Life as it is

9 12 2011

Life as it is

Just keep going, keep flowing

Hitting pebbles here and there

Touching the bank up and below

 

Flying down, deep like a gorge

Hitting hard

Rising again with pride. Shamelessly.

 

Tearing away with all gusto

Bending its might, turning away

Coming again with all force – knowingly – failing

Beating again and again

 

Genteel, calm, swift, shimmering with sparkles

Open wide to lay bare

Giving away with quiet tears

Taking all that come, return only

Slowly touching the base, leaving as it comes

Liberated.

 

In fumes, evaporated in namelessness

Ethereally blending into one – into all – into none.

Rubbed off forever. Look again, look behind!





कच्चे

5 11 2011

कच्ची धूप का सिरहाना लिए
उस मोड़ की पतली डगर
पिपली पेड़ का कोना लिए
दूर कहीं गोता लगाये

आओं चले हम
कहीं ऐसी नगर को
जहाँ अपनी ही दुनिया हो
अपनों में ही दुनिया हो

मीठी-मीठी सी खुशबू
घुली मिटटी का ओछा लिए
चुटकी भर सीत हवा, गुदगुदाए

वादियों से सिला रुस्तम कोहरा
धीमी-धीमी, धुंधली-धुंधली
ठहरा हुआ, सिमटा-सिमटा ये समा

रुके क्यों, क्यों थमे
थामे हाथों में हाथ, उगे

एक-एक कदम बुने उस कच्ची सड़क पर
सुरली डंडी पर तोड़ते दम
आए, हम आए लिप-लिपि सी बादलों को चीरकर

चांदी के चाँद को पीए
चांदनी के लेप से नहाए
कस-कसकर चूमे नरम रेशमी हवाएं
भर-भरकर सिसकती सिसकियाँ

सुनहरी धूप का कुल्हा किए
ज़िन्दगी जिंदादिली की गुन-गुन
महक कच्चे आम का
किर-किरहाये रूठे भुरे पत्ते

चले हम, फिर से, नज़र में धूल जिगर में गुब्बार लिए





माक्यावैली के प्रसिद्ध कथन, ” द प्रिन्स ” से

24 05 2009
 माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532  में प्रकाशित

माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532 में प्रकाशित

निकोलो माक्यावैली द्वारा, इतालवी भाषा में, लिखित ” द प्रिन्स ” की चर्चा जारी रखते है | पिछले पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के, विभिन्न विषयों पर, विचारों का सारांश प्रस्तुत है |

पिछले पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे:       द प्रिन्स (1532 में प्रकाशित)

इस पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के प्रसिद्ध कथनों (famous quotations) की चर्चा होगी| मैंने पांच मनोहर अवतरणों को चुना है और उनकी व्याख्या की है –

1. At this point one may note that men must be either pampered or annihilated. They avenge light  offenses; they cannot avenge severe ones; hence, the harm one does to a man must be such as to obviate any fear of revenge.

अनुवादित –

अब ये ध्यान देने की बात है कि मनुष्य को या तो लाड-प्यार किया जाए या फिर मिटा दिया जाये | मनुष्य छोटी बातों पर बदले की भावना रखता है: मनुष्य में बड़े, गंभीर चोंट का बदला लेने की क्षमता नहीं होती; अतः, ऐसी हानि पहुंचानी चाहिए ताकि उसके बदले का डर नहीं रहे |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय ३ से है | इस अवतरण में माक्यावैली ने तर्क (logic) को नैतिकता (ethics) के ऊपर रखा है| राजा को  समझाना चाहिए कि उसके पास सिर्फ दो विकल्प है – उपकार या विनाश | क्योंकि विनाश से प्रजा क्रोधित हो सकती है, इसलिए विनाश तभी उपयोग करना चाहिए जब विनाश निश्चित रूप से राजा के द्वेषी मंत्री और दुश्मनों का खात्मा कर सके | दया, तरस, रहम, और करुणा निरर्थक है | आत्मकेंद्रतिता और स्वयं-सुरक्षा ही प्रमुख कारक और इन दोनों तत्वों का आचरण निष्ठूरता से करना चाहिए |

2. [P]eople are by nature changeable. It is easy to persuade them about some particular matter, but it is hard to hold them to that persuasion. Hence it is necessary to provide that when they no longer believe, they can be forced to believe.

