प्रतिबिम्ब

21 05 2010

अकेलेपन के साए सच लगते हैं
इस अंधेर कमरे में कुछ ढूँढता
एक कदम लम्बे रास्ते
चले थे एक, निकले कई

थामे वक़्त का हाथ दूर निकल आये
अरसा लगता है पल-पल
पिछड़े मोड़ पर थमे थे
न मूड़ सके हम, रुके कई

यह कैसी है जंजीरें पैरों में
लिए फिरते है सीने से लगाये
अदा बन गयी है इसकी
उठा लिए हर बार, गिराए कई

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Praan प्राण প্রান

19 03 2010

Performed by Matt Harding. Music by Gary Schyman. Sung by Palbasha Siddique.

Penned by Rabindrnath Tagore. Published in his Nobel award winning book of Bengali poetry, Gitanjali, in 1910.

It took 100 years to understand this poetry and make others understand!

SING ALONG – Dedicated to my sister on her birthday and her baby

Praan

Bhulbonaar shohojete
Shei praane mon uthbe mete
Mrittu majhe dhaka ache
je ontohin praan

Bojre tomar baje bashi
She ki shohoj gaan
Shei shurete jagbo ami

Shei jhor jeno shoi anonde
Chittobinar taare
Shotto-shundu dosh digonto
Nachao je jhonkare!

– Rabindranath Tagore
The same stream of life that runs through my veins night and day runs through the world and dances in rhythmic measures. It is the same life that shoots in joy through the dust of the earth in numberless blades of grass and breaks into tumultuous waves of leaves and flowers. It is the same life that is rocked in the ocean-cradle of birth and of death, in ebb and in flow. I feel my limbs are made glorious by the touch of this world of life. And my pride is from the life-throb of ages dancing in my blood this moment.

प्राण

भुल्बोना आर शोहोजेते

शेई प्राण इ मों उठबे मेटे

मृत्तु माझे ढाका आछे

जे ओंतोहीं प्राण

बोजरे तोमार बाजे बाशी

शे की शोहोज गान

शेई शुरते जागबो आमी

शेई झोर जेनो शोई आनोंदे

चित्तोबिनार तारे

शोत्तो-शिन्धु  दश दिगोंतो

नाचाओ जे झोंकारे

– रबिन्द्रनाथ टगोर

वही जीवन की धारा जो मेरे नसों में दिन-रात दौड़ती है, इस पृथ्वी में भी दौड़ती है और ताल-लय पर नाचती है| यह वही जीवन धारा है जो धरती की मिट्टी को चीर कर अनगिनत घास के बाण बन जाती है या पत्तियों और फूलों के लहर बन जाती है | यह वही जीवन धारा है जो महासागर में है – जीवन और मरण का पलना, उतार या चडाव में | मुझे अनुभव होता है की इस जीवन धारा के स्पर्श से मेरे अंग तेजस्वी हो गए है | और मेरा अभिमान इसी जीवन धारा से है जो सदियों से धड़क रहा है और मेरे खून में अभी नाच रहा है |

প্রান

ভুলবনা আর সহজেতে

সেই প্রান এ মন উঠবে মেতে

মৃত্যু মাঝে ঢাকা আছে

যে অন্তহীন প্রান

বজ্রে তোমার বাজে বাসী

সে কি সহজ গান

সেই সুরেতে জাগবো আমি

সেই ঝর যেনো সি আনন্দে

চিত্তবিনার তারে

সত্য-সিন্ধু দশ দিগন্ত

নাচাও যে ঝঙ্কারে

–          রবীন্দ্রনাথ তাগোর





माक्यावैली के प्रसिद्ध कथन, ” द प्रिन्स ” से

24 05 2009
 माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532  में प्रकाशित

माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532 में प्रकाशित

निकोलो माक्यावैली द्वारा, इतालवी भाषा में, लिखित ” द प्रिन्स ” की चर्चा जारी रखते है | पिछले पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के, विभिन्न विषयों पर, विचारों का सारांश प्रस्तुत है |

