स्टीव जॅाब्स ने कही थी तीन कहानियां – आखिरी कहानी

1 01 2012

स्टीव जॅाब्स की तीसरी कहानी जो उन्होंने 2005 में स्तान्फोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) के क्रमागति समारोह (Graduation Ceremony) में पंद्रह मिनट के भाषण में कहा था | उसी प्रेरणादायक भाषण को हिंदी में अनुवादित करते हुए, एक free thinker को श्रद्धांजलि |

पहली कहानी पिच्छले पोस्ट में प्रस्तुत है |

दूसरी कहानी, 2011 को सलामी देते हुए आखिरी दिन को प्रकाशित हुआ जो यहाँ प्रस्तुत है |

 

नए साल, 2012, की शुरुआत स्टीव जॅाब्स की आखिरी कहानी से होगी |

 

9:05   मेरी तीसरी कहानी मौत (death) के बारे में है |

9:09   जब मैं सत्रह साल का था मैंने एक कहावत सुनी थी,

9:12   “अगर तुम हर दिन ऐसे जियो मानो वो आखिरी हो तो

9:15    एक दिन तुम पक्के सही होगे |

9:20    इससे मैं प्रभावी हुआ, और तब से, पिच्छले 33 वर्षों से,

9:25    मैं हर सुबह आईने में देखे कर

9:27    खुद से पूंछता हूँ, “अगर आज मेरी ज़िन्दगी का आखिरी दिन होता,

9:30    क्या मैं यह करता जो मैं आज करने जानेवाला हूँ?” |

9:34    जब कई दिनों के जवाब “नहीं” होते,

9:37    मुझे पता चलता मुझे कुछ बदलना होगा |

9:40    इस बात को याद रखना कि जल्द ही मैं एक दिन मर जाऊँगा

9:43    यह सबसे अहम हथियार मुझे मिला,  जिसने मेरे बड़े फैसले लेने में मदद की |

9:47    क्यूंकि करीब-करीब सारी चीज़ें, सारी बाहरी उम्मीदें, सारे अभिमान,

9:52    पराजय या शर्मिंदगी का डर –

9:54    ये सारी चीज़ें, मौत के सामने बस गिर जाती है,

9:58    रह जाती है जो असल में अहम है |

10:00  इस बात को याद रखना कि तुम एक दिन मर जाओगे –

10:03  मेरी जानकारी में सबसे बेहतरीन जरिया है जिससे कि – तुम्हारे पास कुछ खोने को है – इस जाल से बच सकोगे |

10:08      तुम पहले से ही नंगे हो | अपने दिल की बात न सुनने का कोई कारण नहीं है |

10:13      करीब एक साल पहले, मुझे कैंसर है यह पता चला |

10:16      सुबह के 7:30 बजे मेरा scan हुआ और

10:20      मेरे pancreas के tumor साफ़ दिखाई पड़ रहे थे |

10:23      मुझे पता भी नहीं था कि pancreas क्या होते है |

10:26      डॉक्टरों ने कहा कि जहां तक यह ऐसा कैंसर है

10:28      जिसका कोई इलाज नहीं है |

10:30      और मैं 3-6 महीनो से ज्यादा जीने की आशा न करूँ |

10:35      मेरे डॉक्टर ने सलाह दी कि मैं घर जाऊं और अपने काम को सम्भालूँ |

10:40      डॉक्टर के शब्दों का मतलब था कि मरने की तैयारी शुरू कर दो |

10:42      इसका मतलब अपने बच्चों को, कुछ ही महीनो में, वो बातें बताना

10:47      जिसके लिए तुम सोचते थे कि तुम्हारे पास आनेवाले 10 साल है |

10:51      इसका मतलब कि पक्के से पूरा काम करना

10:53      तांकि तुम्हारे परिवार के लिए यह मुश्किल न हो |

10:56      इसका मतलब कि अलविदा कहने का वक़्त हो गया |

11:01      मैं सारे दिन उस diagnosis के साथ जिया |

11:04      बाद में, शाम को, मेरी biopsy हुई

11:06      जिसमे एक endoscope को मेरे गले से नीचे उतारते हुए,

11:08      पेट से होकर, मेरे आँतों में, मेरे pancreas में

11:11      सुईं चुभाई और tumor के कुछ cells निकाले |

11:14      मैं बेहोश था, मगर मेरी बीवी वहाँ पर थी

11:18      और उसने मुझे कहा कि जब डॉक्टरों ने cells को microscope में देखा

11:21      तो वे रोने लगे क्यूंकि

11:24      वह एक असामान्य pancreatic cancer निकला जिसका इलाज surgery से हो सकता है |

11:29      मेरी surgery हुई और शुक्र है मैं अभी ठीक हूँ |

11:40      मैं मृत्यु के करीब इससे ज्यादा कभी नहीं गया |

11:43      और मैं आशा करता हूँ कि आनेवाले कुछ दशकों में मैं मौत के इतने ही करीब रहूँ |

11:46      क्यूंकि मैं इससे गुजर चूका हूँ,

11:48      मैं अब यकीन के साथ कह सकता हूँ –

11:51      मौत ज्यादा उपयोगी और कम बौद्धिक (intellectual) विचार है  –

11:55      कोई मरना नहीं चाहता |

11:58      जो स्वर्ग में जाने की बात करते हैं वे भी मरना नहीं चाहते |

12:02      इसके बावजूद मौत ऐसी मंजिल है जो हम सब के हिस्से में है |

12:06      कोई भी इससे भाग नहीं सका | और यह जैसा है वैसा ही होना चाहिए |

12:10      क्यूंकि मौत, जहां तक, जीवन की सबसे बड़ी एकमात्र आविष्कार है |

12:15      यह जीवन का change agent है |

12:16      यह पुराने को साफ़ कर, नए के लिए रास्ता बनाता है |

12:19      अभी आज जो नया है वो तुम हो, लेकिन एक दिन – आज से बहुत दूर नहीं –

12:24      तुम भी, धीरे-धीरे पुराने हो जाओगे और तुम्हे रास्ते से साफ़ कर दिया जायेगा |

