स्टीव जॅाब्स ने कही थी तीन कहानियां – आखिरी कहानी

1 01 2012

स्टीव जॅाब्स की तीसरी कहानी जो उन्होंने 2005 में स्तान्फोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) के क्रमागति समारोह (Graduation Ceremony) में पंद्रह मिनट के भाषण में कहा था | उसी प्रेरणादायक भाषण को हिंदी में अनुवादित करते हुए, एक free thinker को श्रद्धांजलि |

पहली कहानी पिच्छले पोस्ट में प्रस्तुत है |

दूसरी कहानी, 2011 को सलामी देते हुए आखिरी दिन को प्रकाशित हुआ जो यहाँ प्रस्तुत है |

 

नए साल, 2012, की शुरुआत स्टीव जॅाब्स की आखिरी कहानी से होगी |

 

9:05   मेरी तीसरी कहानी मौत (death) के बारे में है |

9:09   जब मैं सत्रह साल का था मैंने एक कहावत सुनी थी,

9:12   “अगर तुम हर दिन ऐसे जियो मानो वो आखिरी हो तो

9:15    एक दिन तुम पक्के सही होगे |

9:20    इससे मैं प्रभावी हुआ, और तब से, पिच्छले 33 वर्षों से,

9:25    मैं हर सुबह आईने में देखे कर

9:27    खुद से पूंछता हूँ, “अगर आज मेरी ज़िन्दगी का आखिरी दिन होता,

9:30    क्या मैं यह करता जो मैं आज करने जानेवाला हूँ?” |

9:34    जब कई दिनों के जवाब “नहीं” होते,

9:37    मुझे पता चलता मुझे कुछ बदलना होगा |

9:40    इस बात को याद रखना कि जल्द ही मैं एक दिन मर जाऊँगा

9:43    यह सबसे अहम हथियार मुझे मिला,  जिसने मेरे बड़े फैसले लेने में मदद की |

9:47    क्यूंकि करीब-करीब सारी चीज़ें, सारी बाहरी उम्मीदें, सारे अभिमान,

9:52    पराजय या शर्मिंदगी का डर –

9:54    ये सारी चीज़ें, मौत के सामने बस गिर जाती है,

9:58    रह जाती है जो असल में अहम है |

10:00  इस बात को याद रखना कि तुम एक दिन मर जाओगे –

10:03  मेरी जानकारी में सबसे बेहतरीन जरिया है जिससे कि – तुम्हारे पास कुछ खोने को है – इस जाल से बच सकोगे |

10:08      तुम पहले से ही नंगे हो | अपने दिल की बात न सुनने का कोई कारण नहीं है |