पिछले पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे:       द प्रिन्स (1532 में प्रकाशित)

इस पोस्ट में ” द प्रिन्स ” में निहित माक्यावैली के प्रसिद्ध कथनों (famous quotations) की चर्चा होगी| मैंने पांच मनोहर अवतरणों को चुना है और उनकी व्याख्या की है –

1. At this point one may note that men must be either pampered or annihilated. They avenge light  offenses; they cannot avenge severe ones; hence, the harm one does to a man must be such as to obviate any fear of revenge.

अनुवादित –

अब ये ध्यान देने की बात है कि मनुष्य को या तो लाड-प्यार किया जाए या फिर मिटा दिया जाये | मनुष्य छोटी बातों पर बदले की भावना रखता है: मनुष्य में बड़े, गंभीर चोंट का बदला लेने की क्षमता नहीं होती; अतः, ऐसी हानि पहुंचानी चाहिए ताकि उसके बदले का डर नहीं रहे |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय ३ से है | इस अवतरण में माक्यावैली ने तर्क (logic) को नैतिकता (ethics) के ऊपर रखा है| राजा को  समझाना चाहिए कि उसके पास सिर्फ दो विकल्प है – उपकार या विनाश | क्योंकि विनाश से प्रजा क्रोधित हो सकती है, इसलिए विनाश तभी उपयोग करना चाहिए जब विनाश निश्चित रूप से राजा के द्वेषी मंत्री और दुश्मनों का खात्मा कर सके | दया, तरस, रहम, और करुणा निरर्थक है | आत्मकेंद्रतिता और स्वयं-सुरक्षा ही प्रमुख कारक और इन दोनों तत्वों का आचरण निष्ठूरता से करना चाहिए |

2. [P]eople are by nature changeable. It is easy to persuade them about some particular matter, but it is hard to hold them to that persuasion. Hence it is necessary to provide that when they no longer believe, they can be forced to believe.

अनुवादित –

मनुष्य स्वाभाविक रूप से परिवर्तनशील होता है | मनुष्य को किसी ख़ास बात में फुसलाना आसान है, मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखना कठिन है | अतः, यदि मनुष्य विश्वास खो दे तो ज़बरदस्ती करके विश्वास लादा जा सकता है |

व्याख्या –

यह प्रसंग अध्याय ६ से लिया गया है | माक्यावैली ने मनुष्य की प्रकृति पर अपनी धारणा बतलाई है | हलाकि इन धारणाओं को प्रमाणित करने के लिए माक्यावैली ने कोई उदाहरण या तर्क नहीं दिए | माक्यावैली का मानना था कि मनुष्य आम तौर पर समय या परिस्थिति अनुसार बदलते रहते हैं | मनुष्य को किसी बात पर उकसाना या फुसलाना (convince, persuade) सरल है | मगर मनुष्य को देर तक फुसलाये रखने के लिए योजना या दुसरे प्रबंध रखने पड़ सकते है क्योंकि मनुष्य चालाक होता है इसलिए देर तक फुसलाये रखना कठिन हो सकता है | माक्यावैली कहते है यदि मनुष्य बातों की जादूगरी से  विश्वास नहीं करे तो अंत में बल को उपयोग करना चाहिए | बल के दबाव में मनुष्य किसी भी बात को मान लेता है |

3. A prince must have no other objective, no other thought, nor take up any profession but that of war, its methods and its discipline, for that is the only art expected of a ruler. And it is of such great value that it not only keeps hereditary princes in power, but often raises men of lowly condition to that rank.