अनुवादित –

मनुष्य स्वाभाविक रूप से परिवर्तनशील होता है | मनुष्य को किसी ख़ास बात में फुसलाना आसान है, मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखना कठिन है | अतः, यदि मनुष्य विश्वास खो दे तो ज़बरदस्ती करके विश्वास लादा जा सकता है |

व्याख्या –

यह प्रसंग अध्याय ६ से लिया गया है | माक्यावैली ने मनुष्य की प्रकृति पर अपनी धारणा बतलाई है | हलाकि इन धारणाओं को प्रमाणित करने के लिए माक्यावैली ने कोई उदाहरण या तर्क नहीं दिए | माक्यावैली का मानना था कि मनुष्य आम तौर पर समय या परिस्थिति अनुसार बदलते रहते हैं | मनुष्य को किसी बात पर उकसाना या फुसलाना (convince, persuade) सरल है | मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखने के लिए योजना या दुसरे प्रबंध रखने पड़ सकते है क्योंकि मनुष्य चालाक होता है इसलिए देर तक फुसलाये रखना कठिन हो सकता है | माक्यावैली कहते है यदि मनुष्य बातों की जादूगरी से  विश्वास नहीं करे तो अंत में बल को उपयोग करना चाहिए | बल के दबाव में मनुष्य किसी भी बात को मान लेता है |

3. A prince must have no other objective, no other thought, nor take up any profession but that of war, its methods and its discipline, for that is the only art expected of a ruler. And it is of such great value that it not only keeps hereditary princes in power, but often raises men of lowly condition to that rank.

अनुवादित –

राजा का दूसरा उद्देश्य नहीं होना चाहिए, दुसरे विचार नहीं आने चाहिए, और न ही दूसरा पेशा बल्कि केवल युद्घ, युद्घ के तरीके और युद्घ के अनुशासन, क्योंकि एक शासित राजा से युद्घ की ही उम्मीद रखी जाती है | युद्घ बहुत मूल्यवान है क्योंकि एक ही वंश के राजा, पीड़ी दर पीड़ी, राजगद्दी में शासित हो सकते है और युद्घ से नीच कुल के पुरुष को राजा बनने का अवसर मिल सकता है |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय १४ से उद्धृत है | माक्यावैली युद्घ-कला को शास्त्रीय ज्ञान और वास्तविक अनुभव मानते है | शास्त्रीय ज्ञान क्योंकि युद्घ को, पौराणिक कहानियों और मंत्रों की तरह, इतिहास में हुए युद्धों को उदाहरण के रूप में पढ़ा जा सकता है | वास्तविक अनुभाव क्योंकि बिना अनुभव किये युद्घ के अनुशासन को पढ़ना निरर्थक है | माक्यावैली ने सरकारी कार्य को सामरिक (military) नज़रों से देखा है| क्योंकि हर सरकार का एक ही लक्ष्य होता है – स्वयं-सुरक्षा (self-preservation) और सैनिक प्रतिरक्षा (military defense) | इसके लिए सरकार को कुटिल नीति (diplomacy), कुशल रणनीति (tactical strategy), भौगोलिक कौशल (geographic mastery), और एतिहासिक विश्लेषण (historical analysis) का सहारा लेना चाहिए | माक्यावैली मानते है कि राजा सर्व विद्वान नहीं हो सकता, परन्तु राजा का अंतिम उत्तरदायित्व अपने राज्य की स्थिरता और एकता बनाए रखना है, राज्य की खुशहाली ज़रूरी नहीं |

4. Only the expenditure of one’s own resources is harmful; and, indeed, nothing feeds upon itself as liberality does. The more it is indulged, the fewer are the means to indulge it further. As a consequence, a prince becomes poor and contemptible or, to escape poverty, becomes rapacious and hateful. Of all the things he must guard against, hatred and contempt come first, and liberality leads to both. Therefore it is better to have a name for miserliness, which breeds disgrace without hatred, than, in pursuing a name for liberality, to resort to rapacity, which breeds both disgrace and hatred.

