not because they failed after one or numerous trials rather I hate their comfort of no competition life. Looking at these “luckies” I feel so damn jealous of their comfort life. Either they are filthy rich or they don’t have “zing” to compete just like a leech that feeds on sucking someone’s. Why aren’t they thrown into the fires of REAL life? Why should US be the only one roasting! Life is too long to be happy and too short to hold grudge.