12:28      इतना dramatic होने के लिए माफ़ी चाहता हूँ, लेकिन यह सच है | 

12:32      तुम्हारा समय सिमित है, तो दुसरे के जीवन को जी कर अपने जीवन को waste मत करो |

12:38      दुसरे के विचारों से निकली नीति और सिद्धांतों के जाल में मत फंसो |

12:40      दुसरो के opinions के शोर से, अपने अन्दर की आवाज़ को खोने मत दो |

12:46      और सबसे ज़रूरी बात

12:48      अपने दिल (heart) और अंतर्ज्ञान (intuition) को follow करने की हिम्मत रखो |

12:51      उन्हें, किसी तरह से पता है, असल में तुम क्या बनना चाहते हो |

12:55      बाकी सब तुच्छ है |

13:09      मैं जब छोटा था

13:11      तब The Whole Earth नाम की एक amazing magazine नकलती थी |

13:15      वो हमारे generation के मानो bible की तरह था |

13:18      इसकी रचना Stewart Brand नाम के आदमी ने Menlo Park में शुरू की थी |

13:21      और उसने इस magazine में अपनी कवितओं से जान भर दी थी |

13:25      यह 1960s के दशक की बात है,

13:27      computers और desktop publishing से पहले |

13:30      तो सब typewriters, scissors, और polaroid camera से बनाया जाता था |

13:34      मानो पन्नो पर google की तरह हो |

13:36      गूगल के आने के 35 साल पहले: यह सब आदर्शवादी था,

13:41      अच्छे tools और महान सोच से उमड़ रहा था |

13:45      Stewart और उसके team ने The Whole Earth के कई

13:47      प्रकाशन निकाले |

13:48      और फिर, जब दौर पूरा हो गया, उन्होंने आखिरी प्रकाशन निकाला |

13:53      यह 1970s की बात है और मैं तुम्हारे उम्र का था |

13:58      आखिरी प्रकाशन के back cover पर एक photograph थी –

14:00      लम्बे रास्ते पर उगता सूरज | highway पर जैसे होता है, उसकी तरह;

14:04      तुम्हे पता होगा अगर तुम adventurous हो |

14:08      उस फोटो के नीचे लिखा था: “Stay Hungry. Stay Foolish – भूखे रहो. भोले रहो |”

14:13      यह उनका आखिरी सन्देश था – भूखे रहो, भोले रहो – Stay Hungry. Stay Foolish |

14:18      और मैंने हमेशा अपने लिए यही चाहा |

14:23      और आज, graduate होनेपर तुम नए से शुरुआत करने वाले हो, मैं तुम्हारे लिए यही कामना करता हूँ |

14:28      भूखे रहो, भोले रहो – Stay Hungry. Stay Foolish |

14:31      आप सभी का बहुत धन्यवाद |

 

स्टीव जॅाब्स की तरह उनके प्रेरणादायक भाषण की समाप्ति 2012 की शुरुआत से हुआ |

 





स्टीव जॅाब्स ने कही थी तीन कहानियां – दूसरी कहानी

31 12 2011

स्टीव जॅाब्स की दूसरी कहानी जो उन्होंने 2005 में स्तान्फोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) के क्रमागति समारोह (Graduation Ceremony) में पंद्रह मिनट के भाषण में कहा था | उसी प्रेरणादायक भाषण को हिंदी में अनुवादित करते हुए, एक free thinker को श्रद्धांजलि |

पहली कहानी पिच्छले पोस्ट में प्रस्तुत है |

आज 2011 का आखिरी दिन है – इसके बाद हमारे जीवन में 2011 कभी नहीं आएगा, कभी भी नहीं | 2011 स्टीव जॅाब्स की दूसरी कहानी से ख़त्म होगी | नए साल, 2012, की शुरुआत स्टीव जॅाब्स की आखिरी कहानी से होगी |

5:38   मेरी दूसरी कहानी love और loss के बारे में है |

5:44   मैं lucky था, कम उम्र में ही मैंने खोज लिया कि मुझे क्या बेहद पसंद है |

5:48   बीस साल की उम्र में Woz और मैंने Apple की शुरुआत मेरे माता-पिता के गैरेज में की थी |

5:51   हमने बहुत मेहनत की थी, और दस साल में Apple हम दो गैरेज-निवासी से

5:55   बढकर २०० करोड़ डालर (या २ अरब डालर) की कम्पनी, चार हज़ार कर्मचारी से भी ज्यादा की कंपनी बनी |

5:59   हमने अपनी सर्वोतम रचना Macintosh को समय-सीमा से

6:03   एक साल पहले निकाला और मैं उस वक़्त 30 वर्ष का हुआ |

6:06   और फिर उसके बाद मुझे कंपनी में से निकाल दिया गया |

6:09   अपनी बनाई हुई कंपनी से कौन निकाल सकता है?

