कच्चे

5 11 2011

कच्ची धूप का सिरहाना लिए
उस मोड़ की पतली डगर
पिपली पेड़ का कोना लिए
दूर कहीं गोता लगाये

आओं चले हम
कहीं ऐसी नगर को
जहाँ अपनी ही दुनिया हो
अपनों में ही दुनिया हो

मीठी-मीठी सी खुशबू
घुली मिटटी का ओछा लिए
चुटकी भर सीत हवा, गुदगुदाए

वादियों से सिला रुस्तम कोहरा
धीमी-धीमी, धुंधली-धुंधली
ठहरा हुआ, सिमटा-सिमटा ये समा

रुके क्यों, क्यों थमे
थामे हाथों में हाथ, उगे

एक-एक कदम बुने उस कच्ची सड़क पर
सुरली डंडी पर तोड़ते दम
आए, हम आए लिप-लिपि सी बादलों को चीरकर

चांदी के चाँद को पीए
चांदनी के लेप से नहाए
कस-कसकर चूमे नरम रेशमी हवाएं
भर-भरकर सिसकती सिसकियाँ

सुनहरी धूप का कुल्हा किए
ज़िन्दगी जिंदादिली की गुन-गुन
महक कच्चे आम का
किर-किरहाये रूठे भुरे पत्ते

चले हम, फिर से, नज़र में धूल जिगर में गुब्बार लिए

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_ife

2 02 2011

_ife

 

Broken, shattered, pointed pieces

tinkering shards – a life

 

Unthawed bleeding juicy token of flesh

sowing shreds – a life

 

Thrown down, crawling up, grappling ropes

tumultuous, carving leads – a life

 

Snatched, grabbing, recklessly loose

gluttonous lusty, threading bonds – a life

 

Sloth, dragged, limped, faltering

yet thickly textured, darkly vibrant, defiantly expressive

surviving, debauching, uncaringly vitiating

anomalous blotch, gloriously flagging existence – that very _ife





असत्याभास

13 03 2009

असत्याभास

एक जवलामुखी है | फुंटता क्यों नहीं | कब तक यह आग की ठंडक मुझे सुजाती रहेगी | एक बार जल जाओं तो चैन मिले |
आग की ठंडक उसकी तपीश से भी ज्यादा दर्दनाक होती है | सुजा हुआ  ठण्ड  है | फूल गया है अन्दर दब्त्ते दबते | और कब तक दबा कर रखूँ | लाल हो रहा है | आग पिला नहीं आसमानी नीला है | छुहोगे तो जलेगा नहीं .. पत्थर बन जायेगा – उसकी जान ही  मर जायेगी | मैं मौत को लिए घूम रहा हूँ | लोग डरते हैं की कहीं मौत न आ जाये | मैं मौत को सीने के कोने में पाल रहा हूँ | नहीं मरता है और न बढता है | उस कोने में बैठे मुझपर हँसता है | मौत गले लगती नहीं और मेरा गला छोड़ती भी नहीं |

कब तक दबाये हुए रखूँ मैं इस कीड़े को | छाती में छेद हो गया है | गहरी गुफा बन गयी | बहुत अँधेरा है वहां | गहरी इतनी कि अपनी पुकार कि गूंज तक नहीं सुने देती | इसी छाती के विस्मय गुफा में कहीं रेंग रहा है यह कीड़ा | गुफा अथाह है | पता नहीं कहाँ ख़त्म होती होगी यह साली गुफा | सुरंगे बन गए है | यह नसे नहीं दीमख से लदि सुरंगे है | चिपकी दीमख बेरोक इस सुरंगों को चुसे जा रही है | चूस चूस के गला रही है | इन दिमखों से मुझे डर लगता है | इनके बीच ही कहीं चुप्पा है कीड़ा |

कीड़ा मुझे चिडाता है –

तुम में कुछ नहीं है | खाली हवा से भरी सुरंग हो | लाल  खून नहीं दीमख सड़ती है तुम्हरे शरीर में | बोली नहीं आह निकलती हैं इन दिमखों की | और इन दीमख से नीली आग निकलती है – तुम जिसे भी पाना चाहोगे उसकी जान तक छीन लोगे | मौत किसे आती है – मौत तो तुम खुद हो | खा जाते हो खुदको और आस पासवाले को | मैं तुम्हारी फिदरत हूँ, तुम्हारी जात वालों की विशेषता हूँ | मैं कीड़ा नहीं – स्वयं हूँ | देखो लो अपनी असली घिनौनी सूरत | कड़वाहट, जलन और असीमित चाह |

सारा बदन गिलगिला हो रहा है | मानो हड्डी नहीं रही | अन्दर से कोई खीँच रहा है | मांस के एक-एक रेशे तेजी से टन के टूट रहे है | छाती धधक रही है | सांस तेज़ हो रही है | खांसी आती है और गले में जलन होती है | गले से जलन हाथों को उँगलियों तक करंट की तरह देहका देती है | दीमख चबाये जा रही है और आग दर्दनाक ठंडक दे रही है | उँगलियों के छोरो में फफोले उठ गए है | उनसे पानी निकल रहा है | जगह जगह फफोले उठ गए है | दीमख पेड़ की टहनियों की तरह अन्दर खोखले किये जा रहे है | फिर उनमे आग आती है | आग सूखापन लाती है और सूखे मर्म पर पर लाल जलन | सब सुजा जा रहा है | ज़रा सा  पानी जलन को और उत्तेजित कर देता है | ये दीमख मेरे आँखों के और जीभ के पेशियों ताने जा रही है |
तेजी से उन्हें खाए जा रहा है | जल रहा हूँ | गलता नहीं और भस्म भी नहीं होता | इन दोनों छोर्रो के बीच मौत का भद्दा तांडव हो रहा है | न मौत न जीवन और अथाह तड़पन बेचैनी और प्यास.|