अनुवादित –

अपने पूंजी-साधन का खपत सबसे खतरनाक होता है | उदारता स्वयं को खा जाती है | जितना खपत होगा, पूंजी-साधन उतना कम होगा | फलतः, राजा गरीब और अपमानजनक बन जाता है या गरीबी से बचने के लिए अति लोभी और कुत्सित बन जाता है | राजा को जितनी भी चीज़ों से बचना चाहिए, उनमे सबसे पहले है – प्रजा की नफरत और तिरस्कार | उदारता नफरत और तिरस्कार दोनों को जनमती है | बेहतर होगा अगर राजा कंजूसी के लिए प्रसिद्ध हो | क्योंकि कंजूसी से सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) होता है प्रजा को राजा से नफरत नहीं होती | पहले उदार होना, फिर गरीबी में चले जाना, तिरस्कार और नफरत दोनों को पैदा करती है |

व्याख्या –

यह अवतरण सोलहवी अध्याय से उद्धृत है | इन पंक्तियों में राजनीतिज्ञ और धर्माचरण के प्रति माक्यावैली के भाव प्रदर्शित होते है | माक्यावैली राजा को सलाह देते है कि जब राज्य के लिए काम करो तो मूल्यों और सिद्धांतों का तिरस्कार कर दो | सिर्फ धर्म के नाम पर या धर्म के लिए धर्म का पालन करना राज्य के लिए हानिकारक है | राज्य चलाने की कला और राजा के निजी मूल्यों और सिद्धांतों के बीच कभी टकराव नहीं होना चाहिए | राजा को अपने निजी मूल्यों और सिद्धांतों से ऊपर उठकर सोचना चाहिए | उदारता प्रशंसनीय है – प्रजा उदारता को सरहाती है, मगर अंतिम में यही उदारता राज्य को खा जाती है | इसलिए उदारता से दूर रहना चाहिए | सिद्धान्तहीन होने पर राजा से प्रजा नफरत नहीं करती | प्रजा राजा से नफरत तब करती है जब राजा अपने कर्त्तव्य को नहीं निभाता है या राज्य की सुरक्षा नहीं कर पाता | धर्माचरण में स्वयं-त्यागी बनना पड़ता है जो राज्य के स्वयं-सुरक्षा के उद्देश्य के प्रतिकूल है |

माक्यावैली कहते है कि उदार राजा कहलाने से बेहतर कंजूस राजा होना है | क्योंकि जब पूंजी-साधन ख़त्म हो जायेगा तब उदारता की आदती प्रजा अपने राजा से नफरत और तिरस्कार (मज़ाक) करने लगेगी | मगर कंजूस राजा होने पर प्रजा सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) करेगी, नफरत नहीं |

5. Here a question arises: whether it is better to be loved than feared, or the reverse. The answer is, of course, that it would be best to be both loved and feared. But since the two rarely come together, anyone compelled to choose will find greater security in being feared than in being loved. . . . Love endures by a bond which men, being scoundrels, may break whenever it serves their advantage to do so; but fear is supported by the dread of pain, which is ever present.

अनुवादित –

यहाँ एक सवाल उठता है – क्या प्यार किये जाना, डर होने से बेहतर है या इसका उल्टा | उत्तर है, सबसे श्रेष्ठ होगा यदि आपको लोग प्यार भी करें और आपसे डरे भी | हलाकि यह दोनों का एक साथ होना दुर्लभ है, अगर किसी को दोनों में से एक चुनना हो तो लोगों के मन में उसका डर होना उसे ज़्यादा सुरक्षित, महफूज़ रखेगा | प्यार एक जोड़ की तरह रहता है जिसे मनुष्य अपना काम सिद्ध होने पर तोड़ सकता है| मगर डर का संयोग भीषण दर्द से होता है, दर्द का एहसास हमेशा कायम रहता है |

व्याख्या –

ये पंक्तियाँ अध्याय १७ से ली गयी है | शायद सुनने में लगता है कि माक्यावैली ने “द प्रिन्स” अत्याचारियों के लिए लिखा है | मगर गौर से पढ़ा जाये तो माक्यावैली ने मनुष्य की प्रवृत्ति (human nature) का आश्चर्यजनक विश्लेषण (analysis) दिया है | माक्यावैली कहते है कि यह मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि परिस्थिति अनुसार अपना स्वर बदले | परिस्थिति अनुसार मनुष्य नमक हराम बन सकता है | मगर राज्य को सफलतापूर्वक चलाने के लिए जनता और मंत्रियों की वफादारी की ज़रुरत होती है | इन दोनों बातों से यह बात निकलती है कि राजा को अगर उपकार और कठोरता में से एक चुनना हो तो कठोरता ज्यादा भरोसेमंद है, ज़्यादा फलदायक है | माक्यावैली शौक के लिए क्रूरता या कठोरता की वकालत नहीं करते | क्रूरता और कठोरता केवल राज्य के हित के लिए होना चाहिए | क्रूरता और कठोरता राज्य को चलाने की कला के प्रमुख भाग है |