6:12   जैसे-जैसे Apple बढा, हमने एक व्यक्ति को hire किया जिसे मैं

6:15   बहुत बुद्धिमान समझता था जो मेरे साथ मिलकर कंपनी को चलाये |

6:18   लेकिन हमारे विचार अलग होने लगे और

6:20   आखिर में हमारे बीच मतभेद हो गया |

6:25   Board of Directors ने मेरा साथ नहीं दिया |

6:29   तो 30 वर्ष कि उम्र में मैं निकाला गया – और बहुत सार्वजानिक रूप से निकाला गया |

6:32   जो मेरी पूरी ज़िन्दगी का धेय था, वह चला गया |

6:35   मैं बिखर गया था |

6:38   कुछ महीनो तक मुझे पता नहीं था कि मैं क्या करूँ |

6:41   मुझे लगा कि मैं पिछली पीडी के उद्यमी (entreprenuer) लोगों के नज़रों में खर्रा नहीं उतरा

6:43   मैंने उस मशाल को गिरा दी जो मुझे दी गयी थी |

6:47   मैं David Packard और Bob Noyce से मिला

6:50   और उनसे माफ़ी मांगने की कोशिश की |

6:54   मैं सार्वजनिक पराजय (public failure) बन चुका था |

6:55   और मैं मण्डी से भाग जाने के बारे में भी सोच रहा था |

6:58   लेकिन धीरे-धीरे मुझे यह ज्ञान होने लगा कि मैं जो काम करता था मुझे बहुत पसंद था |

7:03   Apple में जो बिता, वह इस चीज़ को डगमगा नहीं सका |

7:07   नकारने के बावजूद, मेरी मोहब्बत कम नहीं हुई |

7:12   और मैंने तय किया कि मैं फिर से शुरू करूँगा |

7:14   मैंने उस समय नहीं देखा था, मगर Apple से निकाले जाना – यह मेरे लिए सबसे अच्छा हुआ |

7:21   नौसिखिये के हल्केपन ने – फिर से – सफल होने के भारीपन की जगह ली,

7:26   सब चीज़ों के बारे में अनिश्चित |

7:27   इसने मुझे आज़ादी दी और मैं अपने ज़िन्दगी के सबसे रचनात्मक (creative) दौरों में से एक से होकर गुजरा |

7:31   आनेवाले पांच सालों में मैंने NeXT नाम की कंपनी और

7:34   Pixar नाम की कंपनी की शुरुआत की |

7:35   औरे एक अद्भुत (amazing) औरत के प्यार में पागल हो गया जो अब मेरी बीवी है |

7:39   Pixar ने विश्व की पहला computer animated

7:42   फिल्म Toy Story बनाई

7:44   और आज दुनिया का सबसे सफल animation स्टूडियो है |

7:49   विस्मयपूर्ण घटनाक्रम में, Apple ने NeXT को खरीद लिया |

7:53   मैं Apple में वापस आया और हमने NeXT में जो technology की तैयारी की,

7:56   वो आज Apple के परिवर्तन में अहम है |

7:59   और Laurene और मैं, हमारा एक प्यारा-सा परिवार है |

8:03   मैं काफी निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि

8:05   यह सब नहीं होता अगर मैं Apple से निकाला नहीं गया होता |

8:08   वो एक कडवी दवा थी, मगर शायद रोगी को इसकी ही ज़रुरत थी |

8:12   कभी-कभी ज़िन्दगी तुम्हारे सर पर ईंट फेक कर मारती है | हार मत मानना |

8:18   मुझे पक्के से विश्वास है कि सिर्फ एक ही चीज़ मुझे आशा देती रही कि मैं जो काम करता था उससे मुझे

         मोहब्बत थी |

8:21   तुम्हे क्या पसंद है उसे हर हालत में खोजना चाहिए |

8:24   और यह जितना सच तुम्हारे काम के बारे में है उतना ही सच तुम्हारे प्रेमी के बारे में है |

8:28   तुम्हारा काम तुम्हारी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा भर देता है |

8:30   और वास्तव में तुष्ट (satisfied) रहने के लिए सिर्फ एक ही रास्ता है –

8:32   वही करो जो तुम मानते हो कि महान काम है |

8:35   और महान काम करने के लिए सिर्फ एक रास्ता है – जो काम तुम करते हो उससे तुम्हे बेहद मोहब्बत हो |

8:38   जिस काम से तुम्हे मोहब्बत हो, अगर तुम्हे अभी तक नहीं मिला, तो खोजता रहो | समझौता मत करो |

8:43   दिल के हर मामले की तरह, तुम्हे पता चल जायेगा जब तुम्हे वह मिल जाएगी |

8:47   और, जैसे हर अच्छे रिश्ते की तरह,

8:49   यह समय के साथ बेहतर और बेहतर होता जाता है |

8:52   तो खोजते रहो, समझौता मत करो |

9:05   मेरी तीसरी कहानी मौत (death) के बारे में है |

आगे की आखिरी कहानी अगले पोस्ट में है |
नए साल, 2012, की शुरुआत स्टीव जॅाब्स की आखिरी कहानी से होगी |





स्टीव जॅाब्स ने कही थी तीन कहानियां

30 12 2011

स्टीव पॉल जॅाब्स (Steve Paul Jobs) (February 24, 1955 – October 5, 2011) का देहांत केवल छप्पन वर्ष की आयु में हुआ | दुनिया में कई लोग जनमते है और कई चले जाते हैं | और कई अपनी छाप छोड़ जाते है |

मगर कुछ ही होते हैं जिनकी छाप अपने परिवार, शहर, देश से बहार निकल कर पूरी दुनिया के, सिर्फ अमीर या सत्ताधारी या विशेषज्ञ या शैक्षिक क्षेत्र तक सिमित न रह कर, प्रत्येक व्यक्ति को छूती है और हर व्यक्ति उसके विचारों से निकली चीज़ों को अपने पास रखता है और रोज़ इस्तेमाल करता है |

हैं ऐसे कई लोग है, मगर वो बेनामी होकर चले जाते है| स्टीव जॅाब्स ही ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने न केवल युवकों को प्रेरित किया, बल्कि आम आदमी को अपने जीवन में सरलता लाने की नयी दिशा दिखलाई |

2005 में स्टीव जॅाब्स ने स्तान्फोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) के क्रमागति समारोह (Graduation Ceremony) में पंद्रह मिनट का भाषण दिया था | छोटा भाषण मगर प्रेरणादायक, उत्साहित और मनुष्य जीवन को कार्मिक दृष्टिकोण से देखने पर मजबूर कर देता है |