अनुवादित –

राजा का दूसरा उद्देश्य नहीं होना चाहिए, दुसरे विचार नहीं आने चाहिए, और न ही दूसरा पेशा बल्कि केवल युद्घ, युद्घ के तरीके और युद्घ के अनुशासन, क्योंकि एक शासित राजा से युद्घ की ही उम्मीद रखी जाती है | युद्घ बहुत मूल्यवान है क्योंकि एक ही वंश के राजा, पीड़ी दर पीड़ी, राजगद्दी में शासित हो सकते है और युद्घ से नीच कुल के पुरुष को राजा बनने का अवसर मिल सकता है |

व्याख्या –

यह अवतरण अध्याय १४ से उद्धृत है | माक्यावैली युद्घ-कला को शास्त्रीय ज्ञान और वास्तविक अनुभव मानते है | शास्त्रीय ज्ञान क्योंकि युद्घ को, पौराणिक कहानियों और मंत्रों की तरह, इतिहास में हुए युद्धों को उदाहरण के रूप में पढ़ा जा सकता है | वास्तविक अनुभाव क्योंकि बिना अनुभव किये युद्घ के अनुशासन को पढ़ना निरर्थक है | माक्यावैली ने सरकारी कार्य को सामरिक (military) नज़रों से देखा है| क्योंकि हर सरकार का एक ही लक्ष्य होता है – स्वयं-सुरक्षा (self-preservation) और सैनिक प्रतिरक्षा (military defense) | इसके लिए सरकार को कुटिल नीति (diplomacy), कुशल रणनीति (tactical strategy), भौगोलिक कौशल (geographic mastery), और एतिहासिक विश्लेषण (historical analysis) का सहारा लेना चाहिए | माक्यावैली मानते है कि राजा सर्व विद्वान नहीं हो सकता, परन्तु राजा का अंतिम उत्तरदायित्व अपने राज्य की स्थिरता और एकता बनाए रखना है, राज्य की खुशहाली ज़रूरी नहीं |

4. Only the expenditure of one’s own resources is harmful; and, indeed, nothing feeds upon itself as liberality does. The more it is indulged, the fewer are the means to indulge it further. As a consequence, a prince becomes poor and contemptible or, to escape poverty, becomes rapacious and hateful. Of all the things he must guard against, hatred and contempt come first, and liberality leads to both. Therefore it is better to have a name for miserliness, which breeds disgrace without hatred, than, in pursuing a name for liberality, to resort to rapacity, which breeds both disgrace and hatred.

अनुवादित –

अपने पूंजी-साधन का खपत सबसे खतरनाक होता है | उदारता स्वयं को खा जाती है | जितना खपत होगा, पूंजी-साधन उतना कम होगा | फलतः, राजा गरीब और अपमानजनक बन जाता है या गरीबी से बचने के लिए अति लोभी और कुत्सित बन जाता है | राजा को जितनी भी चीज़ों से बचना चाहिए, उनमे सबसे पहले है – प्रजा की नफरत और तिरस्कार | उदारता नफरत और तिरस्कार दोनों को जनमती है | बेहतर होगा अगर राजा कंजूसी के लिए प्रसिद्ध हो | क्योंकि कंजूसी से सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) होता है प्रजा को राजा से नफरत नहीं होती | पहले उदार होना, फिर गरीबी में चले जाना, तिरस्कार और नफरत दोनों को पैदा करती है |

व्याख्या –

यह अवतरण सोलहवी अध्याय से उद्धृत है | इन पंक्तियों में राजनीतिज्ञ और धर्माचरण के प्रति माक्यावैली के भाव प्रदर्शित होते है | माक्यावैली राजा को सलाह देते है कि जब राज्य के लिए काम करो तो मूल्यों और सिद्धांतों का तिरस्कार कर दो | सिर्फ धर्म के नाम पर या धर्म के लिए धर्म का पालन करना राज्य के लिए हानिकारक है | राज्य चलाने की कला और राजा के निजी मूल्यों और सिद्धांतों के बीच कभी टकराव नहीं होना चाहिए | राजा को अपने निजी मूल्यों और सिद्धांतों से ऊपर उठकर सोचना चाहिए | उदारता प्रशंसनीय है – प्रजा उदारता को सरहाती है, मगर अंतिम में यही उदारता राज्य को खा जाती है | इसलिए उदारता से दूर रहना चाहिए | सिद्धान्तहीन होने पर राजा से प्रजा नफरत नहीं करती | प्रजा राजा से नफरत तब करती है जब राजा अपने कर्त्तव्य को नहीं निभाता है या राज्य की सुरक्षा नहीं कर पाता | धर्माचरण में स्वयं-त्यागी बनना पड़ता है जो राज्य के स्वयं-सुरक्षा के उद्देश्य के प्रतिकूल है |