10:13      करीब एक साल पहले, मुझे कैंसर है यह पता चला |

10:16      सुबह के 7:30 बजे मेरा scan हुआ और

10:20      मेरे pancreas के tumor साफ़ दिखाई पड़ रहे थे |

10:23      मुझे पता भी नहीं था कि pancreas क्या होते है |

10:26      डॉक्टरों ने कहा कि जहां तक यह ऐसा कैंसर है

10:28      जिसका कोई इलाज नहीं है |

10:30      और मैं 3-6 महीनो से ज्यादा जीने की आशा न करूँ |

10:35      मेरे डॉक्टर ने सलाह दी कि मैं घर जाऊं और अपने काम को सम्भालूँ |

10:40      डॉक्टर के शब्दों का मतलब था कि मरने की तैयारी शुरू कर दो |

10:42      इसका मतलब अपने बच्चों को, कुछ ही महीनो में, वो बातें बताना

10:47      जिसके लिए तुम सोचते थे कि तुम्हारे पास आनेवाले 10 साल है |

10:51      इसका मतलब कि पक्के से पूरा काम करना

10:53      तांकि तुम्हारे परिवार के लिए यह मुश्किल न हो |

10:56      इसका मतलब कि अलविदा कहने का वक़्त हो गया |

11:01      मैं सारे दिन उस diagnosis के साथ जिया |

11:04      बाद में, शाम को, मेरी biopsy हुई

11:06      जिसमे एक endoscope को मेरे गले से नीचे उतारते हुए,

11:08      पेट से होकर, मेरे आँतों में, मेरे pancreas में

11:11      सुईं चुभाई और tumor के कुछ cells निकाले |

11:14      मैं बेहोश था, मगर मेरी बीवी वहाँ पर थी

11:18      और उसने मुझे कहा कि जब डॉक्टरों ने cells को microscope में देखा

11:21      तो वे रोने लगे क्यूंकि

11:24      वह एक असामान्य pancreatic cancer निकला जिसका इलाज surgery से हो सकता है |

11:29      मेरी surgery हुई और शुक्र है मैं अभी ठीक हूँ |

11:40      मैं मृत्यु के करीब इससे ज्यादा कभी नहीं गया |

11:43      और मैं आशा करता हूँ कि आनेवाले कुछ दशकों में मैं मौत के इतने ही करीब रहूँ |

11:46      क्यूंकि मैं इससे गुजर चूका हूँ,

11:48      मैं अब यकीन के साथ कह सकता हूँ –

11:51      मौत ज्यादा उपयोगी और कम बौद्धिक (intellectual) विचार है  –

11:55      कोई मरना नहीं चाहता |

11:58      जो स्वर्ग में जाने की बात करते हैं वे भी मरना नहीं चाहते |

12:02      इसके बावजूद मौत ऐसी मंजिल है जो हम सब के हिस्से में है |

12:06      कोई भी इससे भाग नहीं सका | और यह जैसा है वैसा ही होना चाहिए |

12:10      क्यूंकि मौत, जहां तक, जीवन की सबसे बड़ी एकमात्र आविष्कार है |

12:15      यह जीवन का change agent है |

12:16      यह पुराने को साफ़ कर, नए के लिए रास्ता बनाता है |

12:19      अभी आज जो नया है वो तुम हो, लेकिन एक दिन – आज से बहुत दूर नहीं –

12:24      तुम भी, धीरे-धीरे पुराने हो जाओगे और तुम्हे रास्ते से साफ़ कर दिया जायेगा |

12:28      इतना dramatic होने के लिए माफ़ी चाहता हूँ, लेकिन यह सच है | 

12:32      तुम्हारा समय सिमित है, तो दुसरे के जीवन को जी कर अपने जीवन को waste मत करो |

12:38      दुसरे के विचारों से निकली नीति और सिद्धांतों के जाल में मत फंसो |

12:40      दुसरो के opinions के शोर से, अपने अन्दर की आवाज़ को खोने मत दो |

12:46      और सबसे ज़रूरी बात

12:48      अपने दिल (heart) और अंतर्ज्ञान (intuition) को follow करने की हिम्मत रखो |

12:51      उन्हें, किसी तरह से पता है, असल में तुम क्या बनना चाहते हो |

12:55      बाकी सब तुच्छ है |

13:09      मैं जब छोटा था

13:11      तब The Whole Earth नाम की एक amazing magazine नकलती थी |

13:15      वो हमारे generation के मानो bible की तरह था |

13:18      इसकी रचना Stewart Brand नाम के आदमी ने Menlo Park में शुरू की थी |

13:21      और उसने इस magazine में अपनी कवितओं से जान भर दी थी |

13:25      यह 1960s के दशक की बात है,

13:27      computers और desktop publishing से पहले |

13:30      तो सब typewriters, scissors, और polaroid camera से बनाया जाता था |

13:34      मानो पन्नो पर google की तरह हो |

13:36      गूगल के आने के 35 साल पहले: यह सब आदर्शवादी था,

13:41      अच्छे tools और महान सोच से उमड़ रहा था |

13:45      Stewart और उसके team ने The Whole Earth के कई

13:47      प्रकाशन निकाले |

13:48      और फिर, जब दौर पूरा हो गया, उन्होंने आखिरी प्रकाशन निकाला |

13:53      यह 1970s की बात है और मैं तुम्हारे उम्र का था |

13:58      आखिरी प्रकाशन के back cover पर एक photograph थी –

14:00      लम्बे रास्ते पर उगता सूरज | highway पर जैसे होता है, उसकी तरह;

