कच्चे

5 11 2011

कच्ची धूप का सिरहाना लिए
उस मोड़ की पतली डगर
पिपली पेड़ का कोना लिए
दूर कहीं गोता लगाये

आओं चले हम
कहीं ऐसी नगर को
जहाँ अपनी ही दुनिया हो
अपनों में ही दुनिया हो

मीठी-मीठी सी खुशबू
घुली मिटटी का ओछा लिए
चुटकी भर सीत हवा, गुदगुदाए

वादियों से सिला रुस्तम कोहरा
धीमी-धीमी, धुंधली-धुंधली
ठहरा हुआ, सिमटा-सिमटा ये समा

रुके क्यों, क्यों थमे
थामे हाथों में हाथ, उगे

एक-एक कदम बुने उस कच्ची सड़क पर
सुरली डंडी पर तोड़ते दम
आए, हम आए लिप-लिपि सी बादलों को चीरकर

चांदी के चाँद को पीए
चांदनी के लेप से नहाए
कस-कसकर चूमे नरम रेशमी हवाएं
भर-भरकर सिसकती सिसकियाँ

सुनहरी धूप का कुल्हा किए
ज़िन्दगी जिंदादिली की गुन-गुन
महक कच्चे आम का
किर-किरहाये रूठे भुरे पत्ते

चले हम, फिर से, नज़र में धूल जिगर में गुब्बार लिए

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तो शायद सुकून मिले

24 07 2010

कुछ यादें, कुछ बातें
छोड़ जाते हैं निशाँ

लम्बे वक़्त का मरहम
मगर चुभन जाती नहीं

भूलना चाहे, तो भूल जाते
मगर वो एहसास जाता नहीं

बीते पल फिर लौट आये
साए जैसे जाग जाए
इन्हें फिर दफना दूं
तो शायद सुकून मिले

घाव खुरेदें, लघु फूंट निकले
चोंट और दर्द ताज़ा हो गए
इन्हें फिर सह जाऊं
तो शायद सुकून मिले

वक़्त की नुकीली लहरें फिर टकराई
टूट गया बाँध
इन्हें फिर से बनाऊ
तो शायद सुकून मिले

कोशिश ही सहारा
बार-बार गिरना
और बार-बार उठना, दौड़ना

इस रफ़्तार की होड़ में, भीड़ की आड़ लिए
खुद से भागना – एक बेगाना, अनजाना

अब –
उन सायो से डर नहीं लगता
उन घावों की चुभन नहीं होती
वो बाँध भी नहीं टूटती

इन कोशिशों से, अब, थकान नहीं होती
तो, अब, शायद सुकून मिले?





प्रतिबिम्ब

21 05 2010

अकेलेपन के साए सच लगते हैं
इस अंधेर कमरे में कुछ ढूँढता
एक कदम लम्बे रास्ते
चले थे एक, निकले कई

थामे वक़्त का हाथ दूर निकल आये
अरसा लगता है पल-पल
पिछड़े मोड़ पर थमे थे
न मूड़ सके हम, रुके कई

यह कैसी है जंजीरें पैरों में
लिए फिरते है सीने से लगाये
अदा बन गयी है इसकी
उठा लिए हर बार, गिराए कई