माक्यावैली कहते है कि उदार राजा कहलाने से बेहतर कंजूस राजा होना है | क्योंकि जब पूंजी-साधन ख़त्म हो जायेगा तब उदारता की आदती प्रजा अपने राजा से नफरत और तिरस्कार (मज़ाक) करने लगेगी | मगर कंजूस राजा होने पर प्रजा सिर्फ तिरस्कार (मज़ाक) करेगी, नफरत नहीं |

5. Here a question arises: whether it is better to be loved than feared, or the reverse. The answer is, of course, that it would be best to be both loved and feared. But since the two rarely come together, anyone compelled to choose will find greater security in being feared than in being loved. . . . Love endures by a bond which men, being scoundrels, may break whenever it serves their advantage to do so; but fear is supported by the dread of pain, which is ever present.

अनुवादित –

यहाँ एक सवाल उठता है – क्या प्यार किये जाना, डर होने से बेहतर है या इसका उल्टा | उत्तर है, सबसे श्रेष्ठ होगा यदि आपको लोग प्यार भी करें और आपसे डरे भी | हलाकि यह दोनों का एक साथ होना दुर्लभ है, अगर किसी को दोनों में से एक चुनना हो तो लोगों के मन में उसका डर होना उसे ज़्यादा सुरक्षित, महफूज़ रखेगा | प्यार एक जोड़ की तरह रहता है जिसे मनुष्य अपना काम सिद्ध होने पर तोड़ सकता है| मगर डर का संयोग भीषण दर्द से होता है, दर्द का एहसास हमेशा कायम रहता है |

व्याख्या –

ये पंक्तियाँ अध्याय १७ से ली गयी है | शायद सुनने में लगता है कि माक्यावैली ने “द प्रिन्स” अत्याचारियों के लिए लिखा है | मगर गौर से पढ़ा जाये तो माक्यावैली ने मनुष्य की प्रवृत्ति (human nature) का आश्चर्यजनक विश्लेषण (analysis) दिया है | माक्यावैली कहते है कि यह मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि परिस्थिति अनुसार अपना स्वर बदले | परिस्थिति अनुसार मनुष्य नमक हराम बन सकता है | मगर राज्य को सफलतापूर्वक चलाने के लिए जनता और मंत्रियों की वफादारी की ज़रुरत होती है | इन दोनों बातों से यह बात निकलती है कि राजा को अगर उपकार और कठोरता में से एक चुनना हो तो कठोरता ज्यादा भरोसेमंद है, ज़्यादा फलदायक है | माक्यावैली शौक के लिए क्रूरता या कठोरता की वकालत नहीं करते | क्रूरता और कठोरता केवल राज्य के हित के लिए होना चाहिए | क्रूरता और कठोरता राज्य को चलाने की कला के प्रमुख भाग है |