सरल और सच

उनके भाषण का पहला शब्द था – धन्यवाद |

मुझे दुःख होता है कि इस भाषण का अनुवाद कई भाषाओं में उपलब्ध है मगर हिंदी में नहीं | अनुवाद करना आसान नहीं है | वक़्त और मेहनत लगता है – विडियो को बार-बार, रोक-रोकके सुनना पड़ता है, भावना के अर्थ को जीवित रख, सही शब्दों का चुनाव करना होता है| Youtube के विडियो के नीचे Interactive Transcript को सलाम जिसने भाषण को पांच-छह सेकंड के वाक्यों में तोड़कर मेरे समय की बचत की | अनुवादित भाषण इसी रूप में प्रस्तुत किया गया है |

जो भी हो – इस ब्लॉग के पढने वालों को इसकी चिंता नहीं करनी है, आप धन्यवाद दे तो बढावा मिलेगा | तो आज मैं उसके जानदार शब्दों को हिंदी का लिबास पहनाता हूँ –

0:22   धन्यवाद| (लम्बी सास भरते हुए, मुस्कान के साथ) मैं आज आपके बीच, दुनिया की सर्वश्रेष्ठ

0:30   विश्वविद्यालयों में से एक, आपके कमेंसमेंट पर आकर सम्मानित हुआ |

0:35   सच सामने आये, मैं कभी कॉलेज से graduate नहीं हुआ |

0:41   और आज मैं जहाँ घड़ा हूँ – इससे करीब मैं कभी कॉलेज graduation तक नहीं पहुंचा |

0:47   आज मैं आपको मेरे जीवन की तीन कहानियाँ कहना चाहता हूँ | बस इतना ही |

0:52   कोई बड़ी बात नहीं | बस तीन कहानियाँ |

0:55   सबसे पहली कहानी बिंदुओं को जोड़ने के बारे में है |

1:01   छह महीने में मैंने Reed College छोड़ दी |

1:03   मगर मैं करीब अठारह महीने तक, पूरी तरह से छोड़ने से पहले, कॉलेज मैं ही रहा |

1:09   तो आखिर मैंने कॉलेज क्यों छोड़ा?

1:12   यह मेरे पैदा होने से पहले शुरू हुआ |

1:15   मेरी जैविक माँ (biological mother) एक युवा, अविवाहित graduate छात्रा थी |

1:19   और उन्होंने मुझे गोद लेने  (adoption) पर रखा |

1:22   उन्होंने निश्चय किया कि मुझे वही लोग गोद ले जिनके पास कॉलेज डिग्री हो |

1:26   तो मेरे लिए सब कुछ तय हो गया था कि मेरे पैदा होने पर

1:28   एक वकील और उसकी बीवी मुझे गोद ले लेंगे |

1:31   मगर मैं जब गर्भ से निकला तो आखिरी वक़त पर वकील और उसकी बीवी ने कहा कि

1:34   वे लड़की चाहते थे |

1:37   मेरे पालक माँ-बाप (adopted parents, foster parents), जो waiting list में थे,

1:40   उन्हें आधी रात को बुलावा आया कि, “हमारे पास एक अनपेक्षित (unexpected)

1:44   baby boy है, क्या आपको यह बच्चा चाहिए?”

1:47   उन्होंने कहा, “ज़रूर, क्यों नहीं !”

1:53   मेरी जैविक माँ (biological mother) को बाद में पता चला कि मेरी माँ कभी कॉलेज

से graduate नहीं हुई

1:55   और मेरे पिता कभी स्कूल से graduate नहीं हुए |

1:59   गोद लेने के आखिरी कागजों पर मेरी जैविक माँ (biological mother) ने sign करने

से मना कर दिया |

2:03   कुछ महीने बाद वे राज़ी हुई जब मेरे माता-पिता ने यह वादा किया कि

2:05   मैं कॉलेज ज़रूर जाऊँगा | यह मेरी ज़िन्दगी की शुरुआत थी |

2:12   और सत्रह साल बाद मैं कॉलेज गया | मगर मैंने भोलेपन में कॉलेज को चुना

2:19   जो Stanford College के जितना महंगा था |

2:22   और मेरे working-class माता-पिता के सारे बचत किये पैसे

2:24   मेरे tuition फीस में खर्च हो रहे थे |

2:27   छह महीने बाद, मुझे इसमें कोई अर्थ नहीं दिखा |

2:30   मुझे कुछ पता नहीं था कि मैं अपनी life से क्या करूँ |

2:32   और इसमें कॉलेज मेरी मदद कैसे कर सकता है – यह भी पता नहीं था |

2:36   और यहाँ मैं अपने माँ-बाप की पूरी ज़िन्दगी की कमाई को खर्च कर रहा था |

2:42   तो मैंने तय किया कि मैं कॉलेज छोड़ दूंगा और भरोसा था कि सब कुछ का हल खुद-ब-खुद निकल आएगा |

2:46   उस वक़्त यह सब बड़ा भयानक लगता था |

2:49   लेकिन पीछे मुड़कर देखने पर, यह मेरे सबसे अच्छे फैसलों में से एक है |

2:54   जैसे ही मैंने academic curriculum को छोड़ा, मैंने required classes लेना बंद कर

2:56   दिया जो मुझे पसंद नहीं थे |

2:59   और उन classes में जाना शुरु कर दिया जो अच्छी लगती थी |

3:04   यह सब कुछ खयाली (romantic) नहीं था | मेरे पास हॉस्टल रूम (dorm room) नहीं था,

3:08   तो मैं दोस्तों के कमरों के फर्श पर सोता था |

3:10   मैं पांच सेन्ट्स (5 cents) के लिए coke की बोतलों को वापस देता था ताकि खाना खरीद सकूँ