यदि चुनना हो कि लोग आपसे प्यार करे या आपसे डरे तो सबसे अच्छा होगा कि लोग आपसे डरे भी और प्यार भी करे| मगर दोनों का साथ होना मुश्किल है| इसीलिए विकल्प दिए जाने पर डर को चुनना चाहिए | क्योंकि प्यार कभी भी द्वेष बन सकता है या प्यार के बंधन को मतलब पूरा होने पर तोडा भी जा सकता है | मगर डर लोगों के मन में बना रहता है| डर का सम्बन्ध पीडा से होता है| पीडा शारीरिक हो या मानसिक, डर के साथ बंधा होता है| जब डर लगता है तो पीडा दिमाग में ताज़ा हो जाती है | पीडा से बचने या भागने की मनुष्य की प्रवृत्ति होती है| पीडा से बचने के लिए मनुष्य अपने राजा की आज्ञा मान लेता है| इसलिए प्रजा और मंत्रियों को डराए रखने में ही राजा की राजगद्दी की सलामती है अर्थात् राजा स्वयं-सुरक्षित है |





श्रद्धांजलि

4 04 2009

श्रद्धांजलि

आज बहुत दिन बाद कुछ वक्त मिला है तो लिखने की ज़रुरत महसूस हो गयी | शायद खालीपन मुझे पसंद नहीं या कुछ करते रहने की अदा बन गयी है | मैं सपनो अहम् मानता हूँ | हमारी चाहत, डर, पूरानी यादें, सपनो में उभर कर आते हैं – ऐसा मेरा मनना है | यूँही कल सपने में मैंने अपने आँखों के सामने खोये हुऐ लोगों को देखा | वो लोग जो परिवार के सदस्य थे और उनसे मैं बहुत या थोड़ा बहुत घुला-मिला था | उनकी याद अचानक मेरे सपने आई और आज पूरे दिन मेरे साथ रही | इसीलिए मन कर रहा कि इन्हें लिख कर अमर कर दूँ |

इनमे से सबसे पहले हैं मेरी परदादी (great grandmother from father side) – श्रीमती कमला देवी जालान | हम बच्चे उन्हें दादीमा कह कर बुलाते थे | शायद उनकी उम्र नब्बे या ज्यादा थी | उनकी एक साफ़ तस्वीर मेरे दिमाग में छपी हुई है | कंप्यूटर में भी एक फोटो है|

मैं शायद बारह या तेरह वर्ष का था जब उनका देहांत हुआ | मैं उन्हें बहुत अच्चे से नहीं जानता था  | वो हमारे  साथ ही रहती थी | मगर अपने अलग कमरे में | उन्हें चीजों को बंटोरने का बहुत शौक था | अपनी बहु यानि मेरी दादी की बुराई सुनने का या उनकी बुराई करने का भी बहुत शौक था | उनके  ऊपर के जबड़ों की दो दान्तें बहार निकली हुई थी | अपने मोटे से चश्मे को लगाये, ज़मीन पर बिछाई धुल से भरी गद्दे पर एक सामान की तरह सांस लेती थी | उनकी सबसे अनोखी चीज़ थी उनकी लाठी | अपने लाठी के सहारे वो पुरे अपार्टमेन्ट में चलती-फिरती थी | मैं छोटा था | लाठी को लेकर उन्हें तंग करने में मज़ा आता था | शायद मैं उन्हें इंसान की तरह नहीं बल्कि एक बड़े से खिल्लोने की तरह समझता था क्योंकि घर पर उनके आलावा कोई लाठी नहीं रखता था और न ही कोई मोटा चश्मा पहनता था |  याद नहीं है कि मैंने उन्हें कभी बिन चश्मे के दिखा हो | नाक में नथुनी, कान में बड़े छेद, गले में पतली-सी मनका और जगह-जगह  बड़े-मोटे-छोटे-लटकते भूरे तिल | होंठ कटे हुए , शायद उनकी बहार निकलती दो पिली दान्तें ने उनके होंठ पर बहुत अत्याचार किया होगा | गाल लटके हुए , साफ़ ठुदी, और आखों के नीचे जीवन के संघर्ष के गीत को गाती नरम लहरें दार छोटी-छोटी झुरियां |गले की झुरियां पूरी  तरह लटकी हुई जैसे विद्युत् के खंभे के बीच लटकती तारें |