यदि चुनना हो कि लोग आपसे प्यार करे या आपसे डरे तो सबसे अच्छा होगा कि लोग आपसे डरे भी और प्यार भी करे| मगर दोनों का साथ होना मुश्किल है| इसीलिए विकल्प दिए जाने पर डर को चुनना चाहिए | क्योंकि प्यार कभी भी द्वेष बन सकता है या प्यार के बंधन को मतलब पूरा होने पर तोडा भी जा सकता है | मगर डर लोगों के मन में बना रहता है| डर का सम्बन्ध पीडा से होता है| पीडा शारीरिक हो या मानसिक, डर के साथ बंधा होता है| जब डर लगता है तो पीडा दिमाग में ताज़ा हो जाती है | पीडा से बचने या भागने की मनुष्य की प्रवृत्ति होती है| पीडा से बचने के लिए मनुष्य अपने राजा की आज्ञा मान लेता है| इसलिए प्रजा और मंत्रियों को डराए रखने में ही राजा की राजगद्दी की सलामती है अर्थात् राजा स्वयं-सुरक्षित है |





Puzzle Unsolved

16 03 2009

After breathing for 22 years 8 months 2 weeks 5 days 9 hours 17 minutes and counting, I realized, after reading some other blogs, that life is too short. Life is too short to fight, to hold grudge, to keep arrogance, self-appraisal and to be lazy. At the same time it seems that life is way to long to hold happiness and enjoy it.

I am saying based on my observation – what I see in my life and what I could peek into other (not that I like – I being dishonest here). Again see the use of the word “I” – everything has to start and end with this capitalized phallic symbolized letter. I must say that I have not gone through much of the difficult times as that of my contemporaries. I will not compare with the last generation because they belong to other times and had different set of resources and limitations. I never believed that I went through too much of troubles to achieve what I goaled for. Yes at times it was like I am walking on the fire lines because I was so obsessive about that specific goal. The harshness and the spirit to achieve it- were simultaneous. The fight was fierce but I was fragile for I was still dependent.

Dependency without self-respect, like bondage, welcomes any piece of gratitude or concern thrown at you. I would have been more than happy to concede the fact that I was supported but the project failed or could not be resumed for it fatal nature. However everything sorted later and the goal was achieved and the project indeed got nailed. What did I learnt out of all these mess – the emotional drama, financial catastrophes, political upheaval, and social turnover. Here I would like to philosophized that-

Only under the extreme conditions the creativity could be born.

Without the sun’s killing heat there is no enjoyment of the air-conditioning.

The flower fragrance wouldn’t smell intoxicating if there were no thorns.

Unless you don’t jump you don’t know what gravity is.

Unless you don’t go up to the top floor you don’t know what its like to be a tall building.

Without grief there is no fun in happiness.

Without obstacles there is no fun in achieving

Without opposition there is no fun in winning

………………………………….BUT I AM LAZY……………………………………….

Do I care what anyone says or writes or have their own experiences?

Well then I would say to these people that you are the luckiest mammal (human lay eggs in other’s basket) on the planet. Why? Because these are the rotten lot of losers. Not because they failed after one or numerous trials rather I hate their comfort of no competition life. Looking at these “luckies” I feel so damn jealous of their comfort life. Either they are filthy rich or they don’t have “zing” to compete just like a leech that feeds on sucking someone’s. Why aren’t they thrown into the fires of REAL life? Why should US be the only one roasting! Life is too long to be happy and too short to hold grudge.





असत्याभास

13 03 2009

असत्याभास

एक जवलामुखी है | फुंटता क्यों नहीं | कब तक यह आग की ठंडक मुझे सुजाती रहेगी | एक बार जल जाओं तो चैन मिले |
आग की ठंडक उसकी तपीश से भी ज्यादा दर्दनाक होती है | सुजा हुआ  ठण्ड  है | फूल गया है अन्दर दब्त्ते दबते | और कब तक दबा कर रखूँ | लाल हो रहा है | आग पिला नहीं आसमानी नीला है | छुहोगे तो जलेगा नहीं .. पत्थर बन जायेगा – उसकी जान ही  मर जायेगी | मैं मौत को लिए घूम रहा हूँ | लोग डरते हैं की कहीं मौत न आ जाये | मैं मौत को सीने के कोने में पाल रहा हूँ | नहीं मरता है और न बढता है | उस कोने में बैठे मुझपर हँसता है | मौत गले लगती नहीं और मेरा गला छोड़ती भी नहीं |

