ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद

28 02 2009

नमस्कार

यह मेरा पेहला  पोस्ट है । आशा है कि आपको पसन्द आयेगा ।

ज़िन्दगी का सफर फिलहाल बहुत अच्छा रहा है | मुझे हमेशा लगता रहा है कि मेरी सफलता सिर्फ़ मेरी नहीं है बल्कि कई लोगों का सहयोग रहा है | आज मैं पहली दहलीज़ को पार कर, एक ओद्धे तक पहुँच चुका हूँ |
पीछे मुड़के देखता हूँ तो लगता है कि एक सदी बीत गई है| हालाँकि सिर्फ़ चार साल ही हुए है |
कल रात सपने में मैंने देखा कि मैं अपनी प्राथमिक स्कूल में हूँ और मेरे दोस्त और शिक्षक हैं | अपनी कक्षा में अच्छे बच्चे की तरह मैं बैठा पढाई कर रहा था | ब्रेक का वक्त हुआ और बेल बज गई | हम सब दोस्त इक्कठा होकर टिफिन  करते थे | मुझे याद है कि हमने एक फैसला किया था कि हमेशा साथ खायेंगे और अगर कुछ खरीदना हो तो साथ खरीदेंगे | मैंने अपने दोस्तों को दगा दिया था| मैंने अकेले जाकर पसंदीदा कचोडी चना (दही और इमली के साथ) खाया था – चुपके से | वो कचोडी आज भी मेरे मुह में पानी लाती है और उस जैसी कचोडी शायद कलकत्ता मैं कहीं नहीं मिलेगी, ऐसी मेरी भावना है | तो किसी एक दोस्त ने मुझे देख लिया और बाकि को कह दिया कि नितिन ने अकेले ही कचोडी खा ली बिना किसी को बताये | फिर एक ने आके मेरा गला पकड़कर कहा, “चल अब चौबीस रुपये निकाल |” मैं आश्चर्य से बोला “क्यों ” तो उसने कहा ” तीन रुपये का एक और हम आठ” | मैंने झडक कर
कहा कि मैं जब चाहूं तब खा सकता हूँ, किसी की मंजूरी की ज़रूरत नहीं, तुम्हे खाना हो तुम खाओ, दूसरे को क्यों रोकते हो | ऐसी कोई बात बड़ी नहीं थी कि कोई मुझसे बात नहीं करें | और मैंने एक नया चलन शुरू किया | अगले दिन दूसरे लड़के ने ख़ुद खाया | सभी को लगा कि पुराने नियम मैं बदलाव कि ज़रूरत है और हमने फ़ैसला किया कि जो चाहे तब खा सकता है और इस नए “अमेंडमेंट” को उत्सव के रूप में हम सब ने दही इमली वाली कचोडी खाकर मनाई |

मेरा कदम ज़रूर विद्रोही हो सकता था पर मुझे ख़ुद पर विश्वास था कि मैं जो करने वाला हूँ वो भले सही हो या ग़लत , मगर जो चलन है वो ठीक नहीं है | एक बंधन था जिसे तोड़ने की किसीने हिम्मत नहीं की | मैं नहीं कहता कि उनमे हिम्मत नहीं थी या मुझमे हिम्मत थी | मगर कायर नहीं था | शायद कई ने छिपके खाया हो जैसे मैंने ही खाया था | मगर पकड़े जाने पर मैंने अपनी बात कही, कुछ गिल-गिला नहीं कहा और स्पष्ट कहा |

पता नहीं क्यों यह घटना मेरे दिमाग से जाता नहीं हैं | शायद मुझे तब समझ लेना चाहिए था कि मेरी ज़िन्दगी में कई लडाइयां लिखी है जिन्हें ज्यादातर मैं ही शुरू करता हूँ | लडाइयां अपने पेट के लिए नहीं मगर सच्चाई के लिए |
सच, उचित, निष्कपट और स्वच्छता – स्वयं से और समाज से – ज़रूरी है |

Advertisements