3:14   और हर रविवार रात सात मील (7 miles) पैदल चलकर, दूसरे शहर,

3:17   हरे कृष्णा मंदिर जाता था, हफ्ते के एक अच्छे खाने के लिए |

3:21   वहां का खाना मुझे बेहद पसंद था |

3:23   अपनी जिज्ञासा (curiosity) और अंतर्ज्ञान (intuition) को follow करते हुए,

3:26   मैं जिन-जिन चीज़ों से टकराया, वे सब मेरे लिए, बाद में, अनमोल साबित हुई |

3:29   उदहारण के तौर पर, उस ज़माने में, Reed College में शायद देश की सबसे अच्छी

3:34   सुलेख (calligraphy) शिक्षा मिलती थी |

3:38   सारे campus में, हर पोस्टर, हर गल्ले (drawer) के लेबेल बड़ी खूबसूरती

3:42   से हाथों से लिखे हुए थे |

3:45   क्योंकि मैंने curriculum छोड़ दी थी तो मैं किसी भी class में जा सकता था,

3:49   इसलिए मैंने सुलेख (calligraphy) पढने का फैसला किया |

3:53   मैंने serif और sans serif के बारे में सिखा,

3:56   शब्दों के बीच कितना फासला होना चाहिए,

3:59   एक बेहतरीन typography कैसे बेहतरीन बनती है – ये मैंने जाना |

4:03   वो खुबसूरत, ऐतिहासिक,

4:05   कलात्मक रूप से रहस्यपूर्ण (subtle) था, जो विज्ञान नहीं समझा सके

4:09   और यह सब मुझे आकर्षित करते थे |

4:12   दूर-दूर तक इन सबका कोई वास्तविक उपयोग नहीं था मेरी ज़िन्दगी में |

4:17   मगर दस साल बाद,

4:18   जब हम सबसे पहला Macintosh computer बना रहे थे,

4:21   वो सुलेख (calligraphy) की शिक्षा ताज़ा हो गयी | और हमने Mac में वो सब किया |

4:25   Mac पहला computer था जिसमे खुबसूरत typography थी |

4:29   अगर में इस course को नहीं लेता

4:32   तो Mac में कभी अनेक typefaces या बराबर दूरी के fonts नहीं होते |

4:37   और युंकी Windows ने Mac को हुबहू नक़ल की,

4:47   यह शायद सच होता कि किसी भी personal computers में सुलेख नहीं होता, अगर मैं वो class नहीं लेता |

4:57   जाहिर है कि, जब मैं कॉलेज में था,

5:00   आगे देखते हुए इन बिंदुओं को जोड़ना नामुमकिन था |

5:02   लेकिन दस साल बाद यह सब साफ़-साफ़ नज़र आता है |

5:07   फिर से, आप इन बिंदुओ को आगे देखते हुए नहीं जोड़ सकते;

5:10   आप पीछे मुड़कर ही जोड़ सकते है |

5:12   तो आपको विश्वास रखना होगा कि ये बिन्दुएँ – कैसे भी करके – भविष्य में जोड़ेंगी |

5:16   आपको विश्वास रखना होगा – अपने मन पर, नियति पर, ज़िन्दगी पर, कर्म पर, और जो भी |

5:22   भरोसा रखना कि बिन्दुएँ आगे चलकर जुड़ेंगी – यह आपको आत्मविश्वास

5:28   (confidence) देगा, भले चाहे आपको पत्थरों से भरे रास्ते पर चलना पड़े – और इससे ही फर्क पड़ता है |

5:38    मेरी दूसरी कहानी love और loss के बारे में है |

आगे का दो कहानियां अगले पोस्ट पर |





कच्चे

5 11 2011

कच्ची धूप का सिरहाना लिए
उस मोड़ की पतली डगर
पिपली पेड़ का कोना लिए
दूर कहीं गोता लगाये

आओं चले हम
कहीं ऐसी नगर को
जहाँ अपनी ही दुनिया हो
अपनों में ही दुनिया हो

मीठी-मीठी सी खुशबू
घुली मिटटी का ओछा लिए
चुटकी भर सीत हवा, गुदगुदाए

वादियों से सिला रुस्तम कोहरा
धीमी-धीमी, धुंधली-धुंधली
ठहरा हुआ, सिमटा-सिमटा ये समा

रुके क्यों, क्यों थमे
थामे हाथों में हाथ, उगे

एक-एक कदम बुने उस कच्ची सड़क पर
सुरली डंडी पर तोड़ते दम
आए, हम आए लिप-लिपि सी बादलों को चीरकर

चांदी के चाँद को पीए
चांदनी के लेप से नहाए
कस-कसकर चूमे नरम रेशमी हवाएं
भर-भरकर सिसकती सिसकियाँ

सुनहरी धूप का कुल्हा किए
ज़िन्दगी जिंदादिली की गुन-गुन
महक कच्चे आम का
किर-किरहाये रूठे भुरे पत्ते

चले हम, फिर से, नज़र में धूल जिगर में गुब्बार लिए





_ife

2 02 2011

_ife

 

Broken, shattered, pointed pieces

tinkering shards – a life

 

Unthawed bleeding juicy token of flesh

sowing shreds – a life

 

Thrown down, crawling up, grappling ropes

tumultuous, carving leads – a life

 

Snatched, grabbing, recklessly loose

gluttonous lusty, threading bonds – a life

 

Sloth, dragged, limped, faltering

yet thickly textured, darkly vibrant, defiantly expressive

surviving, debauching, uncaringly vitiating

anomalous blotch, gloriously flagging existence – that very _ife





तो शायद सुकून मिले

24 07 2010

कुछ यादें, कुछ बातें
छोड़ जाते हैं निशाँ

लम्बे वक़्त का मरहम
मगर चुभन जाती नहीं

भूलना चाहे, तो भूल जाते
मगर वो एहसास जाता नहीं

बीते पल फिर लौट आये
साए जैसे जाग जाए
इन्हें फिर दफना दूं
तो शायद सुकून मिले

घाव खुरेदें, लघु फूंट निकले
चोंट और दर्द ताज़ा हो गए
इन्हें फिर सह जाऊं
तो शायद सुकून मिले

वक़्त की नुकीली लहरें फिर टकराई
टूट गया बाँध
इन्हें फिर से बनाऊ
तो शायद सुकून मिले

कोशिश ही सहारा
बार-बार गिरना
और बार-बार उठना, दौड़ना

इस रफ़्तार की होड़ में, भीड़ की आड़ लिए
खुद से भागना – एक बेगाना, अनजाना

अब –
उन सायो से डर नहीं लगता
उन घावों की चुभन नहीं होती
वो बाँध भी नहीं टूटती

इन कोशिशों से, अब, थकान नहीं होती
तो, अब, शायद सुकून मिले?