कब तक दबाये हुए रखूँ मैं इस कीड़े को | छाती में छेद हो गया है | गहरी गुफा बन गयी | बहुत अँधेरा है वहां | गहरी इतनी कि अपनी पुकार कि गूंज तक नहीं सुने देती | इसी छाती के विस्मय गुफा में कहीं रेंग रहा है यह कीड़ा | गुफा अथाह है | पता नहीं कहाँ ख़त्म होती होगी यह साली गुफा | सुरंगे बन गए है | यह नसे नहीं दीमख से लदि सुरंगे है | चिपकी दीमख बेरोक इस सुरंगों को चुसे जा रही है | चूस चूस के गला रही है | इन दिमखों से मुझे डर लगता है | इनके बीच ही कहीं चुप्पा है कीड़ा |

कीड़ा मुझे चिडाता है –

तुम में कुछ नहीं है | खाली हवा से भरी सुरंग हो | लाल  खून नहीं दीमख सड़ती है तुम्हरे शरीर में | बोली नहीं आह निकलती हैं इन दिमखों की | और इन दीमख से नीली आग निकलती है – तुम जिसे भी पाना चाहोगे उसकी जान तक छीन लोगे | मौत किसे आती है – मौत तो तुम खुद हो | खा जाते हो खुदको और आस पासवाले को | मैं तुम्हारी फिदरत हूँ, तुम्हारी जात वालों की विशेषता हूँ | मैं कीड़ा नहीं – स्वयं हूँ | देखो लो अपनी असली घिनौनी सूरत | कड़वाहट, जलन और असीमित चाह |

सारा बदन गिलगिला हो रहा है | मानो हड्डी नहीं रही | अन्दर से कोई खीँच रहा है | मांस के एक-एक रेशे तेजी से टन के टूट रहे है | छाती धधक रही है | सांस तेज़ हो रही है | खांसी आती है और गले में जलन होती है | गले से जलन हाथों को उँगलियों तक करंट की तरह देहका देती है | दीमख चबाये जा रही है और आग दर्दनाक ठंडक दे रही है | उँगलियों के छोरो में फफोले उठ गए है | उनसे पानी निकल रहा है | जगह जगह फफोले उठ गए है | दीमख पेड़ की टहनियों की तरह अन्दर खोखले किये जा रहे है | फिर उनमे आग आती है | आग सूखापन लाती है और सूखे मर्म पर पर लाल जलन | सब सुजा जा रहा है | ज़रा सा  पानी जलन को और उत्तेजित कर देता है | ये दीमख मेरे आँखों के और जीभ के पेशियों ताने जा रही है |
तेजी से उन्हें खाए जा रहा है | जल रहा हूँ | गलता नहीं और भस्म भी नहीं होता | इन दोनों छोर्रो के बीच मौत का भद्दा तांडव हो रहा है | न मौत न जीवन और अथाह तड़पन बेचैनी और प्यास.|