उनकी आखें, जहाँ तक मुझे याद है, पिली और सफ़ेद थी |  मुख की विशेषता उनका ललाट था – विशाल और सम गोलाई आकार | भौहें और सर के बाल के बीच मानो एक लम्बा सफ़र हो| ललाट पर झुरियां थी | अपनी पतली-सुखी और भूरी-चांदी सी रेशों जैसी बालों पर कभी कभी नारियल तेल लगवा कर लाल फीते की चुटिया भी बनवाती थी |

उनके हाथ मानो पानी से भरी थैली हो जिसे हड्डी से चिपका दिया हो – नरम और दब-दबा सा | एकदम ढीली चमड़ी – इतनी ढीली की झुरियों ने उसे समेट रखा था | मुझे उन झुरियों पर हाथ फेरने पर अच्छा लगता था | इतना नरम और नाजुक और कितना अजीबो-गरीब | हाथों की उंगलियाँ छोटी-छोटी सी और पतली-पतली सी – सीख के काटों जैसी – जिसपर चमड़ी की ढीली मरहम-पट्टी कर दी हो | कांटो जैसे नाखून – पीले – सफ़ेद – उनपर लम्बी काली धारियाँ और बिलकुल कड़क | हथेली मानो स्पोंज के बिस्तर की तरह दब-दबा सा | इतने रेखाएं – कुछ गहरी – कुछ पतली |

और सबसे ख़ास बात थी उनकी नाभि | अक्सर नाभि एक गड्ढे की तरह होता है – मगर मेरी परदादी की नाभि उलटी थी – मानो नाभि पर एक नहुत छोटी सी चमड़ी की छत्री रख दी हो और गड्ढे की जगह चमड़ी की ढाल बन गयी | उनकी आवाज़ में तेजी थी |

इतनी उम्र के बावजूद उनका चिल्लाना भयंकर था | उनके फेफड़े में दम और आवाज़ में जोर था | थोड़ी फटी हुई और थोड़ी पतली आवाज़ थी | हर बोली के साथ उनका पेट और उनकी छाती झटकती थी – मानो हर बोली गले से नहीं  बल्कि शरीर के किसी अजूबी कोने से दम भर के, एक-एक करके निकाल रही हो –

“ऐ बिन्नी .. देख तेरो छोरो के कर रो ऐ”

“आ .. अठिने आ ..तने चीजे दूँ “

” बेटा मेरी लाठी ला दे … अरे करम फूटे दे दे”

करम फुटा उनका पसंदीदा शब्द था – हा हा |

उनके पाव के तरफ कभी नज़र ही नहीं गयी  | उनका कपड़े पहनने का अपना अंदाज़ था | उनका blouse पेट तक झूलता रहता था – नीचे के कुछ बटन टूटे हुए या खुले हुए – कंधे के हड्डी में अटकी, कोहनी तक झूलती रहती थी | blouse  की पीठ ढकी हुई और गला गोलाई आकार में कटा हुआ | सादे peticoat के ऊपर पतली सूती की साड़ी | साड़ी से, सीने की बजाये, पीठ को ढकती थी और फिर सर को | नाभि के नीचे साड़ी की अजीब गुथी थी जो मुझे हमेशा रहस्यमय लगती थी जैसे उसमे उन्होंने कुछ छुपा कर रखा हो | उस गुत्थी और blouse  के बीच कड़ाई जैसा गोल आकार का फुला हुआ पेट और उसपर छत्री वाली नाभि – मुझे छोटी उम्र में वो एक अलग प्राणी लगती थी | घर पर कई बार , अपनी आलस्य से या मज्बोरी से. सिर्फ blouse  और peticoat में रहती थी|

हर शाम को अपने कमरे से निकल कर लाठी पकड़कर बहार livingroom (hall) में प्लास्टिक कीगुलाबी कुर्सी में शान से जम जाती थी |  अपने उम्र और घर के सबसे बड़े होने का फ़ायदा उठाती थी –

“अरे झाडू ठीक से निकाल”

“अरे छोरा खेल बंद कर”

“आने दे तेरे बापू ने आने दे”

कान्कुरगाछी में आने के बाद मैं उन्हें जानने लगा और अन्य सदस्यों का उनके प्रति व्यवहार भी समझने लगा | इससे पहले गणेशगढ़ में  मैं उनसे डरता था क्योंकि वो एक दूर अंधेर कमरे में अकेली रहती थी | कोई उजाला भी नहीं था | अजीब बात है मैं अपनी दादीमा को ही नहीं जानता था जबकि वो हमारे साथ रहती थी | कांकुर गाछी आने के बाद मुझे लगता है उन्हें भी सदस्य होने का गर्व मिला होगा और अपनी अहमियत लगी होगी |