कुछ रिश्ते

2 07 2010

कुछ रिश्ते
न कहे जाये. न बोले जाये,
न सुने जाये, न देखे जाये

बस होते हैं
बेनाम –
गुमनाम या बदनाम

लिख जाते हैं, अमर प्रेम
पा जाते हैं खिताब

खतरनाक होते हैं ऐसे रिश्ते
लांघ जाते हैं दीवारें
टूट जाते है, बिखर जाते हैं
देते देते अंजाम

बस होते हैं
ऐसे कुछ रिश्ते

पाने की ख्वाहिश
उड़ने की चाहत
मिलने की प्यास
रहने की तड़प

गुलज़ार की जुबानी –
ज़िन्दगी तेरे ग़म ने रिश्ते नए सिखलाये





प्रतिबिम्ब

21 05 2010

अकेलेपन के साए सच लगते हैं
इस अंधेर कमरे में कुछ ढूँढता
एक कदम लम्बे रास्ते
चले थे एक, निकले कई

थामे वक़्त का हाथ दूर निकल आये
अरसा लगता है पल-पल
पिछड़े मोड़ पर थमे थे
न मूड़ सके हम, रुके कई

यह कैसी है जंजीरें पैरों में
लिए फिरते है सीने से लगाये
अदा बन गयी है इसकी
उठा लिए हर बार, गिराए कई





Praan प्राण প্রান

19 03 2010

Performed by Matt Harding. Music by Gary Schyman. Sung by Palbasha Siddique.

Penned by Rabindrnath Tagore. Published in his Nobel award winning book of Bengali poetry, Gitanjali, in 1910.

It took 100 years to understand this poetry and make others understand!

SING ALONG – Dedicated to my sister on her birthday and her baby

Praan

Bhulbonaar shohojete
Shei praane mon uthbe mete
Mrittu majhe dhaka ache
je ontohin praan

Bojre tomar baje bashi
She ki shohoj gaan
Shei shurete jagbo ami

Shei jhor jeno shoi anonde
Chittobinar taare
Shotto-shundu dosh digonto
Nachao je jhonkare!

– Rabindranath Tagore
The same stream of life that runs through my veins night and day runs through the world and dances in rhythmic measures. It is the same life that shoots in joy through the dust of the earth in numberless blades of grass and breaks into tumultuous waves of leaves and flowers. It is the same life that is rocked in the ocean-cradle of birth and of death, in ebb and in flow. I feel my limbs are made glorious by the touch of this world of life. And my pride is from the life-throb of ages dancing in my blood this moment.

प्राण

भुल्बोना आर शोहोजेते

शेई प्राण इ मों उठबे मेटे

मृत्तु माझे ढाका आछे

जे ओंतोहीं प्राण

बोजरे तोमार बाजे बाशी

शे की शोहोज गान

शेई शुरते जागबो आमी

शेई झोर जेनो शोई आनोंदे

चित्तोबिनार तारे

शोत्तो-शिन्धु  दश दिगोंतो

नाचाओ जे झोंकारे

– रबिन्द्रनाथ टगोर

वही जीवन की धारा जो मेरे नसों में दिन-रात दौड़ती है, इस पृथ्वी में भी दौड़ती है और ताल-लय पर नाचती है| यह वही जीवन धारा है जो धरती की मिट्टी को चीर कर अनगिनत घास के बाण बन जाती है या पत्तियों और फूलों के लहर बन जाती है | यह वही जीवन धारा है जो महासागर में है – जीवन और मरण का पलना, उतार या चडाव में | मुझे अनुभव होता है की इस जीवन धारा के स्पर्श से मेरे अंग तेजस्वी हो गए है | और मेरा अभिमान इसी जीवन धारा से है जो सदियों से धड़क रहा है और मेरे खून में अभी नाच रहा है |

প্রান

ভুলবনা আর সহজেতে

সেই প্রান এ মন উঠবে মেতে

মৃত্যু মাঝে ঢাকা আছে

যে অন্তহীন প্রান

বজ্রে তোমার বাজে বাসী

সে কি সহজ গান

সেই সুরেতে জাগবো আমি

সেই ঝর যেনো সি আনন্দে

চিত্তবিনার তারে

সত্য-সিন্ধু দশ দিগন্ত

নাচাও যে ঝঙ্কারে

–          রবীন্দ্রনাথ তাগোর





माक्यावैली के प्रसिद्ध कथन, ” द प्रिन्स ” से

24 05 2009
 माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532  में प्रकाशित

माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532 में प्रकाशित

निकोलो माक्यावैली द्वारा, इतालवी भाषा में, लिखित ” द प्रिन्स ” की चर्चा जारी रखते है | पिछले पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के, विभिन्न विषयों पर, विचारों का सारांश प्रस्तुत है |

पिछले पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे:       द प्रिन्स (1532 में प्रकाशित)

इस पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के प्रसिद्ध कथनों (famous quotations) की चर्चा होगी| मैंने पांच मनोहर अवतरणों को चुना है और उनकी व्याख्या की है –

1. At this point one may note that men must be either pampered or annihilated. They avenge light  offenses; they cannot avenge severe ones; hence, the harm one does to a man must be such as to obviate any fear of revenge.