मैं आज़ाद हूँ

11 03 2009

आज अचानक  आभास हो आया है कि  सब निरर्थक है | मैं कहाँ हूँ  – किधर को  जा रहा हूँ – पता नहीं | लगता है कि जहां से भी शुरू करूं सब वहीं आकर ख़त्म हो जाता है | सब शून्य में मिल जाता है | अँधेरे में सर दीवार से लग गया हो | अन्धेरें में सालों सड़ रहे हो | हाथों की ऊंगलियों से दीवार को महसूस कर रहा हूँ | दम घुट सा रहा है इस अँधेरे में | चीख रहा हूँ पर आवाज़ नहीं निकल रही | बहुत कोशिश कर रहा हूँ मगर सिर्फ हवा निकल रही है | एक पत्ते की तरह  टूट कर गिरने के लिए तिलमिला रहा हूँ | इस घुटन ने मेरा गला पकड़ रखा है | पाव में जैसे ज़ंजीर है | दीवार चढ़ कर पार कर नहीं सकता | अँधेरे मैं कुछ दिखाइए नहीं देता | दीवार पर चडू भी  तो कैसे – न कोई रस्सी है और न कोई साधन | अपनी झुंझलाहट नाखूनो  को दीवार से रगड़ कर निकाल रहा हूँ | पत्थर है सब, टूटे-फूटे, कंटीले | दीवार की छाती पर मुक्के मार रहा हूँ | यह दीवार सरकती क्यों नहीं | मैं यहाँ क्यों फंसा हूँ | कोई मेरी आवाज़ सुनता क्यों नहीं | सब कहाँ मर गए है ? पूरा बदन जल रहा है | मानो इस पत्थर की दीवार से आग निकल रही है | जैसे चीताह अपने  मुंह में हिरनी के बच्चे की गर्दन को दबोच लेता है उसी तरह यह आग और अँधेरा मेरी हर सांस को दबोचे जा रही है |

मैं क्यों जी रहा हूँ | क्या मूल्य है मेरा आबादी से भरे इस दुनिया में | कीडे की तरह कई जनमते है और कीडे की तरह मर जाते है | जीना क्या है – एक उम्र की अड़ियल उबासी या एक गुबारे के फूलने और फोटने की बीच की मौज |

इस छोटे से अंधेर कमरे में, छह ओरो से घीरे , ये पत्थर की दीवारें मुझपर हंसती है | इनकी हंसी मेरी हर कोशिश पर जोर हो जाती है | मैं इनको नोंचता हूँ, चीरता हूँ , धकेलता हूँ | हर कोशिश की उलाहना करती है हर एक ईंट | मुझे कोसते  है –

तुम भी यहीं साडोगे | इन्ही आग की तपीश में गल जाओगे | नोचो हमे जितना नोचोगे   हमे उतना मज़ा आएगा | तुम्हे यहीं सड़ना  है | यहीं साडोगे – मिट्टी में कईयों की तरह मिल जाओगे | कौन जी सका है यहाँ ? किसे मिलती है मुक्ति ? रेंग रेंग कर मरोगे | तुम आदमजात हो ही इसी लायक ! तुम में और जानवर में कोई फर्क नहीं है | पैदा कर दिए जाते हो – पल भी जाते हो – फिर कैद हो जाते हो !

मैं दोनों हाथो से अपने कानो को बंद कर रखा हूँ | पर इनकी हंसी पहुँच हो जाती | मेरी आखें बड़ी-बड़ी हो गए है | इन दीवारों पर चीख -चीख कर गालियाँ दे रहा हूँ – चुप हो जाओ , सालो | हंसी गूंज रही है – चारों और से | में कानो को जोर से बंद किये हूँ | कानो को दबाते हुए सर हिला रहा हूँ और दम भर के चीख रहा हूँ – नहीं , नहीं | उकड़ू होकर बैठ गया हूँ | सर को अन्दर किये हुए हूँ | नहीं नहीं करते मेरी छाती झटकी | गला सुख रहा है | उबाकी आई और सांस अन्दर अटक गयी  |  घबराहट से फिर छाती झटकी और सुबकना फूंट के निकला | जैसे कमज़ोर बांद की बूडी ईंट नदी के  पानी को डट कर रोकने की कोशिश करती है पर पानी का तेज़ उस बूडी ईंट को एक फूँक में गिरा देती है और एक-एक करके पूरा बांद दह जाता है |

उकड़ू बैठे, सर को घुटनों और छाती के बीच लगाए, मेरा सुबकना तेज़ हो रहा था | मैं अपने आप को और समेटे जा रहा था जैसे ठण्ड में कुत्ता  गरमाहट पैदा करने के लिए खुद को समेट लेता है |