14:04      तुम्हे पता होगा अगर तुम adventurous हो |

14:08      उस फोटो के नीचे लिखा था: “Stay Hungry. Stay Foolish – भूखे रहो. भोले रहो |”

14:13      यह उनका आखिरी सन्देश था – भूखे रहो, भोले रहो – Stay Hungry. Stay Foolish |

14:18      और मैंने हमेशा अपने लिए यही चाहा |

14:23      और आज, graduate होनेपर तुम नए से शुरुआत करने वाले हो, मैं तुम्हारे लिए यही कामना करता हूँ |

14:28      भूखे रहो, भोले रहो – Stay Hungry. Stay Foolish |

14:31      आप सभी का बहुत धन्यवाद |

 

स्टीव जॅाब्स की तरह उनके प्रेरणादायक भाषण की समाप्ति 2012 की शुरुआत से हुआ |

 

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कच्चे

5 11 2011

कच्ची धूप का सिरहाना लिए
उस मोड़ की पतली डगर
पिपली पेड़ का कोना लिए
दूर कहीं गोता लगाये

आओं चले हम
कहीं ऐसी नगर को
जहाँ अपनी ही दुनिया हो
अपनों में ही दुनिया हो

मीठी-मीठी सी खुशबू
घुली मिटटी का ओछा लिए
चुटकी भर सीत हवा, गुदगुदाए

वादियों से सिला रुस्तम कोहरा
धीमी-धीमी, धुंधली-धुंधली
ठहरा हुआ, सिमटा-सिमटा ये समा

रुके क्यों, क्यों थमे
थामे हाथों में हाथ, उगे

एक-एक कदम बुने उस कच्ची सड़क पर
सुरली डंडी पर तोड़ते दम
आए, हम आए लिप-लिपि सी बादलों को चीरकर

चांदी के चाँद को पीए
चांदनी के लेप से नहाए
कस-कसकर चूमे नरम रेशमी हवाएं
भर-भरकर सिसकती सिसकियाँ

सुनहरी धूप का कुल्हा किए
ज़िन्दगी जिंदादिली की गुन-गुन
महक कच्चे आम का
किर-किरहाये रूठे भुरे पत्ते

चले हम, फिर से, नज़र में धूल जिगर में गुब्बार लिए





_ife

2 02 2011

_ife

 

Broken, shattered, pointed pieces

tinkering shards – a life

 

Unthawed bleeding juicy token of flesh

sowing shreds – a life

 

Thrown down, crawling up, grappling ropes

tumultuous, carving leads – a life

 

Snatched, grabbing, recklessly loose

gluttonous lusty, threading bonds – a life

 