अनुवादित –

अब ये ध्यान देने की बात है कि मनुष्य को या तो लाड-प्यार किया जाए या फिर मिटा दिया जाये | मनुष्य छोटी बातों पर बदले की भावना रखता है: मनुष्य में बड़े, गंभीर चोंट का बदला लेने की क्षमता नहीं होती; अतः, ऐसी हानि पहुंचानी चाहिए ताकि उसके बदले का डर नहीं रहे |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय ३ से है | इस अवतरण में माक्यावैली ने तर्क (logic) को नैतिकता (ethics) के ऊपर रखा है| राजा को  समझाना चाहिए कि उसके पास सिर्फ दो विकल्प है – उपकार या विनाश | क्योंकि विनाश से प्रजा क्रोधित हो सकती है, इसलिए विनाश तभी उपयोग करना चाहिए जब विनाश निश्चित रूप से राजा के द्वेषी मंत्री और दुश्मनों का खात्मा कर सके | दया, तरस, रहम, और करुणा निरर्थक है | आत्मकेंद्रतिता और स्वयं-सुरक्षा ही प्रमुख कारक और इन दोनों तत्वों का आचरण निष्ठूरता से करना चाहिए |

2. [P]eople are by nature changeable. It is easy to persuade them about some particular matter, but it is hard to hold them to that persuasion. Hence it is necessary to provide that when they no longer believe, they can be forced to believe.

अनुवादित –

मनुष्य स्वाभाविक रूप से परिवर्तनशील होता है | मनुष्य को किसी ख़ास बात में फुसलाना आसान है, मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखना कठिन है | अतः, यदि मनुष्य विश्वास खो दे तो ज़बरदस्ती करके विश्वास लादा जा सकता है |

व्याख्या –

यह प्रसंग अध्याय ६ से लिया गया है | माक्यावैली ने मनुष्य की प्रकृति पर अपनी धारणा बतलाई है | हलाकि इन धारणाओं को प्रमाणित करने के लिए माक्यावैली ने कोई उदाहरण या तर्क नहीं दिए | माक्यावैली का मानना था कि मनुष्य आम तौर पर समय या परिस्थिति अनुसार बदलते रहते हैं | मनुष्य को किसी बात पर उकसाना या फुसलाना (convince, persuade) सरल है | मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखने के लिए योजना या दुसरे प्रबंध रखने पड़ सकते है क्योंकि मनुष्य चालाक होता है इसलिए देर तक फुसलाये रखना कठिन हो सकता है | माक्यावैली कहते है यदि मनुष्य बातों की जादूगरी से  विश्वास नहीं करे तो अंत में बल को उपयोग करना चाहिए | बल के दबाव में मनुष्य किसी भी बात को मान लेता है |

3. A prince must have no other objective, no other thought, nor take up any profession but that of war, its methods and its discipline, for that is the only art expected of a ruler. And it is of such great value that it not only keeps hereditary princes in power, but often raises men of lowly condition to that rank.

अनुवादित –

राजा का दूसरा उद्देश्य नहीं होना चाहिए, दुसरे विचार नहीं आने चाहिए, और न ही दूसरा पेशा बल्कि केवल युद्घ, युद्घ के तरीके और युद्घ के अनुशासन, क्योंकि एक शासित राजा से युद्घ की ही उम्मीद रखी जाती है | युद्घ बहुत मूल्यवान है क्योंकि एक ही वंश के राजा, पीड़ी दर पीड़ी, राजगद्दी में शासित हो सकते है और युद्घ से नीच कुल के पुरुष को राजा बनने का अवसर मिल सकता है |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय १४ से उद्धृत है | माक्यावैली युद्घ-कला को शास्त्रीय ज्ञान और वास्तविक अनुभव मानते है | शास्त्रीय ज्ञान क्योंकि युद्घ को, पौराणिक कहानियों और मंत्रों की तरह, इतिहास में हुए युद्धों को उदाहरण के रूप में पढ़ा जा सकता है | वास्तविक अनुभाव क्योंकि बिना अनुभव किये युद्घ के अनुशासन को पढ़ना निरर्थक है | माक्यावैली ने सरकारी कार्य को सामरिक (military) नज़रों से देखा है| क्योंकि हर सरकार का एक ही लक्ष्य होता है – स्वयं-सुरक्षा (self-preservation) और सैनिक प्रतिरक्षा (military defense) | इसके लिए सरकार को कुटिल नीति (diplomacy), कुशल रणनीति (tactical strategy), भौगोलिक कौशल (geographic mastery), और एतिहासिक विश्लेषण (historical analysis) का सहारा लेना चाहिए | माक्यावैली मानते है कि राजा सर्व विद्वान नहीं हो सकता, परन्तु राजा का अंतिम उत्तरदायित्व अपने राज्य की स्थिरता और एकता बनाए रखना है, राज्य की खुशहाली ज़रूरी नहीं |

4. Only the expenditure of one’s own resources is harmful; and, indeed, nothing feeds upon itself as liberality does. The more it is indulged, the fewer are the means to indulge it further. As a consequence, a prince becomes poor and contemptible or, to escape poverty, becomes rapacious and hateful. Of all the things he must guard against, hatred and contempt come first, and liberality leads to both. Therefore it is better to have a name for miserliness, which breeds disgrace without hatred, than, in pursuing a name for liberality, to resort to rapacity, which breeds both disgrace and hatred.