…. और आज़ादी मुझमे ही सिमटने लगी |





ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद

28 02 2009

नमस्कार

यह मेरा पेहला  पोस्ट है । आशा है कि आपको पसन्द आयेगा ।

ज़िन्दगी का सफर फिलहाल बहुत अच्छा रहा है | मुझे हमेशा लगता रहा है कि मेरी सफलता सिर्फ़ मेरी नहीं है बल्कि कई लोगों का सहयोग रहा है | आज मैं पहली दहलीज़ को पार कर, एक ओद्धे तक पहुँच चुका हूँ |
पीछे मुड़के देखता हूँ तो लगता है कि एक सदी बीत गई है| हालाँकि सिर्फ़ चार साल ही हुए है |
कल रात सपने में मैंने देखा कि मैं अपनी प्राथमिक स्कूल में हूँ और मेरे दोस्त और शिक्षक हैं | अपनी कक्षा में अच्छे बच्चे की तरह मैं बैठा पढाई कर रहा था | ब्रेक का वक्त हुआ और बेल बज गई | हम सब दोस्त इक्कठा होकर टिफिन  करते थे | मुझे याद है कि हमने एक फैसला किया था कि हमेशा साथ खायेंगे और अगर कुछ खरीदना हो तो साथ खरीदेंगे | मैंने अपने दोस्तों को दगा दिया था| मैंने अकेले जाकर पसंदीदा कचोडी चना (दही और इमली के साथ) खाया था – चुपके से | वो कचोडी आज भी मेरे मुह में पानी लाती है और उस जैसी कचोडी शायद कलकत्ता मैं कहीं नहीं मिलेगी, ऐसी मेरी भावना है | तो किसी एक दोस्त ने मुझे देख लिया और बाकि को कह दिया कि नितिन ने अकेले ही कचोडी खा ली बिना किसी को बताये | फिर एक ने आके मेरा गला पकड़कर कहा, “चल अब चौबीस रुपये निकाल |” मैं आश्चर्य से बोला “क्यों ” तो उसने कहा ” तीन रुपये का एक और हम आठ” | मैंने झडक कर
कहा कि मैं जब चाहूं तब खा सकता हूँ, किसी की मंजूरी की ज़रूरत नहीं, तुम्हे खाना हो तुम खाओ, दूसरे को क्यों रोकते हो | ऐसी कोई बात बड़ी नहीं थी कि कोई मुझसे बात नहीं करें | और मैंने एक नया चलन शुरू किया | अगले दिन दूसरे लड़के ने ख़ुद खाया | सभी को लगा कि पुराने नियम मैं बदलाव कि ज़रूरत है और हमने फ़ैसला किया कि जो चाहे तब खा सकता है और इस नए “अमेंडमेंट” को उत्सव के रूप में हम सब ने दही इमली वाली कचोडी खाकर मनाई |

मेरा कदम ज़रूर विद्रोही हो सकता था पर मुझे ख़ुद पर विश्वास था कि मैं जो करने वाला हूँ वो भले सही हो या ग़लत , मगर जो चलन है वो ठीक नहीं है | एक बंधन था जिसे तोड़ने की किसीने हिम्मत नहीं की | मैं नहीं कहता कि उनमे हिम्मत नहीं थी या मुझमे हिम्मत थी | मगर कायर नहीं था | शायद कई ने छिपके खाया हो जैसे मैंने ही खाया था | मगर पकड़े जाने पर मैंने अपनी बात कही, कुछ गिल-गिला नहीं कहा और स्पष्ट कहा |

पता नहीं क्यों यह घटना मेरे दिमाग से जाता नहीं हैं | शायद मुझे तब समझ लेना चाहिए था कि मेरी ज़िन्दगी में कई लडाइयां लिखी है जिन्हें ज्यादातर मैं ही शुरू करता हूँ | लडाइयां अपने पेट के लिए नहीं मगर सच्चाई के लिए |
सच, उचित, निष्कपट और स्वच्छता – स्वयं से और समाज से – ज़रूरी है |