उन्हें खाना देना या खाना खिलाना एक बड़ा ड्रामा होता था | मेरी माँ (दादी) का उनपर चिल्लाना , मम्मी और चाचियों का नज़रंदाज़ करना | मुझे उस समय पता नहीं था कि यह सही है या गलत | छोटी उम्र मैं हम मान लेते हैं कि जो बड़े करते हैं वही सही है और हमे भी वही करना चाहिए | अभी सोचता हूँ तो यह बात भी मानना पड़ेगा कि मेरी दादीमा भी तंग करने में कुछ कम नहीं थी | उन्हें खिलाना, नहलाना, पेशाब ले जाना, गंदे कपड़े की धुलाई और न जाने क्या क्या जो मेरी माँ (दादी) ने बिना किसी को बताये किया होगा |

उनके देहांत के समय की कुछ यादें ताजा करना चाहूँगा | नवरात्री का समय था – महीना या तारीख याद नहीं | घर पर पूजा रखी थी | एक मोटे से पंडितजी  आते थे जो बहुत पुराने जान-पहचान के थे – लाल टिका लगाये, रुद्राक्ष पहने , मोटे, काले बाल और चोटी | सप्तमी को भोर चार बजे, ब्रह्म मुहरत में उनका देहांत हुआ | मुझे उस समय यह सप्तमी, देहांत, ब्रह्म मुहरत क्या होता है पता नहीं था | मगर यह वाक्य , जो बडो के मुह से मैंने कई बार सुना था – मेरे दिमाग में बैठ गयी |  देहांत की रात, डॉक्टर र.डी. अगरवाल समेत घर के सभी लोग उस कमरे में बैठे थे | शायद पहली बार (और आखरी बार) उस कमरे में इतनी भीड़ इकठा हुई होगी | परमेश्वरी भुआजी भी थी शायद |

सबसे पहले शानू चाची को पता चला क्यूंकि वो दादीमा के कमरे की बाथरूम का इस्तमाल करती थी | शायद सुबह के छह बजे होंगे या उसके आस-पास | पता नहीं शानू चाची को कैसे लगा होगा – एक मृत शरीर को देख कर | फिर क्या –  हिन्दू धर्म का बड़ा विस्तृत उत्सव |

मैंने अपनी ज़िन्दगी में पहली मौत देखी थी | पता नहीं था कि ये सब क्या हो रहा था | इतनी सजावट, फूल,-फल, पापा लोगों का धोती पहनना | दादीमा के शरीर को नहलाना, फिर कपड़े पहनाना, माला पहनाना.. यह सब इतनी जल्दी हो रहा था मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था | मैं, घर के पुरुषों के साथ , टेंपो में बैठ कर घाट पर चला गया मगर उनकी चिता नहीं देखी |

अब बाईस साल की  उम्र में दस साल पुरानी बात को याद करने की कोशिश कर रहा हूँ –

क्या उनके जाने का दुःख था मूझे ?

क्या मुझे लगा कि मैंने  किसी को खो दिया है ?

क्या किसी  को उनकी कमी या मूझे उनकी कमी महसूस हुई ?

इन सब सवालों का जवाब पता नहीं है | तो शायद इन सवालों का जवाब नहीं होगा | उनके जीवन के बारे में तो ज्यादा नहीं जानता मगर इतना ज़रूर कहूँगा कि उनमे स्वाभिमान था | अपने बेटे से बहुत प्यार था – इतना प्यार शायद उसके लिए वो अपने स्वाभिमान को भी न्योछावर कर दे | हकीकत से वाकिफ थी – इतने साल अकेले गुजारना हिम्मतवालों का ही काम होता है |

घर के बड़े कहते हैं कि उनमे दिव्य शक्ति थी – हनुमानजी की | वो मेहंदीपुर जाकर एक महीने तक पाठ-पूजा करती थी | घर के बडो का मानना है इससे उन्हें सिद्धि मिली | पता नहीं उनमे सिद्धि थी या नहीं मगर मैने उन्हें कभी मौत का इंतज़ार करते नहीं देखा | ऐसे नहीं था की वो जीना नहीं चाहती थी या जीने से उब गयी हो |

वो एक बहादुर औरत थी और ऐसे ही मैं आपको याद रखना चाहता हूँ – दादीमा |

आपको हार्दिक श्रद्धांजलि  |

दादीमा, 1998 में

कमला देवी जालान (दादीमा), 1998 में