Sloth, dragged, limped, faltering

yet thickly textured, darkly vibrant, defiantly expressive

surviving, debauching, uncaringly vitiating

anomalous blotch, gloriously flagging existence – that very _ife





मैं आज़ाद हूँ

11 03 2009

आज अचानक  आभास हो आया है कि  सब निरर्थक है | मैं कहाँ हूँ  – किधर को  जा रहा हूँ – पता नहीं | लगता है कि जहां से भी शुरू करूं सब वहीं आकर ख़त्म हो जाता है | सब शून्य में मिल जाता है | अँधेरे में सर दीवार से लग गया हो | अन्धेरें में सालों सड़ रहे हो | हाथों की ऊंगलियों से दीवार को महसूस कर रहा हूँ | दम घुट सा रहा है इस अँधेरे में | चीख रहा हूँ पर आवाज़ नहीं निकल रही | बहुत कोशिश कर रहा हूँ मगर सिर्फ हवा निकल रही है | एक पत्ते की तरह  टूट कर गिरने के लिए तिलमिला रहा हूँ | इस घुटन ने मेरा गला पकड़ रखा है | पाव में जैसे ज़ंजीर है | दीवार चढ़ कर पार कर नहीं सकता | अँधेरे मैं कुछ दिखाइए नहीं देता | दीवार पर चडू भी  तो कैसे – न कोई रस्सी है और न कोई साधन | अपनी झुंझलाहट नाखूनो  को दीवार से रगड़ कर निकाल रहा हूँ | पत्थर है सब, टूटे-फूटे, कंटीले | दीवार की छाती पर मुक्के मार रहा हूँ | यह दीवार सरकती क्यों नहीं | मैं यहाँ क्यों फंसा हूँ | कोई मेरी आवाज़ सुनता क्यों नहीं | सब कहाँ मर गए है ? पूरा बदन जल रहा है | मानो इस पत्थर की दीवार से आग निकल रही है | जैसे चीताह अपने  मुंह में हिरनी के बच्चे की गर्दन को दबोच लेता है उसी तरह यह आग और अँधेरा मेरी हर सांस को दबोचे जा रही है |

मैं क्यों जी रहा हूँ | क्या मूल्य है मेरा आबादी से भरे इस दुनिया में | कीडे की तरह कई जनमते है और कीडे की तरह मर जाते है | जीना क्या है – एक उम्र की अड़ियल उबासी या एक गुबारे के फूलने और फोटने की बीच की मौज |

इस छोटे से अंधेर कमरे में, छह ओरो से घीरे , ये पत्थर की दीवारें मुझपर हंसती है | इनकी हंसी मेरी हर कोशिश पर जोर हो जाती है | मैं इनको नोंचता हूँ, चीरता हूँ , धकेलता हूँ | हर कोशिश की उलाहना करती है हर एक ईंट | मुझे कोसते  है –

तुम भी यहीं साडोगे | इन्ही आग की तपीश में गल जाओगे | नोचो हमे जितना नोचोगे   हमे उतना मज़ा आएगा | तुम्हे यहीं सड़ना  है | यहीं साडोगे – मिट्टी में कईयों की तरह मिल जाओगे | कौन जी सका है यहाँ ? किसे मिलती है मुक्ति ? रेंग रेंग कर मरोगे | तुम आदमजात हो ही इसी लायक ! तुम में और जानवर में कोई फर्क नहीं है | पैदा कर दिए जाते हो – पल भी जाते हो – फिर कैद हो जाते हो !

मैं दोनों हाथो से अपने कानो को बंद कर रखा हूँ | पर इनकी हंसी पहुँच हो जाती | मेरी आखें बड़ी-बड़ी हो गए है | इन दीवारों पर चीख -चीख कर गालियाँ दे रहा हूँ – चुप हो जाओ , सालो | हंसी गूंज रही है – चारों और से | में कानो को जोर से बंद किये हूँ | कानो को दबाते हुए सर हिला रहा हूँ और दम भर के चीख रहा हूँ – नहीं , नहीं | उकड़ू होकर बैठ गया हूँ | सर को अन्दर किये हुए हूँ | नहीं नहीं करते मेरी छाती झटकी | गला सुख रहा है | उबाकी आई और सांस अन्दर अटक गयी  |  घबराहट से फिर छाती झटकी और सुबकना फूंट के निकला | जैसे कमज़ोर बांद की बूडी ईंट नदी के  पानी को डट कर रोकने की कोशिश करती है पर पानी का तेज़ उस बूडी ईंट को एक फूँक में गिरा देती है और एक-एक करके पूरा बांद दह जाता है |

उकड़ू बैठे, सर को घुटनों और छाती के बीच लगाए, मेरा सुबकना तेज़ हो रहा था | मैं अपने आप को और समेटे जा रहा था जैसे ठण्ड में कुत्ता  गरमाहट पैदा करने के लिए खुद को समेट लेता है |

…. और आज़ादी मुझमे ही सिमटने लगी |