अनुवादित –

अपने पूंजी-साधन का खपत सबसे खतरनाक होता है | उदारता स्वयं को खा जाती है | जितना खपत होगा, पूंजी-साधन उतना कम होगा | फलतः, राजा गरीब और अपमानजनक बन जाता है या गरीबी से बचने के लिए अति लोभी और कुत्सित बन जाता है | राजा को जितनी भी चीज़ों से बचना चाहिए, उनमे सबसे पहले है – प्रजा की नफरत और तिरस्कार | उदारता नफरत और तिरस्कार दोनों को जनमती है | बेहतर होगा अगर राजा कंजूसी के लिए प्रसिद्ध हो | क्योंकि कंजूसी से सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) होता है प्रजा को राजा से नफरत नहीं होती | पहले उदार होना, फिर गरीबी में चले जाना, तिरस्कार और नफरत दोनों को पैदा करती है |

व्याख्या –

यह अवतरण सोलहवी अध्याय से उद्धृत है | इन पंक्तियों में राजनीतिज्ञ और धर्माचरण के प्रति माक्यावैली के भाव प्रदर्शित होते है | माक्यावैली राजा को सलाह देते है कि जब राज्य के लिए काम करो तो मूल्यों और सिद्धांतों का तिरस्कार कर दो | सिर्फ धर्म के नाम पर या धर्म के लिए धर्म का पालन करना राज्य के लिए हानिकारक है | राज्य चलाने की कला और राजा के निजी मूल्यों और सिद्धांतों के बीच कभी टकराव नहीं होना चाहिए | राजा को अपने निजी मूल्यों और सिद्धांतों से ऊपर उठकर सोचना चाहिए | उदारता प्रशंसनीय है – प्रजा उदारता को सरहाती है, मगर अंतिम में यही उदारता राज्य को खा जाती है | इसलिए उदारता से दूर रहना चाहिए | सिद्धान्तहीन होने पर राजा से प्रजा नफरत नहीं करती | प्रजा राजा से नफरत तब करती है जब राजा अपने कर्त्तव्य को नहीं निभाता है या राज्य की सुरक्षा नहीं कर पाता | धर्माचरण में स्वयं-त्यागी बनना पड़ता है जो राज्य के स्वयं-सुरक्षा के उद्देश्य के प्रतिकूल है |

माक्यावैली कहते है कि उदार राजा कहलाने से बेहतर कंजूस राजा होना है | क्योंकि जब पूंजी-साधन ख़त्म हो जायेगा तब उदारता की आदती प्रजा अपने राजा से नफरत और तिरस्कार (मज़ाक) करने लगेगी | मगर कंजूस राजा होने पर प्रजा सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) करेगी, नफरत नहीं |

5. Here a question arises: whether it is better to be loved than feared, or the reverse. The answer is, of course, that it would be best to be both loved and feared. But since the two rarely come together, anyone compelled to choose will find greater security in being feared than in being loved. . . . Love endures by a bond which men, being scoundrels, may break whenever it serves their advantage to do so; but fear is supported by the dread of pain, which is ever present.

अनुवादित –

यहाँ एक सवाल उठता है – क्या प्यार किये जाना, डर होने से बेहतर है या इसका उल्टा | उत्तर है, सबसे श्रेष्ठ होगा यदि आपको लोग प्यार भी करें और आपसे डरे भी | हलाकि यह दोनों का एक साथ होना दुर्लभ है, अगर किसी को दोनों में से एक चुनना हो तो लोगों के मन में उसका डर होना उसे ज़्यादा सुरक्षित, महफूज़ रखेगा | प्यार एक जोड़ की तरह रहता है जिसे मनुष्य अपना काम सिद्ध होने पर तोड़ सकता है| मगर डर का संयोग भीषण दर्द से होता है, दर्द का एहसास हमेशा कायम रहता है |

व्याख्या –

ये पंक्तियाँ अध्याय १७ से ली गयी है | शायद सुनने में लगता है कि माक्यावैली ने “द प्रिन्स” अत्याचारियों के लिए लिखा है | मगर गौर से पढ़ा जाये तो माक्यावैली ने मनुष्य की प्रवृत्ति (human nature) का आश्चर्यजनक विश्लेषण (analysis) दिया है | माक्यावैली कहते है कि यह मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि परिस्थिति अनुसार अपना स्वर बदले | परिस्थिति अनुसार मनुष्य नमक हराम बन सकता है | मगर राज्य को सफलतापूर्वक चलाने के लिए जनता और मंत्रियों की वफादारी की ज़रुरत होती है | इन दोनों बातों से यह बात निकलती है कि राजा को अगर उपकार और कठोरता में से एक चुनना हो तो कठोरता ज्यादा भरोसेमंद है, ज़्यादा फलदायक है | माक्यावैली शौक के लिए क्रूरता या कठोरता की वकालत नहीं करते | क्रूरता और कठोरता केवल राज्य के हित के लिए होना चाहिए | क्रूरता और कठोरता राज्य को चलाने की कला के प्रमुख भाग है |

यदि चुनना हो कि लोग आपसे प्यार करे या आपसे डरे तो सबसे अच्छा होगा कि लोग आपसे डरे भी और प्यार भी करे| मगर दोनों का साथ होना मुश्किल है| इसीलिए विकल्प दिए जाने पर डर को चुनना चाहिए | क्योंकि प्यार कभी भी द्वेष बन सकता है या प्यार के बंधन को मतलब पूरा होने पर तोडा भी जा सकता है | मगर डर लोगों के मन में बना रहता है| डर का सम्बन्ध पीडा से होता है| पीडा शारीरिक हो या मानसिक, डर के साथ बंधा होता है| जब डर लगता है तो पीडा दिमाग में ताज़ा हो जाती है | पीडा से बचने या भागने की मनुष्य की प्रवृत्ति होती है| पीडा से बचने के लिए मनुष्य अपने राजा की आज्ञा मान लेता है| इसलिए प्रजा और मंत्रियों को डराए रखने में ही राजा की राजगद्दी की सलामती है अर्थात् राजा स्वयं-सुरक्षित है |